सिख विरोधी दंगे: राजीव गांधी ने कहा था, 'बड़ा पेड़ गिरने पर हिलती है धरती...'

  • रेहान फ़ज़ल
  • बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी और इसके अगले रोज़ से ही दिल्ली और देश के दूसरे कुछ हिस्सों में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे.

कुछ साल पहले इन दंगों पर नज़र डालने वाली एक किताब 'व्हेन ए ट्री शुक डेल्ही' छपी थी.

इसमें दंगे की भयावहता, हताहतों और उनके परिजनों के दर्द और राजनेताओं के साथ पुलिस के गठजोड़ का सिलसिलेवार ब्यौरा है.

"जब इंदिरा जी की हत्या हुई थी़, तो हमारे देश में कुछ दंगे-फ़साद हुए थे. हमें मालूम है कि भारत की जनता को कितना क्रोध आया, कितना ग़ुस्सा आया और कुछ दिन के लिए लोगों को लगा कि भारत हिल रहा है. जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है."

19 नवंबर, 1984: ये शब्द कहे थे तत्कालीन प्रधानमंत्री और इंदिरा गाँधी के उत्तराधिकारी उनके पुत्र राजीव गाँधी ने बोट क्लब में इकट्ठा हुए लोगों के हुजूम के सामने.

कोई ज़िक्र नहीं था उन हज़ारों सिखों का जो अनाथ और बेघर हो गए थे बल्कि ये वक्तव्य उनके ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने जैसा था.

सनसनीखेज़ बयान

इससे यह संदेश गया- 'मानो इन हत्याओं को सही ठहराने की कोशिश की जा रही थी.' इस वक्तव्य ने उस समय काफ़ी सनसनी मचाई थी और उसको जायज़ ठहराने में काँग्रेस पार्टी को अभी भी काफ़ी मशक्कत करनी पड़ती है.

पार्टी के नेता सलमान खुर्शीद कहते हैं, "किस लक्ष्य से और किस कारण से यह कहा गया, ये तो उसी व्यक्ति से पूछा जा सकता है जो कहता है. समझने वाले क्या समझते हैं, वह समय पर, संदर्भ पर, उसे लेकर मन में क्या बात है, इस पर निर्भर करता है."

खुर्शीद कहते हैं, "मैं अपने दिवंगत नेता राजीव जी को जानता था. संवेदनशील और उदार चरित्र के व्यक्ति थे. मैं यह नहीं मानता हूँ कि उन्होंने किसी संकीर्ण दृष्टि से ऐसी बात कही होगी."

वह कहते हैं, "तब भी वह बात किसी को चुभी है तो राजीव जी होते तो वो स्वयं कहते कि मैं यह नहीं कहना चाहता था. मेरे मन में भी उतना ही दुख है. मैं भी किसी को खो बैठा था. मैं जानता हूँ कि खोने की पीड़ा क्या होती है."

शुरुआती घटनाक्रम

हिंसा की शुरुआत उस समय हुई थी जब इंदिरा गाँधी की हत्या का समाचार सुन तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह उत्तरी यमन की अपनी यात्रा समय से पहले ख़त्म कर दिल्ली लौटे थे.

जब ज़ैल सिंह हवाई अड्डे से इंदिरा गाँधी के दर्शन करने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जा रहे थे तो आरके पुरम के पास उनकी मोटर के काफ़िले पर हमला हुआ था.

तरलोचन सिंह उस समय उनके प्रेस अधिकारी थे जो बाद में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष बने.

वह बताते हैं, "ज्ञानी जी हवाई अड्डे से सीधे एम्स के लिए रवाना हुए. उनकी कार सबसे आगे थी. उनके पीछे सचिव और उसके पीछे मेरी कार थी. हम जैसी ही आरके पुरम इलाके में पहुंचे, आगे की दोनों कारें निकल गईं."

तरलोचन बताते हैं, "मेरी कार के सामने जलती मशालें लेकर कुछ लोग आ गए और हमारे ऊपर मशालें फेंकी गईं. लेकिन ड्राइवर ने किसी तरह से बचाकर मुझे घर तक पहुंचाया."

वह कहते हैं, "उधर ज्ञानी जी जैसे ही इंदिरा जी के दर्शन करके एम्स से नीचे उतरे, लोगों ने उन्हें घेर लिया और उनकी कार को रोकने की कोशिश की. ज्ञानी जी के सुरक्षाकर्मियों ने बड़ी मशक्कत के बाद उन्हें वहाँ से सुरक्षित निकाला."

