नज़रिया: 'बीजेपी अब वो नहीं जो चार दिन में दाग़ियों को निकाल देती थी'

  • 6 नवंबर 2017
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वो चार दिन और ये चार दिन. उन चार दिनों में बीजेपी ने पार्टी में शामिल हुए डीपी यादव और बाबू सिंह कुशवाहा को बाहर का रास्ता दिखा दिया था, इन चार दिनों में मुकुल रॉय को कमांडो सुरक्षा देकर उन्हें 'सत्ताधारी दल का वीवीआईपी' बना दिया गया है.

उन चार दिनों में बीजेपी नेताओं को यादव-कुशवाहा पर मीडिया के सवालों का जवाब देना मुश्किल हो गया था, इन चार दिनों में सवाल ही गायब हैं. उन चार दिनों में वाजपेयी-आडवाणी-सुषमा जैसे नेताओं की तरफ से ऐसे फ़ैसले के खिलाफ नाराज़गी का शोर उठा था.

आज पार्टी के नेता दाग़दार लोगों को गले लगाने से होने वाली बदनामी को लेकर रत्ती भर भी चिंतित नहीं दिख रहे हैं, वे तो कह रहे हैं कि मुकुल रॉय के अनुभवों का लाभ भाजपा को बंगाल में मिलेगा, अनेक नेताओं ने बाक़ायदा ट्वीट करके शारदा-नारदा में फँसे मुकुल रॉय का स्वागत किया है.

Image caption बाबू सिंह कुशवाहा

बीजेपी में शामिल

पिछले कुछ सालों में बीजेपी कितनी बदल गई है इसे समझने के लिए 2004 के उन चार दिनों को याद करना ज़रूरी है. इन सभी सियासी सूरमाओं पर अलग-अलग तरह के आरोप हैं और उनकी कारगुज़ारियों की तुलना में पड़ने की जगह ये देखना चाहिए कलंक को लेकर रवैया कितना बदला है.

जनवरी का महीना था. देश में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी. लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरु हो गई थी. वाजयेयी सरकार को चमकाने के लिए 'इंडिया शाइनिंग' के नारे को बुलंद किया जा रहा था, तभी एक दिन यूपी के बाहुबली नेता, पूर्व मंत्री और शराब माफ़िया के नाम से कुख्यात डीपी यादव के बीजेपी में शामिल होने का ऐलान हुआ.

डीपी यादव पर दर्जनों मुकदमे थे. नीतीश कटारा हत्याकांड में उनका बेटा विकास यादव मुख्य आरोपी था. ऐसे में डीपी यादव को बीजेपी में शामिल किया जाना उस दिन की सबसे बड़ी और सनसनीखेज़ खबर थी. ये तारीख थी 20 जनवरी 2004.

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Image caption डीपी यादव

डीपी यादव प्रकरण

आज के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू उन दिनों बीजेपी के अध्यक्ष थे, जैसे ही डीपी यादव के बीजेपी में दाखिले की घोषणा हुई, मीडिया ने इसे सबसे बड़ा मुद्दा बना दिया. विपक्ष को भी वाजपेयी सरकार पर हमले का मौका मिल गया. नतीजा ये हुआ कि बीजेपी ख़ेमे में जबरदस्त खलबली मच गई.

मीडिया के सवालों से बीजेपी के तमाम नेता बचते-भागते नजर आए. डीपी यादव को पार्टी में शामिल करने के फैसले से प्रधानमंत्री वाजपेयी, उप-प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज समेत कई वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी खबरें भी आई.

ठीक चार दिन बाद यानी 24 जनवरी को पार्टी अध्यक्ष वेकैंया नाडयू ने डीपी यादव की सदस्यता रद्द करने का ऐलान कर दिया. यानी चार ही दिन में फैसले को पलट दिया गया या यूं कहें कि भूल-सुधार किया गया.

