कश्मीर पर कितनी कारगर रहेगी मोदी सरकार की ये पहल?

  • 24 अक्तूबर 2017
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Image caption राजनाथ सिंह के साथ दिनेश्वर शर्मा

कश्मीर के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी सरकार ने सभी संबंधित पक्षों से बातचीत करने के लिए खुफिया ब्यूरो के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को नियुक्त किया है.

केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को इसकी घोषणा की.

राजनाथ सिंह ने कहा कि दिनेश्वर शर्मा जम्मू और कश्मीर के सभी संबंधित पक्षों से बातचीत के लिए केंद्र के प्रतिनिधि के तौर पर काम करेंगे.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ राजनाथ सिंह ने हुर्रियत से बातचीत के सवाल पर कहा कि दिनेश्वर शर्मा इसका फैसला करेंगे.

बीबीसी हिंदी के संवाददाता वात्सल्य राय ने इसी मसले पर डॉक्टर राधा कुमार से बातचीत की.

शिक्षाविद् राधा कुमार पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के दौर में बनाए गए तीन-सदस्यीय कश्मीर वार्ताकार दल की सदस्य थीं.

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Image caption यूपीए सरकार ने कश्मीर पर बातचीत के लिए तीन सदस्यीय वार्ता दल भेजा थे जिसके सदस्य थे, राधा कुमार, दिलीप पडगांवकर, एमएम अंसारी

राधा कुमार का नज़रिया

ये कदम तीन साल पहले ही उठाया जाना चाहिए था. इन्होंने बहुत वक्त लगा दिया. फिर भी खुशी की बात है कि ये अब किया जा रहा है. ये घोषणा मेरे लिए तो खुशी की बात है.

पूर्व सरकार ने भी तीन लोगों की एक कमिटी बनाई थी. कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में सबसे ज्यादा जोर विश्वास बहाली पर दिया था.

लेकिन उस कमिटी की कई सिफारिशों पर सरकार ने अमल नहीं किया और इन सब के बीच एक और नई कमिटी बनाई गई है.

मैं मानती हूं कि उस वक्त यूपीए सरकार ने हमारी रिपोर्ट की सिफारिशों पर अमल नहीं किया.

हमने अपनी रिपोर्ट में पिछली कमिटियों की रिपोर्ट को समाहित करने की कोशिश की थी. खासकर राजनीतिक सिफारिशों पर कार्रवाई करना बहुत जरूरी था.

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Image caption नई दिल्ली में हुर्रियत नेताओं के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, तस्वीर 23 जनवरी, 2004 की है

वाजपेयी के वक्त

लेकिन अब क्या कहा जा सकता है. जो गुजर गया सो गुजर गया. अब ये सोचना कि कितनी नाइंसाफी हुई है, कोई मायने नहीं रखता.

इसको अगर कुछ हद तक भी ठीक जा सके तो कुछ तो शुरुआत होगी. राजनीतिक स्तर पर बातचीत की जरूरत के मद्देनज़र एक नौकरशाह को वार्ता के लिए भेजा जा रहा है.

मैंने तो शुरू से ये माना है कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के साथ उच्च स्तरीय राजनीतिक वार्ता होनी चाहिए. वाजपेयी जी के वक्त ये हो चुका है.

मनमोहन सिंह के दौर में भी बातचीत की कोशिशें हुईं. ये बहुत जरूरी है कि जब उच्च स्तरीय राजनीतिक वार्ता चल रही हो तो और लोगों को भी वार्ता में शामिल किया जाना चाहिए.

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शांति प्रक्रिया

ऐसे लोगों की जरूरत है जो रोज काम कर सकें. प्रधानमंत्री अपने सारे काम छोड़कर केवल एक ही मुद्दे पर तो अकेले काम नहीं कर सकते.

इसलिए ऐसे लोगों को शामिल करने की जरूरत है जिन्हें इस बात का अनुभव है कि शांति प्रक्रिया को कामयाबी से कैसे अंजाम दिया जा सकता है.

वो रोजाना आधार पर बातचीत की गाड़ी आगे बढ़ाते रहें. जब कोई बड़ी बात बन जाए तो उस वक्त राजनीतिक नेतृत्व को आगे आना चाहिए.

कश्मीर की फिलहाल जो जमीनी स्थिति है, उसके मद्देनजर सरकार के इस फैसले को एक शुरुआत कहा जा सकता है.

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