मुस्लिम शासक भारत के लिए धब्बा या गौरव?

  • 23 अक्तूबर 2017
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ताजमहल को लेकर छिड़े विवाद में मुस्लिम शासकों और उनके दौर पर भी बहस चल रही है. भारतीय जनता पार्टी के कई नेता मुग़लों से जुड़ी पहचानों पर सवाल उठाते रहे हैं. इसमें चाहे ताजमहल हो या सड़कों के नाम.

बीजेपी विधायक संगीत सोम ने ताजमहल को भारतीय संस्कृति पर धब्बा बताया तो केंद्रीय मंत्री वीके सिंह अकबर रोड का नाम महाराणा प्रताप करने की मांग कर चुके हैं. इससे पहले औरंगज़ेब रोड का नाम अब्दुल कलाम रोड किया जा चुका है.

इसी साल मई में बीजेपी नेता शायना एनसी ने मुग़ल शासक अकबर की तुलना हिटलर से की थी. शायना ने ट्वीट कर कहा था, ''अकबर रोड का नाम महाराणा प्रताप मार्ग कर देना चाहिए. कल्पना कीजिए कि इसराइल में किसी सड़क का नाम हिटलर पर रहे! हमलोगों की तरह कोई भी देश दमनकारियों को सम्मान नहीं देता है.''

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इस तरह की बहस भारतीय राजनीति में कोई नई नहीं है. लेकिन इस बार की बहस में ख़ास बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी काफ़ी मज़बूत है. केंद्र के साथ ज़्यादातर राज्यों में भी उसकी सरकार है. ऐसे में बीजेपी का कोई नेता बयान देता है तो उसके कई मायने निकाले जाते हैं.

सवाल यह उठता है कि बीजेपी नेता मुग़ल शासकों को लेकर जो बाते कहते हैं उनका आधार क्या होता है? उन बातों का सच से सरोकार कितना होता है?

जर्मन-अमरीकी इतिहासकार एंड्रे गंडर फ्रैंक ने 'रीओरिएंट: ग्लोबल इकॉनमी इन द एशियन एज' नाम की किताब 1998 में लिखी थी. फ्रैंक का कहना था कि अठारहवीं शताब्दी के दूसरे हिस्से तक भारत और चीन का आर्थिक रूप से दबदबा था. ज़ाहिर है इसी दौर में सारे मुस्लिम शासक भी हुए.

उन्होंने इस किताब में लिखा है कि पूरे संसार पर दोनों देश हावी थे. यहीं से कई इतिहासकारों ने इस बात को आगे बढ़ाया. ज़्यादातर इतिहासकारों का यही मत है कि 18वीं शताब्दी के दूसरे हिस्से तक भारत और चीन हावी रहे. स्थिति तब बदली जब यूरोप का विस्तार शुरू हुआ और कई देशों में उपनिवेश बने. इसी दौरान अंग्रेज़ों का भारत पर क़ब्ज़ा हुआ.

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मुस्लिम होने की वजह से उपेक्षा?

इन विवादों के बीच मशहूर फ़िल्मकार और गीतकार जावेद अख़्तर ने कई ट्वीट किए हैं. जावेद अख़्तर ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए पूछा है कि उसके पास मुग़लों से जुड़ी जो जानकारियां हैं वो कहां से आती हैं. उन्होंने लिखा है कि ज्ञान, बुद्धि और शालीनता की सीमा हो सकती है पर किसी चीज़ की उपेक्षा करना तो बेवक़ूफ़ी है और अभी ऐसा ही हो रहा है.

जावेद अख़्तर ने लिखा है, ''संगीत सोम द्वारा इतिहास की उपेक्षा हैरान करने वाला है. क्या उन्हें कोई छठी क्लास के स्तर के इतिहास की किताब देगा. सर थॉमस रो जहांगीर के वक़्त में आए थे. उन्होंने लिखा है कि हम भारतीयों का जीवन स्तर औसत अंग्रेज़ों से अच्छा था.''

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जावेद अख़्तर ने अगले ट्वीट में लिखा है, ''मेरे लिए हैरान करने वाली बात यह है कि जो अकबर से नफ़रत करते हैं, उन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव से समस्या नहीं है. जो जहांगीर से नफ़रत करते हैं उन्हें वॉरेन हेस्टिंग से दिक़्क़त नहीं है जबकि वो वास्तविक लुटेरे थे.''

