पंचायत का फ़रमान: शौचालय नहीं तो शादी नहीं

  • 24 अक्तूबर 2017
शौचालय, बाग़पत, उत्तर प्रदेश, पंचायत, ग्राम प्रधान, शादी, महिलाएं इमेज कॉपीरइट AJAY

'हम औरतें हैं, हमें तो हर चीज़ के लिए ज्यादा मेहनत करनी होगी' फ़िल्म 'टॉयलट: एक प्रेम कथा' में भूमि पेडनेकर का यह डायलॉग उन हज़ारों औरतों की तकलीफ़ बयां करता है जिन्हें खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाग़पत के बिजवाड़ा गांव की पंचायत ने औरतों की इसी तकलीफ़ को समझते हुए एक फ़ैसला लिया है. फ़ैसला ये है कि जिस घर में शौचालय नहीं होगा, वहां शादी नहीं होगी.

ये शर्त लड़के और लड़की दोनों की शादी के लिए होगी. यानी जिस घर में शौचालय नहीं होगा, वहां से न तो बहू लाएंगे और न ही वहां बेटी की शादी करेंगे.

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बीबीसी ने गांव के प्रधान अरविंद से बात की और पूछा कि इस फ़ैसले के पीछे क्या वजह थी.

उन्होंने कहा,''हमने शनिवार को पंचायती सर्वसमाज की बैठक की और हमें लगा कि बहू-बेटियों की इज्ज़त के लिए शौचालय होना ज़रूरी है. गांव-देहात में औरतें शाम होने के बाद शौच के लिए नहीं जा पातीं.''

क्या गांव की किसी लड़की के साथ हुई अनहोनी ने पंचायत को ये फ़ैसला लेने पर मजबूर किया?

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इस सवाल के जवाब में अरविंद ने कहा,''कोई अनहोनी तो नहीं हुई, लेकिन कई औरतों को नहर के किनारे शौच के लिए जाना पड़ता है जहां पर किसानों का आना-जाना रहता है. ऐसे में औरतों के लिए बड़ी शर्मिंदगी वाली स्थिति हो जाती है. इसलिए हमने ये फ़ैसला लिया.''

उन्होंने बताया कि गांव में तक़रीबन 1000-1200 लड़कियां हैं जिनकी शादी मुज़फ़्फरनगर और शामली ज़िले के गांवों में होती है और वहां के कुछ 20-25% घरों में अब भी शौचालय नहीं है.

मुज़फ़्फरनगर और शामली पर फ़ैसले का असर

तो क्या बागपत पंचायत के फ़ैसले के बाद मुज़फ़्फरनगर और शामली जिले के लड़के कुंवारे रह जाएंगे. इस पर हमने शामली ज़िले के बाबरी गांव के प्रधान आनंद पाल से बात की. उनके मुताबिक उनके गांव में 180 घरों में शौचालय नहीं था, लेकिन ज़िला प्रशासन को चिट्टी लिख कर अनुदान मांगा है. अब समस्या 40 घरों की है. वहां भी जल्द टॉयलेट बनावा लिए जाएंगे."

मुज़फ़्फरनगर के लूसाना गांव के प्रधान अनिल ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "फ़ैसला सही है. हमारे यहां लड़कों की शादी में दिक्कत नहीं आएगी क्योंकि 1000 में से 60 घरों में ही अब शौचालय नहीं है. वहां भी हम शौचालय बनवा रहे है. लेकिन कुछ गांव में इस फैसले के बाद शादी न होने की समस्या हो सकती है."

क्या सोचते हैं स्थानीय लोग?

बागपत ज़िले के हिलवाड़ी गांव की अंजलि कहती हैं,''हमें खुशी है कि पंचायत औरतों के बारे में सोच रही है. खेतों में शौच करने से गंदगी फैलती है और बीमारियां होती हैं. पंचायत को गरीब लोगों के लिए शौचालय बनाने में मदद भी करनी चाहिए.''

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सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में शौचालय बनवाने के लिए 10,28,541 अर्जियां मिली थीं. इनमें से 2,72,822 बन चुके हैं या इन पर काम शुरू हो गया है. यानी अब भी लगभग 8 लाख टॉयलट बनाए जाने बाकी हैं.

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Image caption अंजलि

बावली गांव के रहने वाले सुरेंद्र पवार का कहना है कि शौचालय न होने से सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओँ को ही होती है, इसलिए यह पहल अच्छी है.

हालांकि सुरेंद्र ये भी मानते हैं कि बिना शौचालय वाले घरों में शादी न करने का फ़ैसला कुछ ज्यादा ही सख़्त है. उन्होंने कहा,''कई बार लोगों की मजबूरियां होती हैं. इसलिए बेहतर ये होगा कि जिसके घर में शौचालय नहीं है वहां मिलकर शौचालय बनवाया जाए.''

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Image caption सुरेंद्र पवार

इस पर ग्राम प्रधान अरविंद ने कहा कि वो गरीब तबके के लोगों की आर्थिक मदद करने के लिए भी तैयार हैं.

बीबीसी ने अरविंद से पूछा कि क्या उनकी इस पहल के पीछे स्थानीय प्रशासन का भी हाथ है? इसके जवाब में उन्होंने बताया कि यह पूरी तरह से गांव के लोगों और पंचायत का फ़ैसला है और इसके ज़रिए उन्होंने 'स्वच्छ भारत मिशन' को आगे ले जाने की कोशिश की है.

लोगों की राय

बिजवाड़ा गांव की पायल कहती हैं, "पंचायत के फैसले के पहले ही मैंने ये फैसला कर लिया था, वहीं शादी करुंगी जहां शौचालय होगा."

मलकपुर गांव की रितिका कहतीं हैं, "एक तरफ तो बड़े बूढ़े कहते हैं लड़कियों को पर्दा करना चाहिए, दूसरी तरफ घर पर लड़कियों के लिए टॉयलेट नहीं होता. कम ये कम इस फैसले के बाद टॉयलेट बनेंगे तो."

स्वच्छ भारत मिशन: कितनी सफ़ाई.. कितनी गंदगी..

हालात कितने खराब हैं, इसका अंदाजा भारत सरका के स्वच्छता मिशन रिपोर्ट के आंकड़ों पर नज़र डालने से पता चलता है.

रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण भारत में अब भी 52.1% लोग खुल में शौच करने जाते हैं यानी भारत के गांवों की आधे से अधिक आबादी खुले में शौच के लिए जाती है. शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 7.5 फ़ीसदी है.

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