किस तारे के लिए इस दंपति ने छोड़ी अमरीकी ज़मीं

  • 1 नवंबर 2017
डाउन सिंड्रोम, बीमारी, इमेज कॉपीरइट Kavita
Image caption पांच महीने पहले कविता ने वेदा को गोद लिया

वेदा, दो साल की है. आंखों पर मोटा-सा चश्मा लगाती है. चेहरा इतना मासूम की पहली नज़र में देखते ही किसी को भी उससे प्यार हो जाए. लेकिन चेहरे से ज़्यादा उसकी आंखों पर लगा चश्मा, आपको अपनी तरफ खींचता है. इस नन्हीं-सी उम्र में चश्मा क्यों लगाती है वेदा? ये वो सवाल है जिसका जवाब दिन में कविता कई बार देती है और कभी नहीं थकती.

चेहरे पर एक मुस्कान के साथ वो सबसे कहती हैं, वेदा को डाउन सिंड्रोम है. डाउन सिंड्रोम ऐसी बीमारी है जो 830 बच्चों में से सिर्फ एक को होती है. ये बीमारी बच्चे की आंख, कान और दिल पर सबसे ज्यादा असर डालती है.

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Image caption हिमांशु, कविता और वेदा

कितना मुश्किल था ये फैसला

कविता, दो साल की वेदा की पिछले पांच महीने से मां हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इसी साल मई महीने में कविता और उनके पति हिमांशु ने वेदा को गोद लिया है.

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बच्ची गोद लेने की एक अनोखी कहानी

बच्चा गोद लेने के लिए कविता और हिमांशु खास तौर पर इस साल अमरीका से भारत वापस लौटे. क़ानून के मुताबिक अमरीका में रहते हुए वो भारत से बच्चा गोद नहीं ले सकते थे. अब दो साल तक उन्हें भारत में ही रहना भी पड़ेगा. लेकिन वेदा के लिेए कविता और हिमांशु को ये मंज़ूर है.

ऐसा नहीं कि कविता या हिमांशु में कोई शारीरिक दिक्कत है. कविता मां बन सकती हैं, फिर भी उन्होंने ये रास्ता चुना.

बीबीसी से बातचीत में कविता के पति हिमांशु कहते हैं," हमारी लव मैरेज नहीं है, घर वालों की मर्ज़ी से हमने शादी की है. शादी से पहले ही कविता ने ये कहा था कि वो बच्ची गोद लेना चाहती हैं और मैं भी इसके लिए तैयार था. लेकिन जब भी घर वालों से हम बच्ची गोद लेने की बात करते थे, घर वाले हमारी इस बात को हंसी में उड़ा देते थे."

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Image caption हिमांशु के साथ वेदा

अब कविता और हिमांशु की शादी को पांच साल हो चुके हैं. अमरीका में रहते हुए दोनों ने डाउन सिंड्रोम बच्चों को देखा था. वहीं पर कविता को एहसास हुआ कि बच्ची गोद लेना ही है तो स्पेशल चाइल्ड को क्यों न गोद लें और फिर दोनों ने भारत आने का फ़ैसला कर लिया.

हिमांशु ने अपने दफ़्तर में भारत वापस जाने की अर्ज़ी दी जो तुरंत मंज़ूर हो गई. मार्च महीने में दोनों भारत लौटे और काग़जी कार्रवाई पूरी करने के बाद भोपाल के एक अनाथालय से वेदा को अपने घर ले आए.

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Image caption वेदा और हिमांशु

वेदा का नाम दोनों से बहुत सोच कर रखा. पिता हिमांशु के मुताबिक, "वेदा का मतलब है ज्ञान. वेदा के आने से हमें जीवन में नए ज्ञान की प्राप्ति हुई है. इसके पहले डाउन सिंड्रोम के बारे में हमें कुछ पता नहीं था."

