अवध के प्रिंस की दिल्ली के जंगल में गुमनाम मौत

  • 5 नवंबर 2017
प्रिंस साइरस
Image caption प्रिंस साइरस

जो शख़्स अवध राजघराने का आख़िरी नवाब होने का दावा करता था, उसे शान की कसौटी पर देखें तो इस दावे पर भरोसा करना मुश्किल होता है. प्रिंस साइरस ने मेरे एक दोस्त से एक बार ग़ुस्से में चिल्लाते हुए कहा था, ''मुझसे मुग़लों के बारे में बात मत करो. वे सब गंदगी की तरह थे.''

ज़ाहिर है 16वीं शताब्दी की शुरुआत से भारत में मुग़लों का शासन रहा और जब तक अंग्रेज़ों ने हिंसक तरीक़े से 19वीं शताब्दी के मध्य में उन्हें उखाड़ नहीं फेंका तब तक जारी रहा.

भारत में मुग़लों का बड़ा और मजबूत साम्राज्य रहा है और इस पर कोई सवाल नहीं है. लेकिन प्रिंस साइरस ज़ोर देकर कहते थे कि उनका वंश ज़्यादा महान था. ये अलग बात है इन दिनों वो भयानक ग़रीबी में रह रहे थे.

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Image caption न दरवाज़े और न ही खिड़कियां

प्रिंस का परिवार

दरअसल प्रिंस अपनी विलक्षण मां के स्वभाव के थे. वो ख़ुद को विलायत महल की बेगम कहती थीं और दावा करती थीं कि वो अवध के नवाब की क़रीबी वारिस हैं. अवध रियासत का इलाक़ा वर्तमान समय में भारत के सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में है.

इस परिवार को कभी बड़ी जायदाद, कई महल और भव्य पार्टियों के लिए जाना जाता था. अंग्रेज़ों ने इसे स्वतंत्र रियासत का दर्ज़ा दिया था. समकालीन रिपोर्ट बताती है कि कैसे अवध के आख़िरी नवाब ने ऐय्याशी और लक्ष्यहीन जीवन के बीच ख़ुद को बेदखल कर लिया था. उन्हें 1856 में बुरी तरह से बेदखल किया गया था.

Image caption साइरस की मां ख़ुद को विलायत महल की बेगम कहती थीं

इस परिवार का सितारा डूब गया था, लेकिन दिमाग़ से सत्ता बोध ख़त्म नहीं हुआ था. 1970 के दशक में बेगम ने फिर से सक्रिय होने का फ़ैसला किया. उन्होंने अपने छोटे बेटे और बेटी, सात वर्दीधारी नेपाली नौकर, 15 शिकारी कुत्ते और साथ में ख़ूबसूरत फ़ारसी कार्पेट को लेकर दिल्ली रेलवे स्टेशन के पहले दर्ज़े के वेटिंग रूम में डेरा डाला दिया था.

यहां वो अड़ गईं कि जब तक भारत सरकार उनके परिवार के बलिदान को मान्यता नहीं देती है वो अपने लोगों के साथ यहीं रहेंगी. उनका दावा था कि उनके परिवार ने 1857 में ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ भड़के विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई थी.

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मालचा महल

इसी हफ़्ते एक सांसद से मेरी मुलाक़ात हुई. उन्होंने याद करते हुए बताया कि उनसे मिलने की कोशिश की थी तो कैसे उन्होंने अपने कुत्तों को लगा दिया था. आठ साल बाद सरकार को इनकी मांगों के सामने झुकना पड़ा था.

सरकार ने इन्हें एक घर दिया जिसका नाम मालचा महल था. दरअसल यह एक मध्यकालीन शिकारी पड़ाव था. यह दिल्ली के रिज क्षेत्र के जंगल में है.

इस महल में बिजली और पानी की आपूर्ति नहीं है और न ही खिड़कियां और दरवाज़े. बस एक खुला गलियारा है. इसके बावजूद बेगम ने यहां रहने का फ़ैसला किया था. उन्होंने महल के बाहर एक साइन बोर्ड टांग दिया. उस पर लिखा था, ''प्रवेश निषेध. कुत्तों से सावधान रहें. घुसने वालों को गोली मारी जा सकती है.''

