गुजरात के ख़्वाब में राहुल गांधी के लिए अहमद पटेल क्यों ज़रूरी?

  • 2 नवंबर 2017
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राहुल गांधी तीन दिवसीय गुजरात यात्रा पर हैं. शुरुआत उन्होंने भरूच से की. भारतीय राजनीति और कांग्रेस पार्टी की राजनीति में भरूच के स्थान को कभी भुलाया नहीं जा सकता.

यहां राहुल के दादा फ़िरोज गांधी का बचपन गुजरा था. इंदिरा गांधी से शादी करने के बाद वो एक बार यहां आए थे.

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भाजपा के निशाने पर पटेल

भरूच का अब भी उतना ही महत्व है क्योंकि अहमद पटेल, जिन्हें कांग्रेस में चाणक्य के रूप में माना जाता है, इसी क्षेत्र के मूल निवासी हैं.

सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल, क्या गुजरात के चुनावों को ध्यान में रखते हुए अब राहुल के लिए भी उतने ही ज़रूरी हो गए हैं?

यह तो केवल समय ही बताएगा, लेकिन वर्तमान में, अहमद पटेल भाजपा के निशाने पर हैं.

सूबे के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने अहमद पटेल पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि गुजरात एटीएस ने जिन दो चरमपंथियों को गिरफ्तार किया है, उनमें से एक अहमद पटेल के अस्पताल में काम करता था.

रूपाणी ने पटेल से राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा देने की मांग करते हुए कांग्रेस पार्टी से इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण देने को भी कहा है.

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कौन हैं अहमद पटेल?

  • अहमद पटेल ने आपातकाल के दिनों में अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया.
  • आपातकाल के बाद साल 1977 में जब इंदिरा आम चुनाव हार गई थीं तो दक्षिण गुजरात में 28 वर्षीय पटेल के भरूच में कांग्रेस को जीत मिली थी.
  • पटेल उन कुछ चुनिंदा नेताओं में से थे जो संसद पहुंचने में कामयाब रहे.
  • लेकिन अहमद पटेल कांग्रेस की पहली पंक्ति में 1980 और 1984 के बीच आए. जब इंदिरा गांधी के बाद ज़िम्मेदारी संभालने के लिए बेटे राजीव गांधी को तैयार किया जा रहा था, तब अहमद पटेल राजीव गांधी के क़रीब आए.
  • राजीव ने पार्टी के वयोवृद्ध नेताओं की जगह युवाओं को अवसर दिए. तब शर्मीले पटेल को पार्टी का महासचिव बनाया गया.
  • राजीव गांधी की हत्या के बाद पटेल राजनीतिक रूप से पार्टी में हाशिए पर आ गए. पी.वी. नरसिम्हा राव के समय उनका काम कांग्रेस की कार्यकारिणी के एक सदस्य तक ही सीमित था.
  • इस दौरान उन्हें जवाहर भवन ट्रस्ट की ज़िम्मेदारी सौंपी गई.
  • अपने जीवनकाल में राजीव जवाहर भवन ट्रस्ट से भावनात्मक रूप से जुड़े थे. इस ट्रस्ट से जुड़ाव की वजह से उन्हें सोनिया गांधी से क़रीबी संबंध बनाने का अवसर मिला, जो तब सार्वजनिक जीवन में उतनी सक्रिय नहीं थीं.
  • 90 के दशक में, जब सोनिया गांधी राजनीति के लिए नई थीं तो उन्होंने अपने राजनीतिक सलाहकार के रूप में अहमद पटेल को चुना.
  • पटेल केवल अपनी पार्टी के प्रति वफ़ादार नहीं थे बल्कि दो दशकों तक वो इसके विभिन्न पदों पर काम भी करते रहे. इतना ही नहीं, उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बहुत सीमित थीं.

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लोग पटेल को बाबूभाई कहते हैं

अहमद पटेल भरूच ज़िले के अंकलेश्वर के पिरामण गांव के मूल निवासी हैं और 1970 के दशक से कांग्रेस में सक्रिय हैं.

वह वर्तमान में राज्यसभा के सांसद और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार हैं. भरूच के लोग उन्हें 'बाबूभाई' कहते हैं.

राजनीतिक विश्लेषक अजय उमट ने बीबीसी से कहा, "यदि स्वतंत्रता के बाद गुजरात की राजनीति में किसी मुस्लिम नेता का नाम लिया जाएगा, तो वह नाम अहमद पटेल का होगा."

