विवेचना: होमी जहाँगीर भाभा ना होते तो कैसा होता भारत?

  • 24 जनवरी 2018
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Image caption होमी जहांगीर भाभा

भारत के वैज्ञानिक सर सीवी रमन के मुंह से अपने वैज्ञानिक दोस्तों के लिए तारीफ़ के शब्द मुश्किल से निकलते थे... सिवाए एक अपवाद को छोड़ कर... होमी जहाँगीर भाभा. रमन उन्हें भारत का लियोनार्डो डी विंची कहा करते थे.

अक्सर डबल ब्रेस्ट सूट पहनने वाले भाभा की वैज्ञानिक विषयों के साथ-साथ संगीत, नृत्य, पुस्तकों और चित्रकला में बराबर की रुचि थी. वैज्ञानिकों को भाषण देते हुए तो आपने देखा होगा लेकिन अपने साथियों का पोर्ट्रेट या स्केच बनाते हुए शायद नहीं.

आर्काइवल रिसोर्सेज़ फ़ॉर कंटेम्परेरी हिस्ट्री की संस्थापक और भाभा पर किताब लिखने वाली इंदिरा चौधरी कहती हैं, "मृणालिनी साराबाई ने मुझे बताया था कि भाभा ने उनके दो स्केच बनाए थे. यहां तक कि हुसैन का भी स्केच भाभा ने बनाया था.''

''जब हुसैन की पहली प्रदर्शनी मुम्बई में हुई थी तो भाभा ने ही उसका उद्घाटन किया था. जब भी बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स की प्रदर्शनी होती थी तो भाभा ज़रूर आते थे और वहां से अपनी संस्था के लिए पेंटिंग्स और मूर्तियां ख़रीदते थे."

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Image caption एम.एफ़. हुसैन

संगीत प्रेमी

जाने-माने वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर यशपाल ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च में अपने करियर के शुरू के दिनों में होमी भाभा के साथ काम किया था. उन्होंने कहा था कि 57 साल की छोटी सी उम्र में भाभा ने जितना कुछ हासिल किया, उसका दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता.

यशपाल ने बताया था, "संगीत में उनकी बहुत रुचि थी... चाहे वो भारतीय संगीत हो या पश्चिमी शास्त्रीय संगीत. किस पेंटिंग को कहां टांगा जाए और कैसे टांगा जाए.. फ़र्नीचर कैसा बनना है.. हर चीज़ के बारे में बहुत गहराई से वह सोचते थे. टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च में हर बुधवार को एकेडमिक कॉन्फ्रेंस होती थी और भाभा ने शायद ही कोई कोलोकियम (एकेडमिक कॉन्फ्रेंस) मिस किया हो. इस दौरान वह सबसे मिलते थे और जानने की कोशिश करते थे कि क्या हो रहा है और क्या नहीं हो रहा है."

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Image caption नेहरू और भाभा

जवाहरलाल नेहरू के 'भाई'

होमी भाभा जवाहरलाल नेहरू के काफ़ी नज़दीक थे और दुनिया के उन चुनिंदा लोगों में से थे जो उन्हें भाई कहकर पुकारते थे.

इंदिरा चौधरी कहती हैं, "नेहरू को सिर्फ़ दो लोग भाई कहते थे... एक थे जयप्रकाश नारायण और दूसरे होमी भाभा. हमारे आर्काइव में इंदिरा गांधी का एक भाषण है जिसमें वह कहती हैं कि नेहरू को भाभा अक्सर देर रात में फ़ोन करते थे और नेहरू हमेशा उनसे बात करने के लिए समय निकालते थे. एक अंग्रेज़ वैज्ञानिक थे पैट्रिक बैंकेट जो डीआरडीओ के सलाहकार होते थे... उनका कहना था कि नेहरू को बौद्धिक कंपनी बहुत पसंद थी और होमी भाभा से वह कंपनी उन्हें मिला करती थी."

भाभा का सोचने का दाएरा काफ़ी विस्तृत था. वो वर्तमान के साथ-साथ आने वाले समय की ज़रूरतों को भी उतना ही महत्व देते थे.

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आगे की सोच

जाने-माने वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर एमजीके मेनन एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाया करते थे, "एक बार मैं उनके साथ देहरादून गया था. उस समय पंडित नेहरू वहाँ रुके हुए थे. एक बार हम सर्किट हाउस के भवन से निकलकर उसके ड्राइव वे पर चलने लगे. उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या आप इस ड्राइव वे के दोनों तरफ़ लगे पेड़ों को पहचानते हैं. मैंने कहा इनका नाम स्टरफ़ूलिया अमाटा है."

प्रोफ़ेसर मेनन ने बताया था, "भाभा बोले मैं इसी तरह के पेड़ ट्रॉम्बे के अपने सेंट्रल एवेन्यू में लगाने वाला हूँ. मैंने कहा होमी आपको पता है इन पेड़ों को बड़ा होने में कितना समय लगता है. उन्होंने पूछा कितना? मैंने कहा कम से कम सौ साल. उन्होंने कहा इससे क्या मतलब. हम नहीं रहेंगे. तुम नहीं रहोगे लेकिन वृक्ष तो रहेंगे और आने वाले लोग इन्हें देखेंगे जैसे हम इस सर्किट हाउस में इन पेड़ों को देख रहे हैं. मुझे ये देखकर बहुत अच्छा लगा कि वो आगे के बारे में सोच रहे थे न कि अपने लिए."

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साठ साल पहले पेड़ों का ट्रांसप्लांट

भाभा को जुनून की हद तक बागवानी का शौक था. टीआईएफ़आर और बार्क की सुंदर हरियाली का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है.

