इस साल खादी पर डिस्काउंट सिर्फ़ 30 दिन ही क्यों मिला?

  • 6 नवंबर 2017
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नई दिल्ली के कनॉट प्लेस का खादी भंडार. दिल्ली और आसपास के इलाक़े में खादी पहनने वालों के लिए सबसे पसंदीदा ठिकाना.

बीते 29 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में इसी स्टोर का हवाला देते हुए कहा कि धनतेरस के दिन 17 अक्टूबर को इस स्टोर में 1.2 करोड़ रुपये की बिक्री हुई है.

मोदी ने इसी संबोधन में ये भी कहा कि इस साल खादी उत्पादों की बिक्री 90 फ़ीसदी तक बढ़ गई है.

लेकिन दो नवंबर को इसी स्टोर में खादी उत्पादों को ख़रीदने पहुंचे उपभोक्ताओं की समस्या दूसरी है. वे एक काउंटर से दूसरे कांउटर तक खादी के सालाना डिस्काउंट के बारे में जानकारी पूछ रहे हैं.

एक महीने तक मिला डिस्काउंट

हर काउंटर पर उन्हें यही जवाब मिल रहा है- जी डिस्काउंट तो ख़त्म हो गया. ये डिस्काउंट क्यों नहीं मिल रहा है? इसका किसी काउंटर पर कोई जवाब नहीं है.

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तीन मंज़िले स्टोर के एक कोने में मुझे एक बुजुर्ग सा खादी स्टॉफ़ नज़र आए तो मैंने भी उनसे ये बात पूछी. उन्होंने जवाब दिया, "एक दिन पहले चेयरमैन साब का संदेश आया कि आज से डिस्काउंट ख़त्म."

एक दूसरे स्टॉफ़ ने ये भी बताया कि खादी के इतिहास में ये पहली बार देखने को मिला है. खादी से जिन लोगों का वास्ता रहा है उन्हें मालूम है कि हर साल गांधी जयंती से लेकर तीस जनवरी तक- करीब चार महीने में खादी अपने उपभोक्ताओं को 20 से 40 फ़ीसदी का डिस्काउंट देता रहा था.

इस साल ये डिस्काउंट केवल एक महीने तक रहा. दो अक्टूबर, 2017 से लेकर एक नवंबर, 2017 तक. 1956 में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग की स्थाापना के बाद ये पहला मौका है जब खादी में ऐसा डिस्काउंट एक महीने तक मिला है.

इसके बारे में पूछे जाने पर खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के चेयरमैन विनय सक्सेना कहते हैं, "इस बार ये डिस्काउंट एक महीने तक ही रहा क्योंकि हमारी कोशिश खादी को छूट और सरकारी मदद से बाहर निकालने की है. हम खादी को ऐसे प्रॉडक्ट के रूप में सामने लाना चाहते हैं जहां लोग उसकी गुणवत्ता को उसकी क़ीमत पर ख़रीदें."

इस डिस्काउंट को ख़त्म करने को गांधीवादी विचारक और गांधी प्रतिष्ठान के चेयरमैन कुमार प्रशांत खादी को ख़त्म करने की दिशा में क़दम बताते हैं, "खादी को ख़त्म करने की दिशा में ये क़दम है, लोगों को सस्ता कपड़ा नहीं मिलेगा तो वो तो दूसरे विकल्प पर जाएंगे. खादी को चलाने वाले यही चाहते हैं."

बिक्री पर कोई असर नहीं

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सक्सेना ये भी मानते हैं कि डिस्काउंट की अवधि कम होने से उपभोक्ताओं में नाराज़गी हो सकती है, लेकिन इसका खादी की बिक्री पर कोई असर नहीं पड़ा है, लोग लगातार आ रहे हैं.

हालांकि कनॉट प्लेस स्थित खादी स्टोर में डिस्काउंट को लेकर आम लोगों में नाराजगी नज़र आयी. गुडगांव से ख़रीदारी करने आए एक शख़्स ने बताया, "हर साल इस डिस्काउंट का इंतज़ार किया करते था, लेकिन इस बार पूरे दाम पर कपड़े लेने पड़े."

दिल्ली के वसुंधरा इलाक़े से ख़रीददारी करने आए राजपाल राजे ने बताया, "अगर एक दिन पहले ख़रीददारी करने आ गया होता तो पांच हज़ार रूपये के बिल पर एक हज़ार रूपये कम हो जाते. खादी ने इस साल डिस्काउंट के बारे में कोई प्रचार प्रसार नहीं किया था कि डिस्काउंट एक महीने ही रहेगा."

स्टोर में काम करने वालों में भी डिस्काउंट को लेकर ऊहापोह की स्थिति देखने को मिली. जैसे थोड़े से डिफेक्टेड कपड़ों पर डिस्काउंट के समय 50 फ़ीसदी की छूट मिल रही थी, अब वही डिफेक्टेड कपड़े, फ्रेश कपड़े के साथ पूरे दाम पर बिक रहे हैं.

नज़रिया: गांधी का खादी, मोदी का खादी नहीं है

आम उपभोक्ताओं में एक नाराज़गी ये भी है कि खादी के कपड़े के दामों में धीरे धीरे काफ़ी बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है. खादी स्टोर पर ग़ाज़ियाबाद से ख़रीददार करने आए मोहित जोशी ने बताया, "जो कपड़ा पहले पांच सौ का था, वो अब आठ सौ रूपये का हो चुका है. जो हज़ार- बारह सौ का था, वो दो हज़ार के पार पहुंच गया है. ऊपर से अब तो जीएसटी भी लग रहा है. खादी लगातार महंगी होती जा रही है."