कल्पना से परे

ये तो शुरूआत थी. आने वाले दो दिनों में सिखों के साथ क्या सलूक होने वाला था, इसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी.

दो नवंबर, 1984: इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता राहुल बेदी अपने दफ़्तर मैं बैठे हुए थे. उनको ख़बर मिली कि त्रिलोकपुरी के ब्लॉक नंबर 32 में क़त्लेआम हो रहा था.

बेदी बताते हैं, "मोहन सिंह नाम का एक व्यक्ति हमारे दफ़्तर में आया और उसने बताया कि त्रिलोकपुरी में क़त्लेआम हो रहा है. इसके बाद मैं अपने दो साथियों को लेकर वहाँ गया लेकिन किसी ने हमें वहाँ तक पहुंचने नहीं दिया क्योंकि उस ब्लॉक के रास्ते में हज़ारों लोग जमा थे."

बेदी बताते हैं, "जब हम शाम के वक्त वहाँ पहुँचे तो देखा कि कोई ढाई सौ गज़ लंबी गली में लोगों की लाशें और कटे हुए अंग बिखरे हुए थे. हालत यह थी कि उस गली में चलना भी मुश्किल हो रहा था. पैर रखने तक की जगह नहीं थी.

बेदी कहते हैं, "औरतों और बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया था. बाद में मालूम हुआ कि 320 लोगों की हत्या की गई. मैं वो भयानक मंज़र कभी नहीं भूल सकता. शाम के सात-साढ़े सात बजे का वक़्त था. इलाके को कोई 8-10 हज़ार लोगों ने घेरा हुआ था. इसके बावज़ूद चारों ओर सन्नाटा पसरा था."

पुलिस की भूमिका संदिग्ध

एक और हादसा हुआ भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन मनमोहन वीर सिंह तलवार के साथ जो वर्ष 1971 में महावीर चक्र से सम्मानित हो चुके थे. पाँच हज़ार लोगों की भीड़ ने उनके घर को घेरकर उसमें आग लगा दी.

हमारे बहुत प्रयासों के बाद भी तलवार आपबीती बताने को तैयार नहीं हुए कि "पुराने जख़्मों को मत कुरेदिए."

हाँ, आजकल अमरीका के कैलीफोर्निया में जा बसे जसवीर सिंह ने अपनी कहानी ज़रूर सुनाई.

जसवीर बताते हैं, "यमुना पार शाहदरा में मेरा संयुक्त परिवार था. परिवार के 26 लोगों का क़त्ल कर दिया गया. हमारी माँ-बहनों से पूछो कि कैसे वे 33 वर्षों से विधवा का जीवन गुज़ार रहीं हैं."

जसवीर कहते हैं, "हमारे कुटुंब में पूरे परिवार को मार डाला. बच्चों के सिर से बाप का साया उठ गया. कोई ज़ेबकतरा बन गया, किसी को स्मैक की लत लग गई."

सबसे बडा सवाल उठा पुलिस की भूमिका पर. पुलिस ने न सिर्फ़ शिकायतों की अनदेखी की, बल्कि कई मामलों में सिखों पर हुए हमलों में भीड़ का साथ दिया.

दंगों के बाद सिखों की तरफ़ से लड़ने वाले वकील और "व्हेन ए ट्री शुक डेल्ही" के सह-लेखक हरविंदर सिंह फूल्का कहते हैं, "पुलिस ने सिखों को बचाने के बजाए उन्हीं के ख़िलाफ़ कार्रवाई की."

फूल्का बताते हैं, "कल्याणपुरी थाने में तक़रीबन 600 लोगों को मारा गया. पहली नवंबर को ज़्यादातर क़त्लेआम हुआ. पुलिस ने वहाँ 25 लोगों को हिरासत में लिया और सभी लोग सिख थे."

वे कहते हैं, "एक और दो नवंबर को इनके अलावा किसी को गिरफ़्तार नहीं किया गया. इतना ही नहीं पुलिस ने सिखों को पकड़कर भीड़ के हवाले कर दिया."

'क्या कोई योजना थी'

सवाल उठता है कि यह सब कुछ अचानक हुआ या फिर इसके लिए बाक़ायदा योजना बनाई गई थी.

किताब के लेखक मनोज मित्ता मानते हैं कि सब कुछ राजनीतिक नेताओं के इशारे पर हुआ.

