'हिंदी-चीनी भाई-भाई से पक गए थे कान'

  • 20 अक्तूबर 2017
भारत चीन युद्ध

वर्ष 1962 का जवान सेकेंड लेफ़्टिनेंट भारत-चीन युद्ध के 50 साल बाद रिटायर्ड ब्रिगेडियर अमरजीत बहल टेलिफ़ोन पर बात करते-करते फूट-फूटकर रो पड़े थे.

बीबीसी हिंदी ने अमरजीत बहल से ये बातचीत 2012 में की थी, उस वक्त अमरजीत बहल ने भारत-चीन युद्ध को लेकर जो बातें की थी, वो इस तरह हैं-

'गहरी पीड़ा है, युद्धबंदी होने का ग़म भी है, लेकिन स्वाभिमान भी है कि चीनी सैनिकों से अच्छी तरह लोहा लिया.'

चंडीगढ़ से बीबीसी के साथ टेलिफ़ोन पर बातचीत करते समय भारत-चीन युद्ध के 50 साल बाद भी ब्रिगेडियर बहल की आवाज़ का दम बताता है कि उस समय के जवान सेकेंड लेफ़्टिनेंट में कितना जोश रहा होगा.

अपने वरिष्ठ अधिकारियों से लड़ाई में जाने का अनुरोध स्वीकार किए जाने के बाद बहल ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे. 17 पैराशूट फ़ील्ड रेजिमेंट के साथ आगरा में कार्यरत वह 30 सितंबर 1962 को आगरा से नेफ़ा के लिए रवाना हुए.

कुछ उतार-चढ़ाव भरी यात्रा और तेज़पुर में रुकने के बाद जब सेकेंड लेफ्टिनेंट एजेएस बहल तंगधार पहुँचे, तो उन्हें शायद ही इसका अंदाज़ा था कि आने वाले समय उनके लिए इतनी मुश्किल लेकर आने वाले हैं.

भारत-भूटान में ऐसा क्या है जो चीन को खटकता है?

क्या चीन भूटान को अगला तिब्बत बनाना चाहता है?

Image caption अमरजीत बहल सात महीने बाद चीनी युद्धबंदी शिविर से स्वदेश लौटे थे

वो सुबह

19 अक्तूबर की वो सुबह बहल अब भी नहीं भूले हैं, जब एकाएक चीनी सैनिकों की ओर से गोलाबारी शुरू हुई और फिर गोलियों की बौछार. चीनियों की रणनीति के आगे भारत पिछड़ चुका था.

सारे संपर्क सूत्र काटे जा चुके थे. लेकिन अपने चालीस साथियों के साथ सेकेंड लेफ़्टिनेंट एजेएस बहल ने जो बहादुरी दिखाई, उसे कई वरिष्ठ अधिकारी अपनी किताबों में जगह दे चुके हैं.

सीमा पर मौजूद भारतीय सैनिकों के लिए हथियार डकोटा विमान से भेजे जाते थे. लेकिन घने जंगलों के कारण हथियार तलाश करना काफ़ी मुश्किल होता था. फिर भी सेंकेंड लेफ्टिनेंट बहल और साथियों के पास हथियार अच्छी ख़ासी संख्या में थे.

19 अक्तूबर की सुबह चार बजे ही गोलाबारी शुरू हो गई थी. बहल बताते हैं कि नौ बजे तक तो ऐसा लगता था कि आसमान ही फट पड़ा हो.

इस गोलाबारी में बहल के दो साथी बुरी तरह घायल हुए. लेकिन युद्ध में विपरीत स्थितियों के लिए तैयार रहने वाले एक सैनिक की तरह सेकेंड लेफ़्टिनेंट बहल ने ब्रांडी डालकर घायलों की मरहम पट्टी की.

बहल और उनके साथी चीनियों के हमले का जवाब तो दे रहे थे, उन पर फ़ायरिंग भी कर रहे थे, लेकिन उनका संपर्क किसी से हो नहीं पा रहा था.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

युद्धबंदी

और आख़िरकार वही हुआ, जिसका डर था. सेकेंड लेफ़्टिनेंट बहल और उनके साथियों की गोलियाँ ख़त्म होने लगी और फिर उन्हें न चाहते हुए भी युद्धबंदी बनना पड़ा.

किसी भी सैनिक के लिए ये दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होती है, लेकिन रिटायर्ड ब्रिगेडियर बहल के मुताबिक़ उन्हें इस बात का गर्व था कि उनके किसी भी साथी ने पीछे हटने की बात नहीं की. जबकि कई भारतीय अधिकारी और सैनिक वहाँ से हट रहे थे.

चीनी सैनिकों ने बट मारकर ब्रिगेडियर बहल का पिस्तौल छीन लिया. उनके साथियों के भी हथियार छीन लिए गए. चार दिन बाद सेकेंड लेफ़्टिनेंट बहल और उनके साथियों को शेन ई में युद्धबंदी शिविर में पहुँचाया गया.

इस कैंप में क़रीब 500 युद्धबंदी थे. उस समय सेकेंड लेफ़्टिनेंट रहे बहल बताते हैं, "हम कैप्टन और लेफ्टिनेंट साथ-साथ थे. हम आपस में बात करते थे. हम जब खाना खाने जाते थे. वहाँ हम अपने सिपाहियों से बातचीत कर सकते थे, क्योंकि वही हमारे लिए खाना बनाते थे. लेकिन मेजर और लेफ्टिनेंट कर्नल को अलग रखा गया था और उन्हें बाहर निकलने नहीं दिया जाता था. मेजर जॉन डालवी तो दूर कहीं अकेले रहते थे. उनका जीवन काफ़ी मुश्किल होता था."