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बीजेपी की फजीहत

वेकैंया नायडू ने माना कि डीपी यादव की सदस्यता रद्द करने का फैसला प्रधानमंत्री वाजपेयी और उप प्रधानमंत्री आडवाणी से बातचीत के बाद लिया गया. डीपी यादव से मुक्ति पाकर बीजेपी नेताओं के चेहरे पर सुकून लौटा.

डीपी को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद डैमेज कंट्रोल में जुटी बीजेपी नेताओं ने मीडिया से कहा कि हमारी पार्टी और हमारे नेताओं की साफ-सुधरी छवि एक शख्स की वजह से खराब हो इसकी इजाजत नहीं दी सकती.

हालांकि बार-बार पूछने पर भी किसी बीजेपी नेता ने खुलासा नहीं किया कि 25 से ज्यादा मुकदमों में फंसे डीपी यादव जैसे हिस्ट्री शीटर नेता को पार्टी में लाने का फैसला किसका था? डीपी यादव ने भी अपनी तरफ से एक बयान दे दिया कि वो नहीं चाहते कि उनकी वजह से बीजेपी की फजीहत हो.

गडकरी के वक़्त

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मीडिया ने डीपी यादव का कच्चा चिट्ठा खोलना शुरू कर दिया था. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बीजेपी के भीतर से इस फैसले के खिलाफ़ आवाजें आने लगी थीं. अब दूसरी घटना पर आते हैं. महीना फिर जनवरी का ही था. साल था 2012 का. यूपी विधानसभा चुनाव होने वाले थे.

सभी दलों में दलबदलू नेताओं का एक्सपोर्ट-इंपोर्ट का मौसम था. मौजूदा सड़क-परिवहन मंत्री नितिन गडकरी तब बीजेपी अध्यक्ष थे. तभी बीजेपी मुख्यालय में यूपी के दिग्गज नेता और राज्यसभा सांसद विनय कटियार की तरफ से चौंकाने वाला ऐलान किया गया.

मायावती सरकार के भ्रष्टतम मंत्रियों में से एक माने जाने वाले और बसपा से निकाले गए नेता बाबू सिंह कुशवाहा को बीजेपी में शामिल करने का ऐलान. बीजेपी मुख्यालय में कटियार के साथ मंच पर मौजूद कुशवाहा को गुलदस्ते देकर अपना बनाने की घोषणा हो गई.

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Image caption विनय कटियार और सूर्य प्रताप शाही की मौजूदगी में बीजेपी में शामिल होते बाबू सिंह कुशवाहा की तस्वीर

बैकफुट पर बीजेपी

कुशवाहा एनएचआर घोटाले के साथ-साथ सीएमओ हत्याकांड में भी अभियुक्त थे. सीबीआई उनके पीछे लगी थी और वो बीजेपी के स्टार कैंपेनर होने जा रहे थे. पार्टी नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने मीडिया के तीखे सवालों का जवाब देते हुए कुशवाहा के बचाव में यहां तक कह दिया कि बीजेपी एक गंगा है जिसमें आकर सारे नाले शुद्ध हो जाते हैं.

फिर वैसे ही हंगामा मचा. नकवी का ये बयान मीडिया का एजेंडा बन गया. बीजेपी के ही कई नेताओं ने खुलकर कुशवाहा के खिलाफ बयानबाजी शुरू कर दी. कुशवाहा के बीजेपी में शामिल होने के अगले ही दिन यानी 4 जनवरी 2012 को सीबीआई ने कुशवाहा के कई ठिकानों पर छापा मारा.

उनके ठिकानों से घोटाले के दस्तावेज़ मिलने की खबरें भी आईं. कटियार समेत कुछ बीजेपी नेता पहले तो कुशवाहा के बचान में ये कहकर आए कि बीजेपी में शामिल होने की वजह से यूपीए सरकार सीबीआई से छापे डलवा रही है लेकिन ये बचाव इतना कमजोर था कि बीजेपी को बैकफुट पर आना पड़ा.