पहले दिन यानी 31 अक्तूबर को छिटपुट हिंसा हुई लेकिन एक और दो नवंबर को जो कुछ हुआ, वह बिना योजना के नहीं हो सकता था.

मित्ता कहते हैं, "जिस दिन इंदिरा गाँधी की हत्या हुई उस दिन जो घटनाएँ हुईं, उन्हें आप स्वाभाविक कह सकते हैं, लेकिन उस दिन किसी सिख का क़त्ल नहीं हुआ था."

वे बताते हैं, "क़त्ल की शुरुआत पूरे 24 घंटों के बाद यानी अगले दिन एक नवंबर से हुई थी."

मित्ता का कहना है, "नेताओं ने अपने-अपने इलाकों में बैठकें की और अगले दिन लोग हथियारों के साथ पूरी तैयारी से निकले थे. पुलिस उन्हें नज़रअंदाज़ कर रही थी. उनकी मदद कर रही थी."

हरविंदर सिंह फूल्का का भी तर्क है कि जिस तरह से इन घटनाओं को अंज़ाम दिया गया, उससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि सब कुछ योजनाबद्ध था.

वे कहते हैं, "भीड़ के पास इस बात की सूची थी कि किस घर में सिख रहते हैं. उन्हें हज़ारों लीटर केरोसीन मुहैया कराया गया. ज्वलनशील पाउडर उन्हें दिया गया. जो लोहे की छड़ें लोगों के हाथों में थी, वे एक आकार-प्रकार की थीं."

राजनीतिज्ञों का खेल

एक सवाल यह भी उठता है कि पुलिस ने ऐसा क्यों किया? उसने अपने फ़र्ज़ को क्यों नहीं निभाया. आखिर क्यों पुलिस राजनीतिज्ञों के हाथों में खिलौना बन गई.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वेद मारवाह को 1984 के सिख विरोधी दंगों में पुलिस की भूमिका की जाँच की जिम्मेंदारी सौंपी गई थी.

वे कहते हैं, "पुलिस एक औज़ार के समान है और आप जैसा चाहें वैसा इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. जो पुलिस अधिकारी बहुत अधिक महत्वाकांक्षी होते हैं वे देखते हैं कि राजनेता उनसे क्या चाहते हैं. वो इशारों में बात समझते हैं. उन्हें लिखित या मौखिक आदेश देने की ज़रूरत नहीं होती."

वे बताते हैं, "जिन इलाकों में पुलिस नेताओं के इशारों पर कठपुतली नहीं बनीं, वहाँ तो स्थिति नियंत्रण में रही. मसलन चाँदनी चौक में इतना बड़ा गुरुद्वारा है. वहाँ किसी की जान को नुक़सान नहीं पहुँचा क्योंकि उस वक़्त मैक्सवेल परेरा पुलिस उपायुक्त थे. उन्होंने पुख़्ता प्रबंध किए कि चाँदनी चौक में कोई गड़बड़ी न होने पाए. गड़बड़ी वहाँ हुई जहाँ पुलिस ने राजनीति के दबाव के सामने घुटने टेक दिए."

शर्मसार सरकार

दंगों के 21 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में इसके लिए माफ़ी माँगी और कहा कि जो कुछ भी हुआ, उससे उनका सिर शर्म से झुक जाता है.

लेकिन क्या इतना कहने भर से ही सरकार का फ़र्ज़ पूरा हो गया? क्या इससे आज़ाद भारत के सबसे सबसे बुरे हत्याकांड की यादें मिट गईं?

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद कहते हैं, "इसका ज़बाव तो वही दे सकता है जो न्याय की अपेक्षा करता है. मैं कहूँ कि न्याय मिल गया है तो वे कहेंगे कि आपने दर्द देखा ही कहां हैं? आप कैसे कह सकते हैं कि न्याय मिला या नहीं मिला? जिसने चोट खाई है, जिसे दर्द हुआ है, वही इसका ज़बाव दे सकता है."

1984 के बाद भी भारत में दंगों का सिलसिला रुका नहीं है. वर्ष 1988 के भागलपुर दंगे, वर्ष 1992-93 के मुंबई दंगे और वर्ष 2002 के गुजरात दंगे.

लेकिन कितने ऐसे लोग हैं जिन्हें दंगे करवाने के ज़ुर्म में सज़ा मिली? शायद यही कारण है कि इस तरह की घटनाएँ आज के भारत में भी होती रहती हैं.

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