भारतीय जवानों की रसोई में मौजूदगी का एक फ़ायदा बहल को ये हुआ कि उन्हें सुबह-सुबह फीकी ब्लैक टी (बिना दूध और चीनी की चाय) मिल जाती थी. लेकिन खाने में रोटी, चावल और मूली की सब्ज़ी ही दी जाती थी. चाहे वो दिन का खाना हो या फिर रात का.

सख़्ती और मार-पिटाईएक ओर क़ैदी जैसी हालत और दूसरी ओर कैंप में बजता ये गाना- गूँज रहा है चारों ओर हिंदी-चीनी भाई-भाई.

एक समय भारत और चीन की दोस्ती का प्रतीक ये गाना उस समय बहल के लिए परेशानी का सबब बन गया था.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

वे बताते हैं, "गूँज रहा है चारों ओर हिंदी-चीनी भाई-भाई, ये गाना हमेशा ही बजता रहता था. ये सुनकर हमारे कान पक गए थे. क्योंकि इससे रिश्ते में तो सुधार हो नहीं रहा था."

युद्धबंदी के तौर पर सैनिकों के साथ सख़्तियाँ भी होती हैं और मार-पिटाई भी. ब्रिगेडियर बहल और उनके साथियों के साथ भी ऐसा हुआ था. लेकिन वे उस समय जवान थे और उसे उन्होंने गंभीरता से नहीं लिया.

चीनी सैनिक अधिकारी अनुवादक की मदद से भारतीय युद्धबंदियों से बात करते थे और उन्हें ये जताने की कोशिश करते थे कि भारत अमरीका का पिट्ठू है. उन्हें ये बात मानने को कहा जाता था.

युद्धबंदी के रूप में एक सिपाही का फ़र्ज़ ये भी होता है कि वो जेल से भागने की कोशिश करे. बहल के दिमाग़ में भी ऐसी योजना थी. बहल और उनके दो साथी बीमारी का बहाना बनाकर दवाएँ इकट्ठा करते थे ताकि भागने के बाद वो उनके काम आए.

वे मौसम ठीक होने का इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन उससे पहले ही उन्हें छोड़ दिया गया.

परिजनों तक पहुँच

"जब हमें छोड़ने का ऐलान हुआ था, तो इतनी खुशी हुई कि समय कटते नहीं कटता था. अगले 20 दिन 20 महीने के बराबर थे. हमें गुमला में छोड़ा गया. हमने भारत माता को चूमा और बोला- मातृभूमि ये देवतुल्य ये भारत भूमि हमारी."

इस दौरान रेडक्रॉस की मदद से उनके परिजनों तक ये सूचना भेज दी गई थी कि वे युद्धबंदी हैं.

हालाँकि इससे पहले आर्मी हेडक्वार्टर से घर पर ये टेलिग्राम चला गया था कि सेकेंड लेफ्टिनेंट बहल लापता हैं और माना जा रहा है कि उनकी मौत हो गई है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

फिर वो दिन भी आया जब बहल और उनके साथियों को छोड़ने का ऐलान हुआ. बहल बताते हैं, "जब हमें छोड़ने का ऐलान हुआ था, तो इतनी खुशी हुई कि समय कटते नहीं कटता था. अगले 20 दिन 20 महीने के बराबर थे. हमें गुमला में छोड़ा गया. हमने भारत माता को चूमा और बोला- मातृभूमि ये देवतुल्य ये भारत भूमि हमारी."

बहल ये बताते-बताते काफ़ी भावुक हो गए और रोने लगे. शायद एक युद्धबंदी ही स्वदेश लौटने की ख़ुशी को समझ सकता है.

अमृत वाली चाय

अमरजीत बहल सात महीने बाद चीनी युद्धबंदी शिविर से स्वदेश लौटे.

बहल के मुताबिक़ भारत में आने के बाद उन्हें दुनिया की सबसे अच्छी चाय मिली. इस चाय में दूध और चीनी भी थी और वो चाय उनके लिए अमृत की तरह थी.

इसके बाद बहल और उनके साथियों को डी-ब्रीफिंग (एक प्रक्रिया, जिसके तहत युद्धबंदी बनने के बाद लौटने पर सैनिकों से गहन पूछताछ होती है) के लिए राँची भेजा गया.

वहाँ बहल को तीन दिन रखा गया. लेकिन इसके बाद उन्हें ऑल क्लियर दिया गया. इसके बाद वे छुट्टी पर गए और फिर अपनी रेजिमेंट में गए.

रिटायर्ड ब्रिगेडियर बहल युद्धबंदी बनाए जाने से निराश नहीं, लेकिन उनका मानना है कि उनके लिए ये अनुभव मीठा भी रहा और कड़वा भी. मीठा इसलिए क्योंकि एक जवान अधिकारी होने के नाते वे युद्ध में शामिल हुए, घायल भी हुए और युद्धबंदी भी बनाए गए.

कड़वा इसलिए क्योंकि बहल मानते हैं कि अगर वे क़ैद न होते, तो एक लड़ाई और कर लेते.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे