राजस्थान: विवादित बिल विधानसभा में पेश, बीजेपी में भी विरोध के सुर

  • 24 अक्तूबर 2017
राजस्थान, वसुंधरा राजे सिंधिया इमेज कॉपीरइट Getty Images

राजस्थान में लोक सेवकों के विरुद्ध मुक़दमा दर्ज करने से पहले सरकारी इजाज़त ज़रूरी करने संबधी विधेयक पर विरोध के स्वर तेज हो गए हैं.

इस प्रस्तावित क़ानून के विरोध में कांग्रेस विधायकों ने सोमवार को विधानसभा में जमकर हंगामा किया. इस विधेयक को अदालत में भी चुनौती दी गई है.

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सियासी तूफ़ान

इसके तहत अब किसी भी लोक सेवक और जज के विरुद्ध सरकार की इजाज़त के बगैर मुकदमा दर्ज कराना आसान नहीं होगा. साथ ही मीडिया भी ऐसे मामलों को रिपोर्ट करने पर दंड का भागीदार होगा.

विपक्ष में बैठी कांग्रेस को यकायक मुद्दा मिल गया. कांग्रेस विधायक सोमवार को मुँह पर काली पट्टी बांधे मार्च करते हुए विधानसभा तक आए और जमकर विरोध किया.

यह विधानसभा सत्र का पहला दिन था. विपक्ष के विधायकों ने यह मुद्दा उठाने की कोशिश की. मगर उन्हें इसकी इजाज़त नहीं दी गई. इस पर विधायक वॉकआउट कर गए.

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बीजेपी में भी विरोध

सत्तारूढ़ बीजेपी के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी भी इस क़ानून के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए है. तिवाड़ी ने कहा, "मुझे जानबूझकर सदन में बोलने की अनुमति नहीं दी गई."

उन्होंने कहा, "यह आपातकाल जैसा क़दम है. इसे सहन नहीं किया जा सकता. ये सत्ता के शीर्ष पर बैठे कुछ लोगों को बचाने के लिए उठाया गया कदम है."

इस सियासी हंगामे से बेपरवाह बीजेपी सरकार ने साफ-साफ कहा है इस क़ानून की ज़रूरत है. राज्य बीजेपी के अध्यक्ष अशोक परनामी ने प्रेस से कहा, "न तो यह अभिव्यक्ति के विरुद्ध है, न ही इससे किसी लोकतांत्रिक अधिकार का हनन होगा."

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राज्य के संसदीय कार्य मंत्री राजेंद्र राठौड़ के मुताबिक़, "विधयेक को सदन के पटल पर रख दिया गया है. सदन जल्द ही तय करेगा कि किस दिन इस पर चर्चा होगी."

सरकार का कहना है कि विपक्ष चर्चा के लिए आमंत्रित है. राज्य के एक मंत्री श्रीचंद कृपलानी ने विपक्ष पर चर्चा से मुंह चुराने का आरोप लगाया है.

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इस बीच, राष्ट्रीय जनता पार्टी के विधायक किरोड़ी लाल मीणा और निर्दलीय विधायक माणक सुराणा भी विपक्ष के साथ खड़े हो गए हैं. राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता रामेश्वर डूडी और कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने सरकार पर जमकर प्रहार किए.

इस दौरान जयपुर के एक वकील अजय जैन ने प्रस्तावित क़ानून को संविधान के ख़िलाफ़ बताते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी है.

पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने कहा है कि वे इस विधेयक को अदालत में चुनौती देंगे. एडिटर्स गिल्ड ने भी इस कानून का विरोध किया है.

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पत्रकार संगठनों का विरोध

राजस्थान मे पत्रकार संगठनों ने इस कानून का विरोध किया है.

जयपुर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष और श्रमजीवी पत्रकार संघ की राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य ईश मधु तलवार ने सभी पत्रकार संगठनों से एकजुट होकर इस विधयेक का विरोध करने का आह्वान किया है.

राज्य के विधानसभा चुनावों में अभी एक साल बाकी है. सत्तारूढ़ बीजेपी विपक्ष के मुक़ाबले अधिक संगठित और योजनाबद्ध होकर काम करती नजर आ रही थी. मगर इस विधयेक ने यकायक कमजोर नज़र आ रहे विपक्ष को हरकत में ला दिया है.

'बीजेपी की रणनीतिक भूल'

राजस्थान में बीजेपी चार साल से सत्ता में है. राज्य में कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ. लेकिन हाल में जब शेखावाटी क्षेत्र में किसान आंदोलन के दौरान जिस तरह से जनता सड़कों पर उमड़ी, उसने पक्ष-विपक्ष दोनों को चिंतित कर दिया.

यह आंदोलन सरकार की नीतियों और कामकाज के विरुद्ध था. प्रेक्षक कहते है यह आंदोलन मुख्य विपक्षी दल के प्रभाव से भी दूर था. इसने सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को चौकन्ना कर दिया.

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विश्लेषक प्रोफेसर राजीव गुप्ता कहते हैं कि इस सबसे निबटने के लिए सरकार को लगा चुनाव के पहले कुछ ऐसा किया जाए कि कोई विरोध न हो. क्योंकि सरकार अपनी साख खो चुकी थी और यह आम धारणा बन चुकी थी कि सरकारी दफ्तरों में बिना लेन-देन कोई काम नहीं होता है. ऐसे में लोग कानून का सहारा लेते और अदालत के जरिए राहत के लिए कदम बढ़ाते.

प्रोफेसर गुप्ता कहते हैं कि अपनी खोई साख बहाल करने के लिए या तो लोकतांत्रिक तरीके से काम किया जाता या फिर निरकुंश ढंग से चीजों को संभाला जाता, सरकार ने बाद वाला विकल्प चुना. इससे पहले भी सरकार ने कथित रूप से मनगढ़ंत मुकदमों को रोकने के लिए कानूनी उपाय किए थे. लेकिन इसका कोई फायदा नहीं निकला.

इसका मतलब है कि सरकार लंबे समय से इस पर काम कर रही थी और उसे लगा चुनाव के पहले सब कुछ उसके नियंत्रण में होना चाहिए. मगर सरकार का यह कदम उल्टा पड़ गया. जानकर कहते है कि बीजेपी ने इस कानून के जरिए रणनीतिक भूल की है क्योंकि अब उसे आपातकाल के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरने में मुश्किल होगी.

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