इस मामले में जावेद अख़्तर ने सदगुरु जग्गी पर भी निशाना साधा है. उन्होंने लिखा है, ''सद गुरु जग्गी का कहना है कि शाहजहां भारत से बाहर संपत्ति इसलिए नहीं भेज पाए क्योंकि उस वक़्त भेजने का कोई ज़रिया नहीं था. यह उपेक्षा और पूर्वाग्रह की हद है.''

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ऐतिहासिक दृष्टिकोण

भारतीय इतिहास में मध्यकाल को देखने के अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं. एक दृष्टिकोण वामपंथी इतिहासकारों का है. इनका मानना है कि मध्यकाल कई लिहाज़ से काफ़ी अहम था. वामपंथी इतिहासकारों का मानना है कि मध्यकाल में तेज़ी से शहरीकरण हुआ, स्थापत्य कला और केंद्रीकृत शासन प्रणाली का विकास हुआ.

सर थॉमस रो ब्रितानी राजा जेम्स प्रथम के पहले आधिकारिक राजदूत थे. उन्हें किंग जेम्स ने 17वीं शताब्दी में भारत में व्यापार की संभावनाओं की तलाश में भेजा था. मध्यकाल में सर थॉमस रो की यात्रा को ऐतिहासिक रिकॉर्ड के तौर पर देखा जाता है. जहांगीर के काल का सर थॉमस रो को एक अहम ऐतिहासिक स्रोत माना जाता है. थॉमस रो 1615 में भारत आए थे और 1619 तक रहे थे. थॉमस ने जहांगीर को दयालु शासक बताया था.

मध्यकाल को भारतीय जनता पार्टी के नेता जिस तौर पर पेश करते हैं उसमें कितनी सच्चाई है? मुस्लिम शासकों के वक़्त में लोगों का जीवन स्तर क्या था? लोगों के जीवन में कितनी ख़ुशहाली थी?

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भारत और चीन का दबदबा

मध्यकाल के इतिहासकार प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया कहते हैं, ''हर काल में जीवन के कई स्तर होते हैं. एक स्तर होता है कि बहुत अमीर लोग होते हैं, एक बीच का होता है और एक स्तर ग़रीबों का होता है. उस वक़्त भी हर स्तर के लोग थे. ऐसा प्राचीन काल, मध्यकाल और आधुनिककाल सभी में है.''

हरबंस मुखिया कहते हैं, ''मध्यकाल में आर्थिक प्रगति जमकर हुई थी. इसका अंदाज़ा हम इसी से लगा सकते हैं कि उस वक़्त चीन और भारत की जीडीपी दुनिया की कुल जीडीपी की क़रीब 50 फ़ीसदी थी. मध्यकाल में टेक्नोलॉजी भी काफ़ी बदली. मध्यकाल की कुछ टेक्नोलॉजी तो आज तक चल रही है. रेहट और कोल्हू मध्यकाल में ही आए. आज भी कोल्हू के नाम पर तेल बेचा जा रहा है.''

अगर इतना कुछ था तो भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के मन में नकारात्मकता क्यों है? मध्यकाल के मशहूर इतिहासकार इरफ़ान हबीब कहते हैं कि बीजेपी की असल समस्या मुग़लों के मुसलमान होने से है. इनके लिए जो मुसलमान है वो विदेशी ही होगा वाली सोच है.

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किसानों की हालत ठीक नहीं?

हालांकि मध्यकाल में आर्थिक प्रगति और ख़ुशहाली को लेकर इतिहासकार मीनाक्षी जैन अलग राय रखती हैं. मीनाक्षी जैन को दक्षिणपंथी इतिहासकार माना जाता है. मध्यकाल और अयोध्या पर इनकी किताबें काफ़ी विवादित रही हैं. हालांकि मीनाक्षी ख़ुद को मध्यमार्गी बताती हैं.

मुस्लिम शासकों में लोगों के जीवन स्तर पर मीनाक्षी जैन कहती हैं कि किसानों की हालत काफ़ी ख़राब थी. उन्होंने कहा, ''ख़िलजी के शासन में किसानों पर भारी कर लगाए गए थे. ख़राज, घराई और चराई तीन तरह के कर थे. तुग़लकों के शासन में और कर लगाए गए. इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बर्नी ने भी बताया है कि किसानों की हालत ठीक नहीं थी. किसानों के तीन वर्ग थे और तीनों की स्थिति बुरी थी.''

