ग्राउंड रिपोर्ट: एनटीपीसी प्लांट हादसे में हताहतों की संख्या पर सवाल

  • 4 नवंबर 2017
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ऊंचाहार थर्मल पॉवर प्लांट में हादसे के अगले दिन घटनास्थल पर पहुंचे उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री डॉक्टर दिनेश शर्मा से जब मैंने सवाल किया कि बाहर खड़े कई लोग अपने परिजनों की तलाश में रात से ही गुहार लगा रहे हैं लेकिन कोई सुन नहीं रहा है, तो उनका जवाब था, "एनडीआरएफ़ की टीम रेस्क्यू और सर्च का काम पूरा कर चुकी है. मैं भी ऊपर तक देख कर आया हूं, अब कोई बॉडी वहां नहीं है. बाक़ी जिन लोगों के परिजन नहीं मिल रहे हैं वो कंट्रोल रूम से बात करें उनकी मदद की जाएगी."

दरअसल, घटना के बाद से ही प्लांट के बाहर रोते-बिलखते बदहवास तमाम लोगों के सामने सिर्फ़ एक ही सवाल था कि प्लांट में काम कर रहे उनके परिजन कहां हैं ? कई लोग ऐसे थे जो अपने उन परिजन के बारे में जानना चाहते थे जो हादसे के वक़्त प्लांट की छह नंबर यूनिट में काम कर रहे थे, लेकिन वो अब नहीं मिल रहे हैं.

ये लोग मीडिया की इन ख़बरों को लेकर भी बेहद ग़ुस्से में थे कि वो मृतकों की संख्या को 'कम करके' दिखा रहा है. लोग नारे लगाकर मांग कर रहे थे कि आख़िर मीडिया वालों को भी वहां यानी घटनास्थल पर क्यों नहीं जाने दिया जा रहा है?

बुधवार शाम साढ़े तीन बजे बॉयलर का पाइप फटने से हुए इस हादसे में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक 32 लोगों की मौत हुई है. हालांकि गुरुवार तक ये संख्या 26 बताई गई और इसे लेकर वो लोग बेहद आश्चर्य में थे, जो हादसे के वक़्त प्लांट या आस-पास मौजूद थे.

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'अंदर नहीं जाने दिया'

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना था कि हादसे के बाद वो लोग लोग प्लांट की ओर भागे, लेकिन घटनास्थल तक किसी को नहीं जाने दिया गया. यहां तक कि उन्हें भी नहीं, जो ख़ुद वहां काम करते हैं और जिनके पास अंदर जाने का आधिकारिक पत्र यानी गेट पास था.

शाम को आसपास के गांव के लोग भी बड़ी संख्या में पहुंचे लेकिन जल्दी ही सबको वहां से हटा दिया गया और रात दो बजे के क़रीब जहां ये हादसा हुआ था, उस प्लांट तक पहुंचने पर ऐसा लग रहा था जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं है. प्लांट के अंदर किसी मीडियाकर्मी तक को जाने की अनुमति नहीं थी.

एनटीपीसी के अस्पताल के बाहर ही रायबरेली के ज़िलाधिकारी से मुलाक़ात हुई और जब उनसे मैंने यही सवाल किया तो उनका जवाब था, "सुरक्षा कारणों से अंदर नहीं जाने दिया जा रहा है. मेरे और कप्तान साहब के साथ कई मीडियाकर्मी अंदर गए थे." मैंने कहा कि मुझे भी ले चलिए तो मुस्कराकर बोले, "थैंक्यू."

एनटीपीसी प्लांट हादसा

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आंकड़ों पर सवाल

बाद में पता चला कि ज़िलाधिकारी के साथ कुछेक स्थानीय मीडियाकर्मी रात क़रीब दस बजे वहां गए थे.

स्थानीय पत्रकार सर्वेश चौहान बताते हैं, "घटना साढ़े तीन बजे हुई. छह घंटे बाद एनडीआरएफ़ की टीम यहां पहुंची. एनटीपीसी के पास आपदा प्रबंधन का कोई इंतज़ाम नहीं था, फिर भी वहां के अधिकारी अपने हिसाब से प्रबंधन करते रहे. न तो पीड़ितों के परिजन को और न ही मीडियाकर्मियों को अंदर जाने दिया गया. घटना स्थल की जो तस्वीरें और वीडियो बाहर आए वो उन्हीं लोगों ने बनाए थे जो वहां मौजूद थे."

यही वजह है कि घटना के अगले दिन जब नेताओं का आगमन शुरू हुआ तो प्लांट की छह नंबर यूनिट के गेट के बाहर खड़े सैकड़ों लोगों के ग़ुस्से का ठिकाना न रहा. लोगों ने प्लांट के कर्मचारियों को तो अंदर जाने से रोक दिया लेकिन बड़े नेताओं की सुरक्षा टीम के आगे वो असहाय हो गए.

दरअसल, प्लांट के बाहर खड़े पीड़ित लोगों के तमाम परिजन का आरोप था कि मृतकों और घायलों के सरकारी आँकड़े सही नहीं बताए जा रहे हैं. लोगों का ग़ुस्सा इस बात पर भी था कि चौबीस घंटे बीत जाने के बाद भी न तो परिजन को और न ही मीडिया को प्लांट के अंदर जाने दिया जा रहा था.

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बिजली काट दी गई

यही नहीं, बाहर मौजूद लोग इन्हीं वजहों से तमाम तरह की आशंकाएं जता रहे थे. घटना के एक प्रत्यक्षदर्शी हिमांशु त्रिपाठी के एक रिश्तेदार की भी हादसे में मौत हुई थी. हिमांशु भी उसी यूनिट में काम कर रहे थे लेकिन संयोगवश उस समय वहां से कुछ दूर थे.

