वसुंधरा सरकार का 'लोकसेवकों' पर अध्यादेश क्यों?

  • 21 अक्तूबर 2017
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राजस्थान में अब जजों, न्यायिक अधिकारियों, अफ़सरों और लोक सेवकों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज कराना कठिन होगा. इसके लिए सरकार ने अध्यादेश जारी किया है.

हुक्म है कि अब मजिस्ट्रेट भी बिना सरकार की अनुमति के इन मामलो में जांच का आदेश नहीं दे सकेगा. इसमें मीडिया के लिए भी हिदायत है. सरकार का कहना है कि उसे क़ानून के दुरुपयोग की शिकायतें मिल रही थीं.

इसे देख कर ही यह क़दम उठाया गया है. मानवाधिकार संगठनों ने इसे तानाशाहीपूर्ण क़दम बताया है. इन संगठनों ने विरोध का ऐलान किया है. सरकार के मुताबिक़ महाराष्ट्र में ऐसा क़ानून पहले से ही काम कर रहा है.

सरकार ने यह अध्यादेश कोई एक महीने पहले जारी किया था. मगर अब यह ज़मीन पर उतरा है. इसे विधानसभा में पेश कर क़ानून की शक्ल दी जाएगी. विधानसभा सोमवार से शुरू हो रही है.

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इसके तहत दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता में संशोधन किया जा रहा है. अध्यादेश के मुताबिक अब कोई भी व्यक्ति जजों, अफसरों और लोक सेवको के ख़िलाफ़ अदालत के ज़रिए एफआईआर दर्ज नहीं करा सकेगा. मजिस्ट्रेट बिना सरकार की इजाजत के न तो जाँच का आदेश दे सकेंगे न ही प्राथमिकी का दर्ज कराने का आदेश दे सकेंगे.

अध्यादेश के अनुसार अगर कोई नागरिक जजों, लोक सेवकों और अफ़सरों के ख़िलाफ़ शिकायत लेकर पहुंचेगा तो मजिस्ट्रेट बिना सरकार की इज़ाजत के कार्यवाही नहीं कर सकेंगे. इसमें सरकार अधिकतम 180 दिन में अनुमति दे सकेगी.

अगर इस मियाद में सरकार इजाजत न दे तो स्वतः ही इजाज़त समझी जाएगी. क़ानून के जानकार कहते है लोक सेवको में जन प्रतिनिधि भी आते हैं. अध्यादेश कहता है अगर किसी जज, लोक सेवक या न्यायिक अधिकारी के अपने पद पर रहते कार्य को आधार बनाकर शिकायत की जाती है तो बिना सरकारी अनुमति के एफआईआर दर्ज नहीं हो सकेगी.

अब तक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत कोई भी व्यक्ति मजिस्ट्रेट के यहां परिवाद दायर कर इन लोगो के ख़िलाफ़ एफआईआर का आदेश ले सकता था. राज्य के संसदीय मंत्री राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि राजस्थान ऐसा क़ानून लागू करने वाला महाराष्ट्र के बाद दूसरा राज्य है.

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वो इस अध्यादेश का मक़सद बयान करते हैं और कहते हैं, ''लगातार क़ानून के बेजा इस्तेमाल की शिकायतें मिल रही थीं. इसे लेकर पूरे देश में चिंता थी. मनगढ़ंत मुक़दमों से लोक सेवकों का मनोबल तोड़ा जा रहा था. कुछ लोग गिरोह के रूप में 156 (3) धारा का दुरुपयोग कर रहे थे.

राठौड़ ने कहा, 'बस इसमें इतनी सी शर्त लगाई गई है कि प्राथमिकी या जांच के लिए राज्य सरकार की अनुमति ज़रूरी होगी. सरकार पाबंद होगी कि वो 180 दिन की मियाद में इसका निवारण करे. अगर सरकार इज़ाजत में देर करे तो इसे स्वतः ही इज़ाजत माना जाएगा.

संसदीय कार्य मंत्री कहते अध्यादेश के लिए राष्ट्रपति से अनुमति ली गई है. साथ ही महाधिवक्ता से क़ानूनी सलाह ले ली गई है

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इस अध्यादेश पर मानवाधिकार संगठनों ने गंभीर सवाल उठाए हैं. पीपल्स यूनियन फोर सिविल लिबर्टीज की राष्ट्रीय अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव ने इसे लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक बताया है. उन्होंने कहा कि नागरिक संगठन इसके ख़िलाफ़ अदालत में जाएंगे और आंदोलन भी करेंगे.

कविता श्रीवास्तव ने कहा, ''यह लोकतंत्र के दो स्तंभ न्यायपालिका और मीडिया पर हमला है. मीडिया का गला घोंटा जा रहा है. अगर अदालत को सुनवाई और जांच के आदेश से रोका जा रहा है तो आप समझ सकते है लोकतंत्र का क्या अर्थ रह जाएगा. फिर लोग कहां फरियाद करेंगे.''

संसदीय कार्य मंत्री राठौड़ कहते हैं, ''ये सब बेकार की बाते हैं. लोकतांत्रिक अधिकारों पर कोई कुठाराघाट नहीं किया गया है, न ही प्रेस पर अंकुश की बात है.''

हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रेम कृष्ण शर्मा इस घटनाक्रम को चिंता के साथ देखते हैं. शर्मा कहते हैं ये प्रावधान लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है. 'इसमें अधिनायकवाद की बू आती है.

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