मीनाक्षी जैन कहती हैं, ''मुग़ल वंश में अकबर ने लैंड रेवेन्यू पॉलिसी बनाई थी. उस दौर में कई विदेश यात्री भारत आए थे. इन्होंने भारत के कई हिस्सों को देखा था. इन्होंने लिखा है कि किसान मुश्किलों के कारण खेती का काम छोड़ रहे थे. डच ट्रेडर पेनसार्ट और पीटर मुंडी ने लिखा है कि खेती उजड़ रही थी. यूरोपियन यात्रियों ने उस दौर के बारे में लिखा है कि ग्रामीणों और किसानों की स्थिति ठीक नहीं थी.''

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किसी से मुफ़्त में काम नहीं

मुग़ल शासकों के दौर में ग़रीबी कितनी थी? हरबंश मुखिया कहते हैं, ''ग़रीबी तो थी, लेकिन यूरोप के जो यात्री मुग़ल काल में आए उनके सफ़रनामा में भीख मांगने का कोई ज़िक्र नहीं है. ऐसा कहीं ज़िक्र नहीं है कि भीख मांगने वालों की भीड़ लगी रहती थी.''

उन्होंने कहा, ''अकाल की दस्तक तो हर दौर में रही है, बाढ़ भी आती थी लेकिन इन आपदाओं में प्रशासन की तरफ़ से मदद पहुंचाई जाती थी. एक तरह की व्यवस्था थी. जितनी इमारतों का निर्माण मुग़लकाल में हुआ में उनमें मज़दूरों को मज़दूरी दी जाती थी. किसी से मुफ़्त में काम नहीं कराया जाता था.''

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Image caption लाल किले पर पीएम मोदी

मुग़ल काल में तेज़ गति से शहरीकरण

मुग़लों के शासन में भारत और चीन की जीडीपी दुनिया की कुल जीडीपी का 50 फ़ीसदी होने के मायने आख़िर क्या हैं? हरबंस मुखिया कहते हैं, ''ज़ाहिर है कि उस ज़माने में जीडीपी की कोई परिकल्पना नहीं थी. इसका आकलन तो अब किया गया है. इसे पिछले 30 से 40 सालों में मापा गया है.

अकबर के ज़माने में शहरीकरण ख़ूब हुआ. इतिहासकार निज़ामुद्दीन अहमद बक्शी का कहना है कि अकबर के ज़माने में चार हज़ार शहर थे.

मुखिया ने कहा, ''अकबर के ज़माने तक जितने शहर थे उतने दुनिया में कहीं नहीं थे. आर्थिक प्रगति और जीडीपी मापने का एक तरीक़ा शहरीकरण भी होता है. कपड़ों का कारोबार ख़ूब फला-फूला था. इस ज़माने में दस्तकारी की अहम भूमिका रही. तब यूरोप की सारी कंपनियां भारतीय कपड़ों को ख़रीदने के लिए होड़ में लगी थीं. भारतीय मसालों की काफ़ी मांग थी. जैसे-जैसे इनकी मांग बढ़ती थी तो उत्पादन भी बढ़ता था. दस्तकारों की आमदनी काफ़ी बढ़ी.''

मुग़ल साम्राज्य में अकबर के आते-आते शासन व्यवस्था का केंद्रीकरण हुआ. पूरे साम्राज्य में लगभग एक व्यवस्था स्थापित हो गई थी.

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पेरिस से समृद्ध शहर दिल्ली

हरबंस मुखिया कहते हैं, ''मुग़ल काल में एक व्यवस्था काम कर रही थी. अगर आपको सामान एक जगह से दूसरी जगह ले जाना है तो पता रहता था कि कितना कर देना है. इस शासन व्यवस्था में लूटपाट की घटनाएं काफ़ी कम हुई थीं. उस दौरान की पेंटिंग्स में ग़रीबी का चित्रण तो है, लेकिन ऐसी पेंटिंग्स नहीं हैं जिसमें दिखे कि लोग भूख से मर रहे हैं. ऐसा हम कविताओं में भी देख सकते हैं. जो बात सर थॉमस रो ने कही है वैसी बातें कई लोगों ने कही है. दिल्ली और आगरा को पेरिस से समृद्ध शहर माना जाता था.''

बाबर बाहर से आए थे और हुमायूं का भी जन्म भारत से बाहर हुआ था. लेकिन अकबर समेत जितने मुग़ल शासक हुए सबका जन्म यहीं हुआ था. ये कभी विदेश नहीं गए. मुखिया कहते हैं, ''हर शासक अपने साम्राज्य का विस्तार करता है. अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य से लेकर अकबर तक ने यही किया.''

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