श्रीकृष्ण सिंह जयंती में लालू को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर मचा घमासान

  • 22 अक्तूबर 2017
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Image caption बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, साथ में हैं मोरारजी देसाई

बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की 130वीं जयंती को लेकर बीते 21 अक्टूबर को पटना में एक नहीं बल्कि तीन-तीन आयोजन हुए. ये तीनों आयोजन भले बिहार केसरी की विरासत के नाम पर हुए हों, लेकिन मुख्य रूप में ये राजनीतिक ताक़त दिखाने का मंच बनकर रह गए.

पहला आयोजन बिहार कांग्रेस की ओर से पार्टी मुख्यालय सदाकत आश्रम में किया गया. जिसमें प्रदेश अध्यक्ष कौकब क़ादरी के मुताबिक पार्टी के तमाम वरिष्ठ सदस्यों ने मिलकर श्रीबाबू को याद किया.

हालांकि इस आयोजन से ज़्यादा चर्चा उन दो आयोजनों की हो रही है जिससे बिहार के मौजूदा राजनीतिक घमासान का संकेत मिलता है. इन दो आयोजनों में एक ओर तो कांग्रेस- राष्ट्रीय जनता दल का गठबंधन था तो दूसरी ओर एनडीए के घटक दल.

हालांकि दिलचस्प ये है कि ये दोनों आयोजन आधिकारिक रूप से किसी राजनीतिक दल की ओर से नहीं किए गए थे. पहला आयोजन बापू सभागार में कांग्रेस के नेता अखिलेश प्रसाद सिंह की ओर से किया गया, जिसके मुख्य अतिथि लालू प्रसाद यादव थे. वहीं दूसरा आयोजन श्रीकृष्ण सिंह मेमोरियल हॉल में हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के नेता महाचंद्रा सिंह की अगुवाई में हुआ, जिसमें एनडीए के घटक दलों ने हिस्सा लिया.

बापू सभागार में हुए आयोजन की आलोचना ये कह कर हो रही है कि अगर कांग्रेस को श्रीबाबू जयंती जोरदार ढंग से मनानी थी, तो इसे सदाकत आश्रम में क्यों नहीं आयोजित किया गया.

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विपक्ष की एकजुटता

इस बारे में बिहार कांग्रेस अध्यक्ष कौकब क़ादरी कहते हैं, "सदाकत आश्रम में भी पार्टी की ओर से आयोजन किया गया था. दूसरा आयोजन अखिलेश जी सालों से करते आ रहे हैं, इस बार कांग्रेस और आरजेडी दोनों दल इस आयोजन में साथ थे. ताकि हम लोग विपक्ष की एकजुटता को प्रदर्शित कर सकें."

इतना ही नहीं, इस आयोजन पर लालू प्रसाद यादव को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर भी लोग सवाल उठा रहे हैं. बिहार जनता दल यूनाइडेट के प्रवक्ता और एमएलसी नीरज कुमार कहते हैं, "कांग्रेस ने लालू जी को मुख्य अतिथि बनाकर एक बार फिर ये दिखाया है कि वे लोग भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के बिना नहीं चल सकते."

इस जयंती समारोह के आयोजक कांग्रेसी नेता अखिलेश सिंह कहते हैं, "हम लालू जी को मुख्य अतिथि नहीं बनाते तो क्या आरएसएस या बीजेपी के नेता को बनाते या नीतीश कुमार को बनाते? आप बताइए. लालू जी को मुख्य अतिथि इसलिए बनाया क्योंकि वे धर्मनिरपेक्ष राजनीति के प्रमुख स्तंभ हैं और कांग्रेस पार्टी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी हैं."

उधर दूसरी ओर, श्रीकृष्ण सिंह मेमोरियल हॉल में आयोजित समारोह में पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी और राज्य के मौजूदा उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी शामिल हुए.

सुशील मोदी ने लालू प्रसाद यादव की पार्टी के कांग्रेस के साथ गठबंधन पर भी चुटकी लेते हुए याद दिलाया कि श्रीबाबू ने बिहार के विकास का जो सपना देखा था, उन्हें उनकी ही पार्टी के लोग तोड़ने में लगे हुए हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर लालू के कार्यकाल को निशाना बनाया.

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अखिलेश सिंह की दावेदारी

अखिलेश सिंह के आयोजन के बारे में ये भी कहा जा रहा है कि इसके ज़रिए प्रदेश पार्टी अध्यक्ष बनने के लिए उन्होंने अपनी दावेदारी को मज़बूती दी है.

सुशील मोदी ने अपने संबोधन में इसकी ओर इशारा भी किया, हालांकि इस बारे में अखिलेश सिंह का कहना है कि ये आयोजन पार्टी की सहमति से किया गया था और इसमें मीरा कुमार, शकील अहमद और निखिल कुमार जैसे तमाम बड़े नेता शामिल हुए.

वैसे बिहार कांग्रेस पार्टी के अंदर एक तरह से गुटबाजी का माहौल दिख रहा है. माना जा रहा है कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी की अगुवाई में एक खेमा कांग्रेस-आरजेडी गठबंधन से अलग बीजेपी-जेडीयू गठबंधन से हाथ मिलाने की तैयारी कर रहा है.

इस खींचतान पर टिप्पणी करते हुए लालू प्रसाद यादव ने बिहार कांग्रेस के नेताओं को मिलजुल कर बीजेपी-जेडीयू गठबंधन का मुक़ाबला करने की अपील की. हालांकि कौकब क़ादरी दावा करते हैं कि इस आयोजन को लेकर पूरी पार्टी एकजुट थी.

