नज़रिया: बार बार सिविल काम में सेना को लगाने के मायने?

  • 3 नवंबर 2017
एल्फ़िंस्टन रोड रेलवे स्टेशन

सेना मुंबई में एलिफिंस्टन फुटब्रिज का निर्माण करने जा रही है. यह एलान भारत की रक्षा मंत्री ने रेल मंत्री की मौजूदगी में किया.

रेल मंत्री ने उनका आभार जताया कि इतने बड़े काम के लिए सेना की सहायता का आश्वासन मंत्री महोदया ने किया. जैसी इस सरकार की रीत है, रक्षा मंत्री ने कहा कि सिविल काम में सेना पहली बार लगाई जा रही है.

जैसे सेना को पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक में उनकी सरकार ने लगाने का दावा किया था. यह अलग बात है कि तुरंत ही सेना से जुड़े लोगों ने ही बता दिया कि सेना के लिए यह कोई पहली बार की कार्रवाई न थी. लेकिन इस सरकार को झेंपने की आदत नहीं.

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रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग को ऐतराज

सड़क पार करने का एक मामूली पुल सेना बनाएगी, यह इस तरह बताया गया मानो यह कोई शान की बात हो. यह काम दरअसल रेलवे के इंजीनीयरिंग विभाग का है.

उसके लोगों ने मंत्रियों के इस फैसले पर ऐतराज भी जताया. उनका कहना है कि इस काम को करने की क्षमता उनकी है. सेना को यह काम देकर संदेश दिया जा रहा है कि सिविल कम करने वाले नाकारा हैं.

मुंबई के लोगों ने पूछा कि इसके बाद क्या महाराष्ट्र की सरकार और मुंबई के म्युनिसपैलिटी सड़कों के गड्ढे भरने का काम भी सेना को देने जा रही है!

रक्षा मंत्री पहली बार के नारे के उत्साह में भूल गईं कि सेना को इसके पहले भी उनकी सरकार एक दूसरी सेवा में लगा चुकी है.

इस सरकार के प्रिय श्री श्री के यमुना के सीने पर किए गए गैरकानूनी मेले के लिए भी प्लाटून ब्रिज बनाने के लिए सेना लगा दी गई थी. जिस सेना का सम्मान करने के लिए जेएनयू के छात्रों और शिक्षकों को ललकारा जाता है, उसकी यही इज्जत इस सरकार के सामने है कि वह उसे बाबाओं और गुरुओं की सेवा में भेजने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाती.

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सरकार की निगाह में सेना की प्रतिष्ठा क्या है?

सेना के साथ औद्योगिक सुरक्षा बल को पूंजीपतियों की निजी सुरक्षा का काम भी दिया जा रहा है.

और सेना की प्रतिष्ठा सरकार की निगाह में यह है कि वह ऊँचाइयों पर सैलानियों के द्वारा छोड़े कचरे को साफ़ करने का काम भी उसके जिम्मे लगा देती है.

ऐसा नहीं है कि सेना सिविल कामों में कभी नहीं आती. कुम्भ के मेले जैसे विराट आयोजन में उसकी मदद ली जाती रही है. लेकिन यह अपवाद है.

आम तौर पर सेना असाधारण परिस्थितियों में बैरक के बाहर आती है. यह माना जाता है कि जब युद्ध न हो रहा हो तो सेना उसकी तैयारी करती रहती है.

यह कहावत ठीक है, जैसा सुशांत सिंह ने याद दिलाया है कि शान्ति के समय सेना (अभ्यास में) जितना पसीना बहाएगी, लड़ाई के मैदान में उतना ही कम खून बहेगा.

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सेना पर हो रहे खर्चे वसूलना ज़रूरी!

शायद इस सरकार को लगता है कि युद्ध न हो रहा हो तो सेना पर हो रहे खर्चे की वसूली करना ज़रूरी है. इसलिए उससे कूड़े का सफाई, सरकारी गुरुओं के मेलों का इंतजाम या सड़क पार करने के पुल बनाने जैसे काम लिए जाने चाहिए. वरना वह निठल्ली बैठी क्या रोटी तोड़ेगी?

सेना को हमेशा सड़क पर रखने के खतरे हैं लेकिन इस सरकार को उसके फायदे नज़र आ रहे हैं. वह है सेना को सार्वजनिक कल्पना में लगातार बनाए रखना. यह काम पिछले तीन सालों में अनेक प्रकार से किया गया है.

पिछले साल कुछ पूर्व सैन्य अधिकारी जेएनयू जाकर टैंक लगाने की मांग कर आए थे. इस साल खुद कुलपति ने सेना से टैंक मांग लिया.

छात्रों और शिक्षकों को शर्मिन्दा करने के लिए कहा ही जा रहा है कि एक तरफ हमारे सैनिक शून्य से तीस डिग्री कम तापमान में देश की हिफाजत कर रहे हैं, वहीं ये छात्र और शिक्षक कर दाताओं के पैसे पर मौज कर रहे हैं.

सेना का इस्तेमाल इस तरह भारत के लोगों के नागरिक अधिकारों के दमन के लिए किया जा रहा है. यहाँ तक कि सेना या अर्ध सैन्य बल के लोग खुद जब अपने अधिकार की बात करते हैं तो उनका बेरहमी से दमन किया जाता है.

