नज़रिया: ' 84 के दंगे में जान बचानेवाले पुलिसवालों को नहीं मिला वाजिब सम्मान'

  • 31 अक्तूबर 2017
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पिछले 33 सालों से साल दर साल 1984 के सिख दंगों लेकर चर्चा होती रही है. हालांकि, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अभी तक पीड़ितों की समस्याओं का समाधान नहीं हो सका है.

इस दौरान संसद में कार्रवाइयों की अलग-अलग रिपोर्टें भी पेश की गईं, जिसके बाद निर्वाचित सांसद जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार जैसे सांसदों को इस्तीफ़ा भी देना पड़ा. इसके अलावा एक सिख प्रधानमंत्री ने देश और सिख समुदाय से माफ़ी भी मांगी.

दंगे की घटना पर लगातार उथल-पुथल के बाद यह मुद्दा आज तक ठंडा नहीं हो पाया है और अख़बारों में छपने वाले लेख और विरोधी टिप्पणियां इसको ताज़ा रखती हैं. मैं ख़ुद नवंबर 1984 के उस दिन के बारे में सोचने लगता हूं, जब मेरी मुलाक़ात उस दौरान पहले पत्रकार से हुई थी.

शायद वो प्रताप चक्रवर्ती थे, जो उत्तरी दिल्ली इलाक़े में भटकते हुए मेरे रास्ते में आ गए थे. यह घटना 31 अक्टूबर को दंगा शुरू होने के पांच दिन बाद हुई थी.

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शीशगंज गुरुद्वारे के बाहर चलाई गोली

मैंने चिल्लाते हुए उनसे पूछा था, "तुम सब इतने दिनों से कहां थे?"

"आप कहां थे जब मैंने सिखों की हत्या शुरू होने से पहले फ़ायरिंग शुरू की थी?"

मैंने शीशगंज गुरुद्वारे को बचाने के लिए फ़ायरिंग शुरू की थी. मैं चांदनी चौक में भयभीत और साथ ही उग्र सिखों को हिंसक भीड़ से हिफ़ाज़त करने और परिस्थितियों को काबू करने की कोशिश कर रहा था.

इसके अलावा मैं इस बात को लेकर भी दुखी था कि पुलिस कंट्रोल रूम में रेडियो वायरलेस पर कुछ नहीं बताया जा रहा था और मेरे द्वारा की गई कार्रवाइयों के बारे में मेरे अधिकारियों को कुछ नहीं पता था.

इस विषय पर बोलने की बजाय मैंने कई सालों तक ख़ामोशी बनाए रखी और एक बार मैंने इन-हाउस जांच आयोग के सामने बयान दिया. एसएस जोग द्वारा निर्देशित पुलिस विभाग के इन-हाउस जांच आयोग के वेद मारवाह के आगे मैंने बयान दिया था. दंगों के बाद जोग की जगह सुभाष टंडन को पुलिस कमिश्नर बना दिया गया.

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'ख़ुद का ढोल नहीं पीटा'

मेरी चुप्पी का अहम कारण यह भी था कि मैं अपने काम का ढोल ख़ुद नहीं पीटना चाहता था. खासकर के तब जब मुझे पता चला कि दंगे के दौरान दिल्ली के दूसरे हिस्सों में पुलिस पर कार्रवाई न करने के आरोप लगे थे.

हालांकि, सिख दंगों के लिए पिछले 33 सालों में सरकार द्वारा बनाए गए आठ या नौ आयोगों में से मैं किसी के सामने पेश नहीं हुआ. लेकिन मुझे विश्वास है कि मैं दिल्ली पुलिस के उन कुछ पूर्व पुलिस अफ़सरों में से हूं जिनकी ड्यूटी की तारीफ़ शुरुआती आयोगों की रिपोर्टों में की गई थी.

दंगों के बाद हुई संसद की बहसों में दिल्ली पुलिस के बचाव में मेरा नाम उन अफ़सरों की सूची में रखा गया जिन्होंने बिना आदेश की देरी के कार्रवाई की थी.

अब आते हैं दंगों की स्थिति पर. उस दिन मेरे चिल्लाने के बाद उस पत्रकार ने खुले तौर पर कहा था कि 'उत्तरी दिल्ली में कुछ नहीं हुआ, यह उस स्तर पर नहीं है जैसा बाकी दिल्ली में हो रहा है.'

उनका आम नज़रिया ज़रूर सही था, लेकिन पूरी तरह से नहीं क्योंकि जो कुछ उत्तरी दिल्ली में हो रहा था वह कुछ प्रतिबद्ध पुलिसकर्मियों और लोगों के कारण काबू में था. वे लोग अपना कर्तव्य निभा रहे थे.

उत्तरी दिल्ली की परिस्थितियों को काबू में करने और सिखों की जान बचाने के लिए इनमें से किसी पुलिसकर्मी और लोगों को अपने काम के लिए कोई सम्मान या पहचान नहीं मिली.

वहीं, ऐसे कई पुलिसकर्मियों को वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया जिन्होंने कई डरे और बेकाबू सिखों के गोली चलाने पर उल्टा उन्हें गोली मार दी.

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कोताही करने वाले पुलिसवालों को सज़ा हो

उस समय दंगे की ख़बरों को कवर कर रहे पत्रकारों को बस मैं अपनी एक बात कहता था, "मैंने किसी भी आदमी को मरते नहीं देखा, जब तक कि मैं ख़ुद ही उसे न मार दूं."

मैं यह विश्वास से कह सकता हूं कि कोई भी व्यक्ति (इसे सिख पढ़ा जाए) और न ही हमलावर मेरी निगरानी के दौरान मारा गया. मेरा फर्ज था कि मैं पीड़ितों को बचाऊं. यहां तक कि इसका मतलब यह है कि मैं गोली चलाकर हमलावर की जान ले सकता था.

उस दौरान ऐसी बहुत सी टिप्पणियां आ रही थीं कि ऊपर से पुलिस 'इशारे' का इंतज़ार कर रही है. इसके अलावा यह भी धारणाएं थी कि दंगे के दौरान कार्रवाई न करने को लेकर सरकार और पुलिस नेतृत्व का आदेश आ सकता है.

मेरा मानना है कि ऐसे वक्त में जब कार्रवाई की आवश्यकता हो तब किसी भी पुलिसकर्मी को आदेश का इंतज़ार नहीं होता.

अगर किसी पुलिसकर्मी ने इस मामले में अपराधियों के साथ संलिप्त न होकर भी विलंब या आना-कानी की थी तो वह अपने काम में कोताही के बराबर दोषी है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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