वैसे राजनीतिक गलियारों में अखिलेश सिंह को बिहार प्रदेश की ज़िम्मेदारी दिए जाने की चर्चा भी लगातार चल रही है, कई लोग उन्हें कांग्रेस में बाहरी नेता भी मानते हैं.

अखिलेश सिंह कांग्रेस से पहले राष्ट्रीय जनता दल के नेता ही थे और वे लालू प्रसाद यादव की सरकार में मंत्री रह चुके हैं. बाद में यूपीए एक के दौरान में वे राजद कोटे से केंद्र में मंत्री भी रहे है. लेकिन बाद में वे लालू की पार्टी से बाहर निकल कर कांग्रेस में चले आए.

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'पेट में दर्द क्यों?'

ऐसे में श्री कृष्ण सिंह की जयंती के बहाने लालू प्रसाद को मुख्य अतिथि बनाने को उनके, लालू प्रसाद के क़रीब जाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

हालांकि अखिलेश ख़ुद बताते हैं, श्रीबाबू की जयंती मनाने की शुरुआत उन्होंने लालू जी की मदद से ही 2000 में की थी और लालू इस आयोजन में 2001, 2002, 2008 और 2009 में शिरकत कर चुके हैं. लेकिन ये पहली बार है जब उनके इस आयोजन में हिस्सा लेने को लेकर इतनी चर्चा हो रही है.

अखिलेश सिंह कहते हैं, "हम लोग तो एनडीए के आयोजन पर कोई सवाल नहीं उठा रहे हैं. हमें तो ख़ुशी है कि बीजेपी और जेडीयू वाले भी श्रीबाबू के काम को समझ रहे हैं. लेकिन हमारे आयोजन को लेकर उन लोगों के पेट में इतना दर्द क्यों है?"

वहीं जीतन राम मांझी की पार्टी के सदस्य महाचंद्र सिंह कहते हैं, "लालू जी ने बिहार में सरकार बनाने के बाद जिस तरह से भूमिहारों और अगड़ों के प्रति रवैया अपनाया था, उसे देखते हुए समुदाय के सबसे बड़े नेता की जयंती पर उन्हें मुख्य अतिथि बनाना समुदाय को अपमानित करने जैसा है."

अखिलेश सिंह इस बारे में पूछे जाने पर कहते हैं, "महाचंद्र सिंह समुदाय विशेष के ठेकेदार तो नहीं हैं. विपक्ष की सारी मुश्किल की जड़ यहीं है. क्योंकि उन्हें लग रहा है कि हमारी एकजुटता से भारतीय जनता पार्टी के अगड़ों के वोट बैंक में सेंध लग सकता है."

बिहार में भूमिहारों की आबादी करीब सात फ़ीसद है और इन्हें परंपरागत तौर पर कांग्रेस का मतदाता माना जाता रहा था, हालांकि बीते दो दशक के दौरान इस समुदाय का झुकाव भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ देखने को मिला है. अखिलेश सिंह के दावा है कि अब ये स्थिति बदलने वाली है, लोग कांग्रेस को उम्मीद की तरह देख रहे हैं.

वहीं कौकब क़ादरी कहते हैं, "देखते जाइए अभी ये लोग श्रीबाबू का गुणगान कर रहे हैं, यह एक तरह से हमारे पहले प्रधानमंत्री नेहरू जी के कामों का गुणगान करना भी है. अब वे किस तरह से कह पाएंगे कि बीते 70 सालों में कुछ नहीं हुआ है."

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श्रीबाबू को भारत रत्न देने की मांग

उल्लेखनीय है कि भारतीय जनता पार्टी 2014 में केंद्र सरकार में आने के बाद से ही लगातार जवाहर लाल नेहरू के जमाने से आ रही कांग्रेसी सरकारों के काम पर टिका टिप्पणी करती आ रही है. हालांकि बिहार में बीजेपी की सहयोगी जेडीयू की राय इससे उलट है.

बिहार जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार कहते हैं, "हमारी पार्टी ने कभी नेहरू के कामों पर सवाल नहीं उठाए हैं. एक गठबंधन में दो दलों की राय अलग हो सकती है."

श्रीबाबू की जयंती और उसके लेकर मौजूदा खींचतान के बीच अहम सवाल ये भी है कि क्या श्रीबाबू के योगदान को रेखांकित किया जा सकेगा. 1947 से 1961 तक वे बिहार के मुख्यमंत्री रहे और इस दौरान बिहार के विकास की रूपरेखा तैयार करने और बरौनी से लेकर झारखंड के हटिया तक के कारखाने लगाने में उनकी अहम भूमिका रही.

आज अगड़ों के नेता के तौर आज उन्हें भले देखा जा रहा हो लेकिन सामाजिक न्याय की लड़ाई उन्होंने बिहार की सामंती समाज में शुरू की थी, उन्होंने ही देवघर के बाबा विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश सुनिश्चित किया था.

हालांकि उस दौर में बिहार में ज़मीन सुधार आंदोलन को पूरा नहीं किए जाने को लेकर उनकी आलोचना भी होती रही है.

पर बिहार केसरी को भारत रत्न दिए जाने की मांग समय समय पर उठती रही है, अखिलेश सिंह कहते हैं कि बीजेपी और जेडीयू की राज्य और केंद्र में सरकार है, उन्हें इस दिशा में क़दम उठाना चाहिए.

महाचंद्र सिंह भी कहते हैं, "हमने मांग की है कि श्रीकृष्ण सिंह को भारत रत्न मिलना चाहिए. पटना यूनिवर्सिटी का नाम भी उनके नाम पर किया जाना चाहिए. राज्य और केंद्र सरकार से हमारी भी ये मांग रहेगी."

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