तो कार्टून जगत को 'कॉमन मैन' नहीं मिल पाता..

  • 24 अक्तूबर 2017
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भारत में जब-जब राजनीतिक कार्टूनों की बात होगी, आर के लक्ष्मण के क़िरदार 'कॉमन मैन' के ज़िक्र के बिना कोई बात पूरी नहीं होगी.

लेकिन आरके लक्ष्मण के जीवन में एक समय ऐसा भी आया था कि वे इस क़िरदार को रचने का विचार त्याग चुके थे.

कॉमन मैन के कार्टून टाइम्स ऑफ़ इंडिया में 1951 में छपने शुरू हुए थे, 'यू सेड इट' के नाम से.

इस कांसेप्ट के बारे में आरके लक्ष्मण ने अपनी ऑटोबायोग्राफ़ी 'द टनल ऑफ़ टाइम' में लिखा है, "मैं सामान्य आदमी के इस कैरेक्टर को पहले भी दो चार बार इस्तेमाल कर चुका था. लेकिन उसे एक सिरीज़ के तौर पर चलाने का विचार बनाया तो मैंने संपादक को प्रस्ताव भेजा. उन्होंने अगले ही दिन से इसे शुरू करने का ऑफ़र दिया."

कॉमन मैन की नब्ज़ और लक्ष्मण..

लक्ष्मण के तंज भरे 6 बेजोड़ कार्टून

फिर ऐसा क्या हुआ कि लक्ष्मण ने ये विचार त्याग दिया.

इस बारे में उन्होंने आगे लिखा, "लेकिन मैं इस पर काम शुरू कर पाता उससे पहले ही इंग्लैंड के अख़बार 'इवनिंग स्टैंडर्ड' से ऑफ़र मिल गया, आइडिल रहे मशहूर कार्टूनिस्ट डेविड लो की जगह नौकरी करने के विचार से मैंने लंदन जाने का मन बना लिया."

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ज़ाहिर है उस दौर में इंग्लैंड में नौकरी करने का प्रस्ताव खासा आकर्षक था और आरके लक्ष्मण लंदन जाने की तैयारी करने लगे. हालांकि उसी दौरान उन्हें लंदन में रहने वाले अपने जान पहचान वाले मित्रों से पता चला कि 'इवनिंग स्टैंडर्ड' प्रबंधन उन दिनों आनन फ़ानन में नौकरियां ऑफ़र करता है और निकाल भी देता है.

इसके बाद लक्ष्मण ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया में बने रहने का फ़ैसला लिया और उसके बाद कॉमन मैन का क़िरदार आया और पूरी दुनिया में मशहूर हो गया.

पूरी दुनिया में मशहूर कॉमन मैन

टेढा चश्मा, मुड़ी-तुड़ी धोती, चारखाना कोट, सिर पर बचे चंद बाल वाले इस आदमी को देश के आम आदमी के तौर पर देखा जाने लगा. इस कार्टून का शीर्षक 'यू सेड इट' तब से लेकर अगले 50 सालों तक भारत के समसामायिक मुद्दों को बेबाकी से उकेरता रहा.

इस कार्टून कैरेक्टर के बारे में आरके लक्ष्मण की पुत्रवधू उषा लक्ष्मण बताती हैं, "उन्होंने केवल ये क़िरदार नहीं रचा था. बल्कि वे ज़िंदगी भर चाहते थे कि कॉमन मैन की मुश्किलों का हल निकले, ज़िंदगी थोड़ी आसान हो और व्यवस्था का फ़ायदा मिले."

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Image caption आरके लक्ष्मण अपने बड़े भाई आरके नारायण के साथ

लगातार 50 साल तक, हर साल के 365 दिनों तक आम आदमी से जुड़े मुद्दों को तलाशना और उसे उकेरना किसी चुनौती से कम नहीं. वो गूगल से पहले का दौर था. इस बारे में उषा लक्ष्मण बताती हैं, "वे काफ़ी पढ़ते थे, सूचनाएं एकत्रित करते थे. साढ़े आठ बजे ऑफ़िस पहुंचने के बाद उनका पहला काम ही होता था अख़बार पढ़ने का, देश दुनिया के 22 अख़बार पलटते थे. आम आदमी के बीच उठते बैठते थे, वहीं से मुद्दे पकड़ते थे."