इंदिरा चौधरी कहती हैं, "टीआईएफ़आर में एक गार्डेन है जिसका नाम है अमीबा गार्डेन. वो अमीबा की शक्ल में है. उस पूरे गार्डेन को उन्होंने अपने ऑफ़िस में देखकर तीन फ़ीट शिफ़्ट किया था क्योंकि उन्हें वह अच्छा नहीं लग रहा था. उन्हें परफ़ेक्शन चाहिए था. भाभा ने सभी बड़े-बड़े पेड़ों को ट्रांसप्लांट किया. एक भी पेड़ को काटा नहीं. पहले पेड़ लगाए गए और फिर बिल्डिंग बनाई गई. मुझे ये चीज़ इसलिए याद आ रही है क्योंकि बेंगलुरु में मेट्रो बनाने के लिए हज़ारों पेड़ काट डाले गए. सालों पहले भाभा ने सोचा था कि पेड़ों को काटने के बजाए ट्रांसप्लांट किया जा सकता है."

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खाने के शौक़ीन भाभा

भाभा लीक से हटकर चलने में यक़ीन रखते थे. वाकपटुता में उनका कोई सानी नहीं था और न ही आडंबर में उनका यक़ीन था.

इंदिरा गांधी के वैज्ञानिक सलाहकार रहे प्रोफ़ेसर अशोक पार्थसारथी कहते हैं, "जब वो 1950 से 1966 तक परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष थे, तब वो भारत सरकार के सचिव भी हुआ करते थे. वो कभी भी अपने चपरासी को अपना ब्रीफ़केस उठाने नहीं देते थे. ख़ुद उसे लेकर चलते थे जो कि बाद में विक्रम साराभाई भी किया करते थे. वो हमेशा कहते थे कि पहले मैं वैज्ञानिक हूँ और उसके बाद परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष. एक बार वो किसी सेमिनार में भाषण दे रहे थे तो सवाल जवाब के समय एक जूनियर वैज्ञानिक ने उनसे एक मुश्किल सवाल पूछा. भाभा को ये कहने में कोई शर्म नहीं आई कि अभी इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं है. मैं कुछ दिन सोच कर इसका जवाब दूंगा."

बहुत कम लोगों को पता है कि होमी भाभा खाने के बहुत शौक़ीन थे. इंदिरा चौधरी याद करती हैं कि परमाणु वैज्ञानिक एमएस श्रीनिवासन ने उनसे बताया कि एक बार वॉशिंगटन यात्रा के दौरान भाभा का पेट ख़राब हो गया. डॉक्टर ने उन्हे सिर्फ़ दही खाने की सलाह दी.

भाभा ने पहले पूरा ग्रेप फ़्रूट खाया, पोच्ड अंडों, कॉफ़ी और टोस्ट पर हाथ साफ़ किया और फिर जाकर दही मंगवाई और वो भी दो बार और ये तब जब उनका पेट ख़राब था.

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Image caption होमी भाभा दाईं तरफ़ और बाएं छोर पर आइंस्टीन

नोबेल के लिए नामांकन

भाभा का एक कुत्ता हुआ करता था. उसके बहुत लंबे कान होते थे जिसे वो क्यूपिड कहकर पुकारते थे और रोज़ उसे सड़क पर घुमाने ले जाते थे. जैसे ही भाभा घर लौटते थे वो कुत्ता दौड़कर उनके पास आकर उनके पैर चाटता था. जब भाभा का एक विमान दुर्घटना में निधन हुआ तो उस कुत्ते ने पूरे एक महीने तक कुछ नहीं खाया.

रोज़ डॉक्टर आकर उसे दवाई देते थे लेकिन वो कुत्ता सिर्फ़ पानी पिया करता था और खाने को हाथ नहीं लगाता था. वो ज़्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह पाया. भाभा भी इंसान थे. हर इंसान पूरी तरह परफ़ेक्ट नहीं होता. भाभा भी इसके अपवाद नहीं थे. उनकी सिर्फ़ एक कमी थी कि वो वक़्त के पाबंद नहीं थे.

इंदिरा चौधरी कहतीं हैं, "हर इंसान में कुछ अच्छे गुण होते हैं तो कुछ बुरे. बहुत लोग बताते हैं कि उन्हें समय का कोई ध्यान नहीं रहता था. जो लोग उनसे मिलने का अप्वॉयमेंट लेते थे वो इंतज़ार करते रहते थे. यहाँ तक कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी, वियना में वह कभी-कभी बैठकों में बहुत देर से आते थे. उन लोगों ने इसका इलाज ये निकाला था कि वह मीटिंग से आधा घंटा पहले ही उसके होने की घोषणा करते थे ताकि भाभा के देर से आने का बहाना न मिल पाए."

भाभा को पाँच बार भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया. भाभा के जीवन की कहानी आधुनिक भारत के निर्माण की कहानी भी है.

उनको श्रद्धांजलि देते हुए जेआरडी टाटा ने कहा था, "होमी भाभा उन तीन महान हस्तियों में से एक हैं जिन्हें मुझे इस दुनिया में जानने का सौभाग्य मिला है. इनमें से एक थे जवाहरलाल नेहरू, दूसरे थे महात्मा गाँधी और तीसरे थे होमी भाभा. होमी न सिर्फ़ एक महान गणितज्ञ और वैज्ञानिक थे बल्कि एक महान इंजीनियर, निर्माता और उद्यानकर्मी भी थे. इसके अलावा वो एक कलाकार भी थे. वास्तव में जितने भी लोगों को मैंने जाना है और उनमें ये दो लोग भी शामिल हैं जिनका मैंने ज़िक्र किया है, उनमें से होमी अकेले शख़्स हैं... जिन्हें 'संपूर्ण इंसान' कहा जा सकता है."

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