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विनय सक्सेना इस बारे में कहते हैं, "बाज़ार में कंपीटिशन वाले दरों पर हमें खादी को उतारना होगा तभी जाकर खादी को बढ़ावा देने और रोजगार देने का सरकार का उद्देश्य पूरा हो पाएगा."

हालांकि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद खादी की बिक्री में लगातार वृद्धि देखी गई है. साल 2014-2015 के दौरान खादी का उत्पादन क़रीब आठ फ़ीसद बढ़ा, बिक्री में भी आठ फ़ीसदी बढ़ी थी.

वहीं 2015-16 के दौरान खादी उत्पादन की वृद्धि 21 फ़ीसदी रही, जबकि बिक्री में 29 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई. जबकि 2016-17 के दौरान खादी उत्पादन में 31 फ़ीसदी बढ़ोत्तरी देखने को मिली, जबकि बिक्री में 32 फ़ीसदी का इजाफ़ा हुआ है.

क्या वाकई खादी संवर रही है?

विनय सक्सेना कहते हैं, "इस साल हमारा लक्ष्य बिक्री में 40 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हासिल करने का है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का युवाओं पर जितना असर है, उनकी वजह से उनकी अपील पर खादी की जितनी लोकप्रियता बढ़ी है, उसे देखते हुए हम ये लक्ष्य हासिल कर लेंगे."

विनय सक्सेना के मुताबिक बीते दो साल में 336 खादी के नए यूनिट और स्टोर खोले गए हैं. इसके साथ इसी दौरान खादी ने गिफ्ट वाउचर की स्कीम भी शुरू की है. खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग की ये स्कीम काफ़ी सफल रही है.

केवीआईसी के मुताबिक इस वित्तीय साल में 5 करोड़ 85 लाख रूपये के वाउचरों की बिक्री हुई है. यह बीते साल के 86 लाख की तुलना में 680 फ़ीसदी ज़्यादा है.

पिछले दिनों से नरेंद्र मोदी खादी में खुद दिलचस्पी ले रहे हैं और उनकी अपील से खादी स्टोर में भीड़ भी बढ़ी है. लेकिन उनकी कोशिश में राजनीतिक रंग भी नज़र आया है. इसी साल खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर से गांधी को हटाकर मोदी को स्थापित किया गया. और इसके बाद हरियाणा के मंत्री और बीजेपी के नेता अनिल विज ने कहा था कि गांधी को अभी कैलेंडर से हटाया है, धीरे-धीरे नोट से भी हटाया जाएगा.

खादी के बदले रंग और ऐसे बयान ये दर्शा रहे हैं कि मौजूदा सरकार खादी की पहचान को बदलने की कोशिश कर रही है.

केवीआईसी की मौजूदा शैली को लेकर पुराने गांधीवादियों की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि खादी पर अब कारपोरेट कल्चर हावी होता जा रहा है. खादी ने पिछले दो-तीन सालों में आदित्य बिड़ला फैशन एंड रिटेल, रेमंड और अरविंद मिल्स जैसे कारपोरेट से हाथ मिलाया है.

खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के स्टोर पर आपको खादी का अंदाज़ काफ़ी बदला हुआ दिखता है, इसके लिए खादी ने अपने साथ नए डिज़ाइनरों को भी जोड़ा है. लगता है कि खादी बदल रही है, खादी बिक भी रही है, लेकिन ये सवाल बना हुआ है कि क्या खादी, खादी बनी रहेगी?

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कुमार प्रशांत कहते हैं, "आंकड़े और बिक्री के दावे पूरी कहानी नहीं बता रहे हैं. देश भर में खादी संस्थानों की हालात ख़राब हो रही है. वे बंद होने के कगार पर हैं, सरकार उन्हें जीवन देने के बदले खादी को बाज़ार के हवाले करने पर तुली है."

विनय सक्सेना के मुताबिक खादी के प्रचार एवं विकास के लिए खादी को आज़ाद किए जाने की ज़रूरत है. जो चीज़ें केवल सरकारी सपोर्ट पर चलती हैं, उनमें भ्रष्टाचार भी होता है, जिसे कम किए जाने की ज़रूरत है.

इस तर्क पर कुमार प्रशांत कहते हैं, "सरकारी सपोर्ट तो बहुत सी संस्थाओं को जाता है, उन सबको बंद करेगी सरकार? सबसे ज़्यादा भ्रष्टाचार तो हथियारों की ख़रीद बिक्री में होता है, सरकार उस पर ध्यान नहीं दे रही है."

लेकिन तब क्या खादी आम लोगों के जेब की पहुंच में होगी, विनय सक्सेना कहते हैं, खादी का उद्देश्य आम लोगों को रोजगार देना है, खादी को हम उस स्थिति में पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं कि वह आत्मनिर्भर बने, जहां लोग खादी का काम करके अपना घर परिवार चला सकें.

हालांकि कुमार प्रशांत को लगता है कि सरकार जो कर रही है, उससे खादी के मूल स्वभाव और प्रवृति का अंत बहुत दूर नहीं है.

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