कविता की मानें तो वेदा के आने के बाद उन्हें बहुत कुछ बदलने की ज़रूरत नहीं पड़ी. कविता बताती हैं, "वेदा बड़ी आसानी से हमारे जीवन का हिस्सा बन गई. मैं रोज़ सुबह उठ कर उसके साथ वॉक पर जाती हूं, फिर थेरेपी सेशन के लिए और फिर घर आकर सारा काम करती हूं. पांच महीने में वेदा बिना मदद के बैठने भी लगी है."

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वेदा की ही चुनाव क्यों?

लेकिन वेदा को ही कविता और हिमांशु ने क्यों चुना? इस सवाल के जवाब में कविता बताती है, "गोद लेने के लिए जब हमने फ़ॉर्म भरे तो ऑनलाइन कई बच्चों की तस्वीर देखी. वेदा को देखते ही पहली नज़र में पहला प्यार वाली फ़ीलिंग आई. मुझे लगा जितनी मुझे वेदा की ज़रूरत थी, उससे ज़्यादा वेदा को मेरी ज़रूरत है. इसके बाद अगले ही हफ्ते जा कर हम उसे घर ले आए."

वेदा को गोद लेने से पहले और गोद लेने के बाद कविता और हिमांशु ने डाउन सिंड्रोम के बारे में जानकारी जुटाई. इससे पहले उन्हें नहीं पता था कि डाउन सिंड्रोम क्या होता है. वेदा को घर लाने के पहले ये जानना ज़रूरी था.

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Image caption वेदा दो साल की है. उसको डाउन सिंड्रोम है.

डाउन सिंड्रोम क्या है?

यह एक जेनेटिक बीमारी है. इस बीमारी का पता गर्भ में ही चल सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक किसी भी नवजात बच्चे के शरीर के गठन, मांसपेंशियों, हाथ और आंखों को देख कर आसानी से पता लगाया जा सकता है कि बच्चा नॉर्मल बच्चों से अलग है. इसके शिकार बच्चों में मानसिक और शारीरिक विकास दूसरे बच्चों के मुकाबले थोड़ी देरी से होता है.

ये बीमारी शरीर में पाए जाने वाले क्रोमोज़ोम से संबंध रखता है. नवजात बच्चे के शरीर में 23 जोड़े क्रोमोज़ोम पाए जाते हैं. मां की तरफ़ से 23 क्रोमोज़ोम मिलते हैं और पिता की तरफ़ से 23 क्रोमोज़ोम. लेकिन डाउन सिंड्रोम के शिकार बच्चे में एक अतिरिक्त क्रोमोज़ोम होता है जिसकी वजह से दिक्कतें आती हैं.

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वेदा को घर लाने के बाद कविता को एक दिन नए व्हाट्सऐप ग्रुप में जुड़ने का मैसेज आया. ग्रुप में देखा तो पता चला ये भारत में डाउन सिंड्रोम पर काम करने वाली सोसाइटी का ग्रुप है. कविता कहतीं हैं, "इस ग्रुप ने वेदा को पालना मेरे लिए और आसान बना दिया. वेदा के दांत कब निकलेंगे, किस बीमारी में क्या दवा देनी चाहिए, उसे गोद कैसे लेना है, किन बातों का विशेष ख़्याल रखना है, ये सब मुझे ग्रुप पर पता चल जाता है."

क्या बड़े होने पर वेदा को कविता और हिमांशु कभी बता पाएंगे कि वो उनकी गोद ली हुई बच्ची है, इस सवाल के जवाब में हिमांशु कहते हैं, "पासपोर्ट से लेकर हर काग़ज पर ये लिखना ज़रूरी होता है. बड़े हो कर उसे पता ज़रूर चल जाएगा. लेकिन हम उसे ये बात अलग अंदाज़ में बताएंगे ताकि एक बदलाव जो हमने लाने की शुरुआत की है, उसे वो भी आगे बढ़ाए.''

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