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Image caption मंच पर योगी आदित्यनाथ के पैर छूते हुए हत्या के आरोपी निर्दलीय विधायक अमनमणि त्रिपाठी, तस्वीर अप्रैल 2017 की है

विरोध के तीखे सुर

जिस कुशवाहा को भ्रष्टाचारी बताकर खुद मायावती निकाल चुकी थीं उसका बीजेपी कब तक बचाव करती. वो भी तब जब विरोध के तीख़े सुर पार्टी के भीतर से ही निकल रहे थे. तब गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ ने कुशवाहा पर तीखा हमला बोल दिया.

योगी ने कहा कि 'कुशवाहा जैसा घोटालेबाज़ और हत्या का अभियुक्त किसी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता. ये दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है."

सांसद योगी आदित्यनाथ ने अपनी ही पार्टी से सवाल किया कि एक ओर बीजेपी भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल की बात करती है और दूसरी ओर कुशवाहा जैसे 'भ्रष्टाचार के अभियुक्त' को पार्टी में शामिल करती है तो हम किस मुंह से जनता के बीच वोट मांगने जाएँगे.

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पार्टी से बाहर

योगी ने तो यहां तक कह दिया कि अगर कुशवाहा को बाहर नहीं किया गया तो वो ही पार्टी छोड़ देंगे.

इस बार अटल बिहारी वाजपेयी तो इस हालत में नहीं थे कि वो कुछ बोल भी पाते लेकिन कुशवाहा कांड से आडवाणी, जेटली और सुषमा की नाराजगी और बाकी नेताओं के रुख को देखते हुए नितिन गडकरी ने कुशवाहा से मुक्ति पाने का फैसला किया.

ठीक चार दिन बाद यानी 8 जनवरी को बीजेपी ने कहा कि कुशवाहा ने चिट्ठी लिखकर कह दिया है कि जब वो बेदाग साबित नहीं हो जाते, तब तक उनकी सदस्यता स्थगित रखी जाए. चार दिन में कुशवाहा भी डीपी यादव की तरह पार्टी से बाहर हो गए.

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मार्गदर्शक मंडल

जैसे कुशवाहा को 2012 में कुर्मी वोटों के लिए बीजेपी में लाया गया था, वैसे डीपी यादव को 2004 में यादव वोटों के लिए लाया गया था. वैसे ही इस बार मुकुल रॉय को बंगाल में ममता बैनर्जी की काट के लिए लाया गया है. नाराज़गी इस बार भी बीजेपी के भीतर होगी लेकिन कहीं कोई बयान नहीं है.

बीमार वाजपेयी मौन हो चुके हैं, आडवाणी मार्गदर्शक मंडल में भेज दिए गए हैं, जहां से वो सिर्फ देख सकते हैं, कुछ बोल नहीं सकते.

पार्टी के फैसलों पर सुषमा की कोई आवाज सुनाई नहीं देती. हालत ये है कि न ही योगी जैसे किसी हौसले वाले नेता की तल्ख़ टिप्पणी है. न ही मीडिया के लिए मुकुल रॉय का बीजेपी में आना कोई मुद्दा है. सोशल मीडिया पर थोड़े बहुत शोर के बाद शांति पसर गई है.

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Image caption पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम

सियासी समीकरण

मुकुल रॉय बीजेपी में समाहित हो गए हैं, बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने सुखराम के बचाव में पहले की बच्चन की कविता सुना दी है -जो बीत गई सो बात गई..

चुनावी मौसम में मकुलजातीय और सियासी समीकरण को साधने के लिए दागदार छवि वाले नेताओं को पार्टी में शामिल करना कोई नई बात नहीं. हर पार्टी, हर चुनाव के पहले ऐसा करती रही है. सवाल उस शोर के न उठने का है, जो ऐसे मौकों पर उठा करते थे. पार्टी के भीतर से, मीडिया से, और समाज से.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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