हिमांशु रो-रोकर बताने लगे, "इतना बड़ा हादसा हुआ लेकिन एनटीपीसी का कोई कर्मचारी एक घंटे तक वहां नहीं पहुंचा. जो लोग बच गए थे या जिन्हें कम चोट लगी थी, राख़ के ढेर में फँसी लाशों और घायलों को हम लोग निकाल रहे थे. क़रीब डेढ़ घंटे बाद एंबुलेंस आई और फ़ोर्स आ गई. उसके बाद से ही हम लोगों को भी वहां से बाहर कर दिया गया."

हिमांशु का सीधे तौर पर आरोप था कि एनटीपीसी के अधिकारियों ने ख़ुद को बचाने के लिए मृतकों को ढूंढ़ने की बजाय वहां जेसीबी मशीनों से समतलीकरण का काम शुरू कर दिया. उनका कहना था, "लगभग पांच सौ लोग यहां उस समय काम कर रहे थे. मृतकों और घायलों की संख्या जो सरकार बता रही है, यदि सही है तो आख़िर सब लोग गए कहां ?"

हिमांशु के ये सवाल सिर्फ़ उन्हीं के नहीं थे बल्कि लगभग सभी पीड़ितों के परिजन और आस-पास के गांवों के लोगों के थे. प्लांट में ही फिटर का काम करने वाले विनोद का कहना था, "जहां हादसा हुआ, उस जगह की बिजली तक काट दी गई और अँधेरे में किसी को कुछ भी नहीं दिख रहा था."

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ठेकेदारी के भरोसे है कामकाज

हालांकि एनटीपीसी के अधिकारियों का कहना है कि अब तक सभी 32 मृतकों की पहचान हो गई है, 59 घायलों का इलाज चल रहा है और मलबे में अब कोई दबा नहीं है, लेकिन वहां काम करने वाले लोग इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं.

एनटीपीसी के महाप्रबंधक राजीव कुमार सिन्हा ने बीबीसी को बताया, "हमारे पास तो अभी तक कोई इस बात की शिकायत लेकर नहीं आया कि उनके परिजन नहीं मिल रहे हैं. बाकी एनडीआरएफ़ की टीम रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा करके जा चुकी है और अब वहां कोई नहीं है."

ऊंचाहार के स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार कनक बिहारी सिंह कहते हैं, "अधिकारियों के पास तो सिर्फ़ उन्हीं के रिकॉर्ड होंगे जो वैध तरीक़े से वहां काम कर रहे हैं. दरअसल, यहां का पूरा काम ठेकेदारी के भरोसे है और ठेकेदारी भी कई स्तरों पर है. मुख्य ठेकेदार किसी काम का ठेका लेकर फिर उसे कमीशन लेकर दूसरे को दे देता है. कुछ मज़दूरों का ब्योरा सम्यक तरीके से रखा जाता है, बाक़ी सुरक्षाकर्मियों की मिलीभगत से कई पास यूं ही बनवा लिए जाते हैं."

कनक बिहारी सिंह कहते हैं, "घटना जब हुई उस वक़्त कम से कम तीन सौ लोग तो वहां थे ही. घायलों और मृतकों का सरकारी आँकड़ा सिर्फ़ दो सौ तक ही पहुंच रहा है. ऐसे में सौ लोगों की स्थिति तो संदेह के घेरे में है ही. यहां आस-पास के अलावा छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार आदि राज्यों से भी लोग आकर काम करते हैं."

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कौन है जिम्मेदार?

दरअसल, लोगों के संदेह और उनकी आशंका को इस बात से भी बल मिल रहा है कि घटना के क़रीब पांच घंटे बाद तक वहां सिर्फ़ एनटीपीसी और स्थानीय प्रशासन के लोग ही थे. दिहाड़ी मज़दूरों को बाहर कर दिया गया और मीडिया को जाने की अनुमति नहीं दी गई.

मीडिया को तो चौबीस घंटे बाद तब अनुमति मिली जब उप मुख्यमंत्री डॉक्टर दिनेश शर्मा वहां आए, वो भी कुछ चुनिंदा लोगों को. लेकिन घटनास्थल तक जाने की अनुमति उसके बाद भी नहीं मिली.

वहां काम करने वाले कुछ अधिकारियों का दबी ज़ुबान में ये भी कहना था कि जिस बॉयलर में ये विस्फोट हुआ वो अभी ठीक से चालू भी नहीं हुआ था और कुछ बड़े अधिकारियों की उसे जल्द चालू कराने की ज़िद के चलते ही इतना बड़ा हादसा हुआ.

लखनऊ के एक कॉलेज में मेकेनिकल इंजीनियरिंग के प्रोफ़ेसर डॉक्टर नागेंद्र मिश्र कहते हैं, "ऐसी घटनाएं तब होती हैं जब इंडिकेशन के बावजूद तापमान और दबाव को नियंत्रित न किया जाए. सेफ़्टी डिवाइसेज़ भी कई बार काम नहीं करती हैं और फिर भी यदि उसे गर्म किया जाता रहा तो ब्लास्ट हो सकता है. इसके अलावा मैन्युफ़ैक्चरिंग डिफ़ेक्ट भी हो सकता है क्योंकि बताया जा रहा है कि ये यूनिट अभी नई है और ऐसी स्थिति में उसकी संभावना काफी ज़्यादा होती है."

बहरहाल, इस बात की जानकारी के लिए मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए जा चुके हैं कि घटना क्यों हुई और कौन इसके लिए ज़िम्मेदार हैं, लेकिन ये सवाल कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि घटना के वक़्त प्लांट में काम करने वाले सभी मज़दूरों के बारे में पता चल सका या नहीं.

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