इसे देखते हुए शाही अलगाव को साफ़ महसूस किया जा सकता है. यह प्राचीन नया घर बबूल के पेड़ों से घिरा है. सालों अवसाद में रहने के बाद राजकुमारी ने अपना जीवन ख़ुद ही ख़त्म कर लिया. यह सच है या नहीं पर निश्चित तौर पर एक किवदंती बनी. विदेशी पत्रकारों के लिए इस परिवार के बचे सदस्य आकर्षण के केंद्र रहे. मैं भी वहां जाता था.

Image caption बीबीसी न्यूज़ के जस्टिन रॉलेट के बेटे विल रॉलेट के साथ प्रिंस साइरस

प्रिंस से मुलाकात

मैं अपने 6 साल के लड़के के साथ था और ख़ुद को बिल्कुल असहज पा रहा था. झाड़-झंखाड़ में जाते हुए काफ़ी मनहूस जैसा लग रहा था. मैं राजकुमार साइरस और उनकी बहन राजकुमारी सकीना को जानता था. ये अपने रुख़े व्यवहार के लिए जाने जाते थे. मेरे मन में स्वागत को लेकर कोई उम्मीद नहीं थी.

Image caption प्रिंस साइरस और उनकी बहन राजकुमारी सकीना अपने कुत्ते के साथ

दुर्गम रास्ते के ज़रिए उस छोटे पर्वत तक पहुंचा और इसके बाद उन डरावनी दीवारों वाले महल में दाखिल हुआ. मैंने राहत महसूस किया कि यहां भौंकने की आवाज़ नहीं है. ऐसा लग रहा था कि शिकारी कुत्ते अब बचे नहीं थे. प्रिंस साइरस शुरू में मेरे आने से नाराज़ हुए, लेकिन बीबीसी के नाम पर उनकी नाराज़गी देर तक नहीं रही.

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इसके बाद मैंने वहां नियमित रूप से जाना शुरू कर दिया. राजकुमार साइरस ने बरसात का पानी छत से रिसने, मकड़ियों और रात में सियारों की चीख़ को लेकर बात की, लेकिन ज़्यादातर बात उन्होंने अपने परिवार की त्रासदी और सालों से हुई नाइंसाफ़ी के बारे में की.

मैंने महसूस किया कि मेरे पहले दौरे के कुछ महीने पहले राजकुमारी सकीना की मौत हो गई थी. उस मलबे की तरह घर में अब राजकुमार साइरस अकेले रहते थे.

उन्होंने मुझे अपनी मां के लिए रखी टेबल सेटिंग दिखाई थी. उन्होंने यह भी कहा कि कैसे वो हर सुबह अपनी मां के लिए ताज़ा पानी गिलास में भरते थे. यह साफ़ है कि वो भयानक अकेलेपन से जूझ रहे थे. उन्हें अपनी श्रेष्ठता पर अडिग भरोसा था.

जहां तक मुझे पता है उस आधार पर कह सकता हूं कि वहां न्यूयॉर्क टाइम्स की ब्यूरो चीफ़ की भी पहुंच थी. वो जुलाई में दिल्ली से चली गई थीं. मैं भी पूरी गर्मी शहर से बाहर था. ऐसे में मैंने भी प्रिंस साइरस को कुछ महीनों तक नहीं देखा. मैं पिछले हफ़्ते वहां फिर से पहुंचा था.

जब मैंने नाम लेकर आवाज़ लगाई तो उस घर में खामोशी पसरी थी. उनकी मां की टेबल वहीं थी, लेकिन पानी में हरा शैवाल फैला हुआ था. उनके सामान बिखरे पड़े थे. फ़्लोर पर पत्र और बिज़नेस कार्ड पड़े थे. ये सभी पत्रकारों के थे. मुझे पता चला कि उनके शव को पुलिस ने एक महीने पहले बरामद किया था.

जिंदगी हो या मौत राजकुमार साइरस ने अपने परिवार के भरोसे को कभी तोड़ा नहीं था. साइरस की बहन सकीना ने एक बार एक सहकर्मी से कहा था कि, ''मामूलीपन न केवल अपराध है बल्कि एक पाप है. निश्चित तौर पर साइरस और उनके परिवार की ज़िंदगी में कुछ भी साधारण नहीं था. लेकिन उनकी शान और उनकी त्रासदी दोनों अलग रही.

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