कुछ वक्त पहले केंद्र सरकार ने हर विश्वविद्यालय को अपने परिसर में वीरता दीवार बनाने का हुक्म दिया है जिसपर परमवीर चक्र विजेताओं के चित्र लगाए जाएँगे.

यह समझना कठिन है कि किस प्रकार की वीरता बौद्धिक परिसर में चाहिए. ज्ञान से जो बौद्धिक साहस मिलना चाहिए वह तो इस सरकार को नागवार गुजरता है.

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कहीं पाकिस्तान जैसे परिणाम न हों?

एक ख़ास काट की राष्ट्रवादी राजनीति के लिए सेना का इस्तेमाल हो रहा है. उत्तर प्रदेश के चुनाव में शासक दल ने सर्जिकल स्ट्राइक के पोस्टर चारों और लगवाए और चुनाव आयोग को कुछ भी गलत न लगा.

अभी हाल में कांग्रेस पर हमला करने के लिए प्रधानमंत्री ने भी सेना का इस्तेमाल किया. पी चिदंबरम के एक बयान पर प्रधानमंत्री ने यह कहकर आक्रमण किया कि कांग्रेस सैनिकों के बलिदान का अपमान कर रही है.

लेकिन यहाँ पूछा जाना चाहिए कि कश्मीर में भी सेना कोई अपने मन से तो नहीं गई! उसे क्यों सरकार की राजनीतिक सुविधापरस्ती की कीमत चुकानी चाहिए?

रक्षा मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सिंह ने सावधान किया है कि पाकिस्तान की तरह ही अगर बार बार सेना को बैरक से सड़क पर लाया गया तो वह वापस बैरक में जाने से इन्कार कर सकती है. उन्होंने पाकिस्तान में 1953 के अहमदिया समुदाय के ख़िलाफ़ हुई हिंसा के समय सड़क पर उतारी गई सेना के बाद में बने रहने की घटना की याद दिलाई.

मार्शल लॉ के बाद सेना को "स्वच्छ लाहौर अभियान" में लगा दिया गया. इस अभियान के चलते जनता के बीच सेना की छवि निपुणता से काम जल्दी निबटा देनेवाले समूह की बनी.

कालान्तर में सेना और सिविल इलाके के लोगों के बीच रिश्ते और मजबूत हुए. और पाँच ही साल गुजरे कि अय्यूब खान ने सेना की ओर से देश के शासन पर कब्जा कर लिया.

पाकिस्तान उसकी कीमत अब तक भुगत रहा है.

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50 फ़ीसदी से अधिक युवा चाहते हैं सैन्य शासन

भारत अब तक यह अभिमान करता रहा है कि चारों तरफ फौजी हुकूमत के बीच उसने जनतन्त्र को और परिष्कृत ही किया है. लेकिन उसके लिए हमेशा ही जनता के दिल और दिमाग को जनतन्त्र का प्रशिक्षण देते रहने की ज़रूरत होती है.

अनुशासन, चुस्ती और वर्दी के बीच एक ऐसा रिश्ता है कि सिविलिया लद्धड़पन के मुकाबले वह हमेशा हमें खींचता है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी दावा हमेशा अनुशासन का रहा है. मानो, वह अपने आप में कोई ऐसा गुण है जिसके आगे बुद्धि, विवेक, सहिष्णुता की बलि दी जा सकती है.

एक ऐसे देश में जहाँ डंडे के शासन को लेकर प्रत्येक पीढ़ी में आकर्षण बना हुआ है, सेना के जीवन के रोज़मर्रा के मामलों में प्रवेश से उसके प्रति खिंचाव या लगाव के बढ़ने का ख़तरा है.

कुछ समय पहले अमरीकी पीयू रिसर्च सेंटर के किए गए एक सर्वेक्षण से मालूम हुआ कि भारत के पचास फ़ीसदी से ज़्यादा किशोर और नौजवान सैन्य शासन चाहते हैं. ऐसी हालत में सेना से निरंतर संपर्क के नतीजे क्या हो सकते हैं?

दुनिया भर में जनतांत्रिक देशों में सेना और सिविल प्रशासन के बीच का संबंध तय है. सेना को सिविल प्रशासन और प्रबंधन से अलग रखा जाता है. अनेक बार नागरिक प्रशासन को इसका लोभ होता है कि किसी बड़ी हड़ताल के समय सेना को लगा दिया जाए.

परिपक्व समाज इसे स्वीकार नहीं करते. लेकिन हम देख रहे हैं कि भारत में अब सेना को अक्सर जनता के सामने किया जा रहा है. कश्मीर में कुछ महीने हुए सेना की जीप के आगे बाँधकर घुमानेवाले अधिकारी को प्रेस को संबोधित करने का असाधारण अवसर दिया गया.

उसी तरह हमारे सेनाध्यक्ष उन मसलों पर धड़ल्ले से बोलते रहते हैं जो नाज़ुक राजनीतिक मसले हैं और जिनपर राजनेता भी सावधान होकर ही बोलते हैं.

मुंबई में सड़क के एक पुल को बनाने में सेना का इस्तेमाल इस बड़ी सैन्यवादी राजनीति का एक सांकेतिक कदम है. जिस तरह इस पर नागरिक समाज के एक हिस्से ने ऐतराज जताया है उससे उम्मीद बंधती है कि भारत में जनतांत्रिक चेतना सो नहीं गई है.

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