क्या मायावती के कहने पर दलित बदलेंगे धर्म?

  • 27 अक्तूबर 2017
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पिछले दिनों आज़मगढ़ की रैली में जब बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती केंद्र सरकार पर हमला बोल रही थीं तो उन्होंने बीजेपी को एक चेतावनी भी दे डाली कि अगर दलितों का उत्पीड़न होता रहा और दलितों के प्रति बीजेपी सरकार ने रवैया नहीं बदला तो वो अपने समर्थकों समेत हिन्दू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लेंगी.

लोकसभा चुनाव के बाद और फिर विधानसभा चुनाव में बीएसपी को मिली करारी हार के बाद ये कहा जाने लगा था कि शायद दलित समुदाय पर मायावती का प्रभाव अब ख़त्म हो गया है, लेकिन मायावती के इस बयान के बाद दलित समुदाय एक बार फिर बीएसपी और मायावती के साथ खड़ा नज़र आ रहा है.

हालांकि जानकारों का कहना है कि इस समुदाय के वोट के खिसकने की आशंका के चलते ही मायावती ये दांव खेल रही हैं.

दरअसल, मायावती पिछले कुछ सालों से चुनाव भले ही हार रही हों, लेकिन ऐसा लगता है कि उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है. ख़ासकर अपने दलित वोटरों को किसी भी क़ीमत पर अपने साथ बनाए रखने के संबंध में.

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दलितों के साथ होने का मायावती को भरोसा

हिन्दू छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने की बात मायावती ने अकेले अपने लिए नहीं की, बल्कि समर्थकों को भी उसमें शामिल किया.

मतलब साफ़ है कि मायावती को भरोसा है कि दलित समुदाय अभी भी उनके साथ है और उनके कहने पर वो धर्म परिवर्तन जैसा बड़ा क़दम बिना सोचे-समझे उठा सकता है.

दलित मुद्दों पर लिखने वाले और बीएसपी को लंबे समय से कवर रहे लखनऊ के पत्रकार राजेंद्र कुमार गौतम कहते हैं, "मायावती का दलित मतदाता पिछले कुछ दिनों में खिसका ज़रूर है, लेकिन वो लौटकर नहीं आएगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता है. दूसरे दलित समुदाय का एक बड़ा हिस्सा अभी भी उनके साथ है और वो आबादी मायावती की इस क़दर 'भक्त' है कि वो उनके कहने पर कुछ भी कर सकती है."

चिनहट के पास स्थित एक दलित बस्ती में कुछ लोगों का साफ़ कहना था कि मायावती यदि उनके लिए लड़ती हैं तो वो भी मायावती के कहने पर कुछ भी कर सकते हैं. हालांकि बस्ती में सभी लोग यही बात कह रहे हों, ऐसा भी नहीं है.

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'दलितों के लिए मायावती ने कुछ नहीं किया'

23 साल के सुनील राज बीए पास हैं और एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं. उनका कहना था, "मायावती ने जिस तरह से दलितों का वोट लिया, उस हिसाब से उनके लिए किया नहीं. ग़रीब दलित आज भी उसी जगह है, जहां वो पचास साल पहले था. हां, ये बात अलग है कि कुछ दलितों की इस दौरान काफी तरक़्क़ी हुई. तो जिन्होंने तरक़्क़ी की है वो ज़रूर उनके कहने पर धर्म परिवर्तन करेंगे, लेकिन सभी दलित कर लेंगे, ऐसा नहीं है."

दरअसल, पिछले कुछ समय से राजनीतिक हलकों में ये बात चलने लगी कि दलित समुदाय अब मायावती का वोट बैंक नहीं रह गया.

ख़ासकर लोकसभा चुनाव के बाद ये आवाज़ मुखर हुई जब यूपी में उनकी पार्टी का एक भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका. हार का ये सिलसिला विधानसभा चुनाव में भी जारी रहा जब उसके केवल 17 उम्मीदवार जीत पाए.

लेकिन दलित समुदाय के तमाम लोगों से बातचीत करने के बाद ऐसा कतई नहीं लगता कि इस समुदाय पर उनकी पकड़ कमज़ोर हुई है. हज़रतगंज के पास अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए बने आंबेडकर छात्रावास में लगभग सभी का ये कहना था कि मायावती की पकड़ दलित समुदाय पर वैसी ही है जैसी कि पांच साल या दस साल पहले थे.

लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में पीएचडी कर रहे दलित छात्र एसपी सिंह कहते हैं कि बीजेपी की नीतियों के चलते जो दलित दूर होने की सोच रहा होगा, वो भी अब मायावती के साथ आ जाएगा.

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क्या लोग मायावती के कहने पर बदलेंगे धर्म?

छात्रावास के तमाम छात्र इस बात पर भी एक मत थे कि मायावती के कहने पर वो तत्काल बौद्ध धर्म अपना लेंगे. इतिहास के छात्र दिलीप कहते हैं, "बहनजी आह्वान करके तो देखें, लाखों की संख्या में लोग धर्म बदलने को तैयार बैठे हैं."

वहीं एक अन्य छात्र प्रकाश का कहना था कि मायावती अपने यहां सभी काम बौद्ध धर्म के रीति-रिवाज के साथ ही करती हैं और दलित समुदाय के दूसरे लोग भी वैसा ही करते हैं.

प्रकाश कहते हैं, "शादी-विवाह से लेकर तमाम दूसरे काम हम लोगों के यहां बौद्ध धर्म के अनुसार ही होते हैं. ये सब कर्म कांड कराने के लिए पंडित लोग पहले भी हमारे यहां नहीं आते थे और अब हमें उन्हें बुलाने की ज़रूरत ही नहीं है."

हालांकि जानकारों का कहना है कि मायावती ऐसा कहकर भारतीय जनता पार्टी पर दबाव डालना चाहती हैं लेकिन सवाल ये है कि इससे भारतीय जनता पार्टी का नुकसान क्या होगा, और धर्म बदल देने से मायावती का लाभ क्या होगा.

पत्रकार राजेंद्र गौतम कहते हैं, "बौद्ध धर्म में परिवर्तित होने की बात कहकर मायावती एक तरह से बीजेपी को ब्लैकमेल करना चाहती हैं. भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार हिंदू धर्म के विभाजन या फिर उसकी संख्या में कमी की बात को सोच भी नहीं सकता है. मायावती को लगता है कि यदि वो ऐसा कदम उठाने की धमकी देती हैं तो हो सकता है कि बीजेपी उनसे कुछ मुद्दों पर कोई छिपा समझौता कर ले और उन्हें सरकार की ओर से इसका कुछ लाभ मिल जाए."

बहरहाल, जहां तक बौद्ध धर्म स्वीकार करने की बात है तो मायावती के कट्टर समर्थकों के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं है और वो ऐसा आसानी से कर सकते हैं.

लेकिन सबसे अहम सवाल ये कि दलितों को बौद्ध बनाकर मायावती कोई राजनीतिक मक़सद हासिल करना चाहती हैं या दलितों का उत्थान या फिर दोनों.

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