नज़रियाः कोर्ट के आदेश से पहले आधार लिंक नहीं करें

  • रीतिका खेड़ा
  • अर्थशास्त्री, बीबीसी हिन्दी के लिए
सुप्रीम कोर्ट, सर्वोच्च न्यायालय

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आधार कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट तीन नवंबर को सुनवाई करेगा. अलग अलग लोगों ने अलग अलग मुद्दों पर याचिका दायर कर आधार की संवैधानिकता को चुनौती दी है.

20-22 याचिकाएं पुरानी हैं. 2013 से 2015 तक सुनवाई चल रही थी, फ़िर इसे रोक दिया गया. कहा गया कि निजता के अधिकार का मामला जो है, उसे पहले सुलझाएं.

आधार की अनिवार्यता को चुनौती

किसी ने तो इसमें यहां तक कहा है कि पूरी योजना ही संविधान के ख़िलाफ़ हैं, क्योंकि ये निजता के अधिकार का हनन करती हैं.

कुछ याचिकाओं में आधार की अनिवार्यता को ही चुनौती दी गई है.

राशन, पेंशन, बैंक, मोबाइल, जन्म प्रमाणपत्र, मृत्यु प्रमाणपत्र, भोपाल गैस पीड़ितों को मिलने वाले मुआवजे तक के लिए अनिवार्य कर दिया गया है.

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सुनवाई कब होगी यह तय होगा

तीन नवंबर को सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा की इन सभी विषयों पर सुनवाईयां कब शुरू होंगी. संविधान पीठ बैठेगी. तीन जज होंगे या पांच इस पर भी फ़ैसला करने की ज़रूरत है.

सरकार ने पांच जजों के पीठ की मांग की है. उम्मीद है कि नवंबर के अंत तक ये मामला सुना जाएगा.

कुछ नयी याचिकाओं को भी दर्ज करने की उम्मीद है, जिसमें मोबाइल लिंकिंग भी शामिल है.

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सरकार को अधिकार नहीं

लोगों को लगातार फ़ोन कॉल्स आ रहे हैं. इसमें बैंक और मोबाइल कंपनियों की खुद की गलती नहीं है क्योंकि उनको सरकार की तरफ से आदेश आए होंगे और वो उसका पालन कर रहे हैं.

लेकिन सरकार का आदेश देना सही है या गलत उस पर कोर्ट में सीनियर वकील आनंद ग्रोवर ने सवाल उठाया था.

ये सही सवाल भी है की बैंक या मोबाइल कंपनियां जिस तरह से धमकी के लहजे में आपके मैसेज और कॉल कर रहे हैं कि आपका बैंक अकाउंट सीज हो जाएगा या मोबाइल नंबर बंद हो जाएगा. वो अधिकार तो नहीं है सरकार को.

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कोर्ट के आदेशों को तोड़ा मरोड़ा गया

मोबाइल के मसले में थोड़ी बदमाशी भी हुई है कि वो आदेश उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के नाम से निकाला. उन्होंने ये कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है इसलिए हम इसे अनिवार्य कर रहे हैं.

लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने केवल इतना कहा था कि हर एक मोबाइल नंबर का वेरिफिकेशन करें, किसी न किसी तरह से. आदेश को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है. यह सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आधार को अनिवार्य कहीं भी नहीं बना सकते. केवल छह योजनाओं के लिए इसे स्वेच्छापूर्वक इस्तेमाल करने की इजाजत दी गई थी.

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आधार का इस्तेमाल कम से कम करें

इसे अनिवार्य बनाने की वजह से कई परेशानियां हो रही हैं.

इसके बाद से कहीं पर आधार नंबर डीऐक्टवेट होने तो कहीं पर फ़िंगरप्रिंट का सत्यापन नहीं हो पा रहा. लोगों को परेशानियां हर कदम पर आ रही हैं.

झारखंड में एक परिवार का राशन कार्ड केवल इसलिए काट दिया गया क्योंकि वो आधार से लिंक नहीं था.

देवघर में रूपलाल मरांडी ने लिंक किया था लेकिन फ़िंगरप्रिंट नहीं ले रहा था तो दो महीने राशन नहीं ले पाए. उनकी मौत हो गई.

लोगों को अभी अपने आधार नंबर को लिंक नहीं करना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार करना चाहिए.

लखनऊ, हैदराबाद से ख़बरें आईं की वहां फ़र्जी आधार बन रहे हैं. तो पूरा सिस्टम अभी इतना सुरक्षित नहीं है.

यानी खुद को धोखाधड़ी से बचने के लिए सबसे अच्छा रास्ता ये है कि इस नंबर का इस्तेमाल कम से कम करें.

(बीबीसी संवाददाता अभिजीत श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित)

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