अपने पिता के काम को याद करते हुए उनके बेटे श्रीनिवास लक्ष्मण कहते हैं, "मेरे पिता के कार्टून लोग आज भी याद करते हैं क्योंकि उनमें एक विजन दिखता है, वे दूरदर्शी थे. 1969 में नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर क़दम रखा था, लेकिन उससे 13 साल पहले ही उन्होंने मेरे जन्म दिन पर एक कार्टून बनाया था जिसमें उन्होंने मुझे चांद पर चहलक़दमी करते हुए दिखाया था."

चेक एंड बैलेंस का काम

आरके लक्ष्मण के इस कॉमनमैन का जलवा कैसा था और उस दौर के राजनेता उनकी कितनी कद्र किया करते थे. इसकी एक झलक आरके लक्ष्मण की ऑटोबायोग्राफ़ी के उस हिस्से में मिलती है जिसमें उन्होंने आपातकाल का ज़िक्र किया है.

लक्ष्मण ने लिखा है, "अख़बारों में सेंसरशिप लागू थी, मैंने कार्टूनों के विषय बदल दिए थे, हल्के-फुल्के कार्टून बना रहा था, लेकिन लग रहा था कि अब इसे बंद कर देना चाहिए. ऐसे ही एक दिन दिल्ली जाना हुआ और मैंने श्रीमती इंदिरा गांधी से मिलने का वक्त मांगा. मुझे अचरज हुआ कि मुझे वक्त मिल गया."

"मैंने उनसे मिलकर राजनीतिक कार्टूनिस्ट के तौर पर अपनी व्यथा बताई. उन्होंने इसके लिए नौकरशाहों को ज़िम्मेदार ठहराया और कहा कि आप अपना काम कीजिए क्योंकि लोकतंत्र में ऐसे व्यंग्य भरे कॉमेंट चेक एंड बैलेंस का काम करते हैं."

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हालांकि उन्होंने ये भी विस्तार से बताया कि तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने उनसे मुंबई (तत्कालीन बंबई) में मुलाकात करके सरकार की आलोचना वाले कार्टून बनाने बंद करने को कहा था. जब लक्ष्मण ने उनसे कहा कि मेरी बात श्रीमती गांधी से हो गई है तो शुक्ला ने उनसे कहा था 'जानता हूं लेकिन मेरी भी तो नौकरी है.'

ऐसे दबावों के बीच भी आरके लक्ष्मण आम लोगों की मुश्किलों के बहाने नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों पर तंज कसते रहे और राजनीतिक कार्टूनों की विधा को आसमान तक पहुंचा दिया. इन दबावों के बीच सरकारें कथित तौर पर तमाम तरह के प्रलोभन भी देती रहीं.

नहीं लेना चाहते थे सरकारी सम्मान

इन प्रलोभनों का आरके लक्ष्मण ने जिक्र किया है, "मैं इंदिरा गांधी की सरकार की तमाम योजनाओं पर कार्टून बना रहा था, तब एक दिन गृह मंत्रालय के एक अधिकारी का फ़ोन आया कि आपको सरकार पद्म भूषण देना चाहती है, अपनी स्वीकृति दें. मैंने मना करने का मन बनाया था, लेकिन मां ने कहा कि दो-दो बेटे को पद्म भूषण मिल जाएगा तो आख़िर में मैं मान गया. बड़े भाई आरके नारायण को ये सम्मान पहले मिल चुका था."

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24 अक्टूबर, 1921 को मैसूर के तमिल अय्यर परिवार में जन्मे लक्ष्मण जाने माने उपन्यासकार आरके नारायण के छोटे भाई थे. पिता स्थानीय स्कूल में हेडमास्टर थे. आठ भाई बहनों में सबसे छोटे लक्ष्मण की बचपन से ही दिलचस्पी स्केचिंग में ज़्यादा थी.

लेकिन कार्टूनिंग को लेकर उनकी धारणा स्कूली शिक्षा के दौरान तब बलवती हुई जब एक दिन कक्षा में लक्ष्मण टीचर की बात सुनने के बजाए स्केचिंग कर रहे थे.

इसका जिक्र करते हुए आरके लक्ष्मण ने अपनी ऑटोबायोग्राफ़ी 'द टनल ऑफ़ टाइम' में लिखा है, "मेरा ध्यान टीचर के पढ़ाने पर नहीं था, स्केचिंग कर रहा था. वे पास आए और मेरा कान पकड़कर उमेठने लगे कि तुम मेरा मजाक़ बना रहे हो. मुझे पहली बार कार्टून की ताक़त का अंदाज़ा हुआ."