अहमद पटेल भरूच सीट से तीन बार लोकसभा के सांसद रहे हैं.

लेकिन गुजरात की राजनीति में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की शुरुआत के बाद 1993 के बाद उन्होंने चुनाव लड़ना बंद कर दिया और राज्यसभा के सदस्य के रूप में चुने गए.

विधानसभा चुनावों से पहले, भाजपा ने अहमद पटेल पर आरोप लगाकर उन पर निशाना साधा. यह एक राजनीतिक झड़प का हिस्सा है."

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'मुसलमान पटेल को प्रतिनिधि नहीं मानते'

अहमद पटेल एक मुसलमान राजनीतिज्ञ हैं लेकिन उन पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने गुजरात में मुसलमानों के लिए कुछ खास नहीं किया.

सामाजिक कार्यकर्ता हनीफ लकड़ावाला कहते हैं,"अहमद पटेल गुजरात के मुसलमानों के प्रतिनिधि नहीं हैं."

गुजरात के मुस्लिम समुदाय का कहना है कि अहमद पटेल उनकी मदद नहीं करते और मुसलमानों पर हो रहे अन्याय पर खुल कर बातें भी नहीं करते.

लकड़ावाला ने कहा, "उनके नाम में 'अहमद' है, इसलिए भाजपा ने उन्हें मुसलमान चेहरे के रूप में स्थापित किया है क्योंकि इससे वोट का ध्रुवीकरण हो सकता है."

उन्होंने कहा, "एहसान जाफ़री के बाद अहमद पटेल ही एक ऐसे मुस्लिम चेहरा हैं जो संसद में गुजरात का प्रतिनिधित्व करते आए हैं."

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मुस्लिमों के नहीं, कांग्रेस के नेता

पिरामण गांव के कासिम उनिया ने बीबीसी से कहा, "भरूच के लोग अहमद पटेल को बाबूभाई के नाम से बुलाते हैं. उनके पिता को कांतिभाई पटेल के नाम से बुलाया जाता था."

अहमद पटेल को लंबे समय से मुस्लिम चेहरे के रूप में दिखाने का प्रयास चल रहा है, लेकिन लोगों ने उन्हें कांग्रेस नेता के रूप में देखा है.

राजनीतिक विश्लेषक अच्युत याज्ञिक ने बीबीसी से कहा, "अहमद पटेल कई वर्षों तक केंद्रीय स्तर पर जुड़े रहे हैं, एक समय वे गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे."

उन्होंने कहा, "गुजरात के लोगों के लिए अहमद पटेल कांग्रेस के नेता हैं. लेकिन जब से हिंदुत्व की प्रयोगशाला शुरू हुई, उनकी छाप केवल एक मुस्लिम नेता के रूप में बनी."

उन्होंने कहा, "वर्तमान स्थिति में गुजरात में स्थानीय स्तर पर उनका कोई वर्चस्व नहीं है, लेकिन कांग्रेस पार्टी में वो एक महत्वपूर्ण नेता हैं क्योंकि वे दिल्ली में कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के क़रीब हैं."

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पटेल को पटखनी मतलब सोनिया को हराना

सीएनएन न्यूज़-18 की सीनियर पॉलिटिकल एडिटर पल्लवी घोष का कहना है कि अगर आप अहमद पटेल को राजनैतिक रूप से गिराते हैं तो आप सोनिया गांधी को ठेस पहुंचाते हैं.

वो कहती हैं, "अहमद पटेल कांग्रेस में पहले गैर-गांधी नेता हैं जिनको पार्टी में अभूतपूर्व समर्थन मिला है. उनके पास सत्ता के गलियारे में खेली गई गंदी राजनीति की रहस्यमयी जानकारियां हैं."

उन्होंने कहा, "उन्हें पार्टी की गतिविधियों को लेकर छोटी से छोटी बात की गहरी समझ है. सोनिया गांधी जब राजनीति में नई थीं तब सोनिया के द्वारा की गई राजनीतिक ग़लतियों के बारे में अहमद पटेल को पूरी जानकारी है."

यही कारण है कि भाजपा सोनिया गांधी के सलाहकार अहमद पटेल को निशाना बना कर कांग्रेस पार्टी को अस्थिर करना चाहती है.

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