कार्टून की ताक़त का अंदाज़ा

इसके बाद उन्होंने अपने भाई की शार्ट स्टोरीज, उपन्यास के लिए स्केचिंग का काम किया. टाइम्स पहुंचने से पहले हिंदू अख़बार के लिए स्केचिंग की, फ्री प्रेस जर्नल में बाल ठाकरे के साथ काम किया. लेकिन टाइम्स पहुंचने के बाद करियर के आख़िर तक वहीं रहे.

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उषा लक्ष्मण कहती हैं, "टाइम्स के काम के अलावा भी अलग अलग प्रोजेक्टों के फ़्रीलांस काम उनके पास आते थे, तो वो जब तक शारीरिक तौर पर सक्षम थे, लगातार काम करते रहे."

हालांकि आरके लक्ष्मण के बारे में ये भी कहा जाता है कि वे बेहद सख़्त मिज़ाज थे. प्राण जैसे मशहूर कार्टूनिस्ट ने तो यहां तक कहा था कि एक बार उन्होंने एक मीटिंग में उनसे मिलने की कोशिश भी की तो वो नहीं मिले थे.

समय के पाबंद थे लक्ष्मण

उनके व्यक्तित्व के इस पहलू के बारे में श्रीनिवास बताते हैं, "वे समय के बड़े पाबंद थे. अपने एक-एक मिनट का इस्तेमाल करना जानते थे. इसलिए उनकी ऐसी पहचान भी बन गई थी. मैं तो उनके ही दफ़्तर में काम करता था. दोपहर के एक बजे लंच का समय होता था, अगर तीन चार मिनट पहले आ जाता तो भी उनके केबिन के बाहर इंतज़ार करता और लेट हो जाने पर उनसे मिल नहीं पाता. ठीक एक बजे ही वे मुझसे मिलते थे."

हालांकि उनकी पुत्रवधू उषा लक्ष्मण कहती हैं, "घर के अंदर वे सबका ख़्याल रखते थे, परिवार के दूरदराज़ के लोगों के बारे में भी सोचते थे, इस ख़ूबी के चलते ही उन्होंने कॉमन मैन जैसा क़िरदार रचा." वैसे पिछले दिनों आरके लक्ष्मण की पोती रमनिका लक्ष्मण ने अपने दादा के 'कॉमन मैन' की तर्ज़ पर 'कॉमन वूमेन' का क़िरदार रचा है.

रमनिका लक्ष्मन ने इस बारे में बताया, "ये ग्रेट दादाजी की विरासत को आगे बढ़ाने जैसा है. कॉमन वूमेन का क़िरदार कॉमन मैन की पोती वाला है, जैसा मैं उनकी पोती हूं. इसके अलावा मैंने महिलाओं से जुड़ी समस्याओं और उनके निदान को भी विषय वस्तु में शामिल किया है."

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आरके लक्ष्मण को 2005 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया जबकि 1984 में उन्हें पत्रकारिता के लिए रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड मिला था. लक्ष्मण ऐसे इकलौते कार्टूनिस्ट होंगे जिनके किरदार कॉमन मैन की मूर्ति मुंबई और पुणे में लगी है.

2010 के बाद से आरके लक्ष्मण बीमार रहने लगे थे और 93 साल की उम्र में उनका निधन 26 जनवरी, 2015 को हुआ था. लेकिन राजनीतिक कार्टूनिंग में नेताओं के स्केचिंग के दौर से आगे निकलकर लक्ष्मण ने ऐसा क़िरदार गढ़ा जो लोगों के ज़हन में हमेशा मौजूद रहेगा.

आर के लक्ष्मण को याद करते हुए बीबीसी हिंदी के कीर्तिश भट्ट:

आर के लक्षमण वो नाम है जिसको इगनोर करना किसी कार्टूनिस्ट के लिए संभव नहीं है. कार्टूनिस्टों में भी शायद ही कोई ऐसा होगा जो उनसे प्रभावित ना हो.

उनका अध्ययन, उनके स्ट्रोक्स, उनका सेन्स ऑफ़ ह्यूमर, उनकी टाइमिंग, उनके कैरिकेचर और उनके पंच जैसी ख़ूबियों को अलग-अलग बाँटें तो आर के लक्ष्मण के भीतर से मेरे जैसे आधा दर्ज़न कार्टूनिस्ट निकाले जा सकते हैं.

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