लक्ष्मण को 27 साल से है रिहाई का इंतज़ार

  • 9 नवंबर 2017
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Image caption रायपुर जेल

छत्तीसगढ़ के कांकेर जेल में बंद 64 साल के लक्ष्मण यादव के हिस्से अब कोई उम्मीद नहीं बची है. लगभग 27 सालों से जेल की चारदीवारी में क़ैद लक्ष्मण यादव मान बैठे हैं कि अब उनकी लाश ही जेल से बाहर जाएगी.

18 नवंबर 1990 को जब उन्हें गिरफ़्तार किया गया था तब उनकी उम्र 37 साल थी. डकैती और हत्या के एक मामले में उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी. उन्हें उम्मीद थी कि 14 साल की सज़ा काटने के बाद उनकी रिहाई हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

एक विकलांग बेटा था जो हर शाम रायपुर जेल के बाहर इस उम्मीद के साथ पहुंचता था कि शायद पिता की रिहाई हो जाए, लेकिन पिता की रिहाई की उम्मीद लिए बेटा भी एक दिन नहीं रहा.

समय पर ख़बर नहीं मिलने और क़ानूनी पचड़ों के कारण लक्ष्मण की पैरोल पर रिहाई भी नहीं हो सकी और वे बेटे के अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हो सके.

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अकेले ऐसे क़़ैदी नहीं लक्ष्मण

छत्तीसगढ़ की अलग-अलग जेलों में 14 साल से भी अधिक समय से बंद आजीवन कारावास के क़ैदियों की रिहाई में जुटे हाईकोर्ट के अधिवक्ता अमरनाथ पांडेय का दावा है कि पिछले 27 सालों से क़ैद आदिवासी मंगल सिंह और लक्ष्मण यादव की रिहाई के लिए इस साल जब उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका लगाई तब सरकार की ओर से पेश सूची से पता चला कि कम से कम 234 लोग ऐसे हैं जो 14 सालों से अधिक समय से आजीवन कारावास की सज़ा भुगत रहे हैं.

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पांडेय कहते हैं, "कई क़ैदी तो ऐसे थे जिन्होंने 25-25 साल, 27-27 साल जेलों में गुज़ार दिए, लेकिन जिनकी रिहाई की कोई कोशिश नहीं हुई."

असल में भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 432 व 433 के तहत राज्यों को उम्रक़ैद की सज़ा पाए लोगों की सज़ा माफ़ करने का अधिकार था. 14 साल के बाद सरकार उनके चाल चलन, बीमारी, पारिवारिक मुद्दों को ध्यान में रखते हुए उन्हें कभी भी रिहा कर सकती थी.

छत्तीसगढ़ बंदी अधिनियम 1968 की धारा 358, 359 में यह प्रावधान था और इस तरह के क़ैदियों के मामले हर दो साल में राज्य सरकार की रिव्यू कमेटी संबंधित अदालतों को सज़ा माफ़ी के लिए भेजती थी और उसी आधार पर उम्रक़ैद की सज़ा पाए लोगों की रिहाई भी होती थी.

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सुप्रीम कोर्ट का आदेश

बाद में 9 जुलाई, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अंतरिम आदेश में राज्य सरकारों द्वारा उम्रक़ैद की सज़ा पाए लोगों की सज़ा माफ़ी के अधिकार पर रोक लगा दी. सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश तमिलनाडु सरकार द्वारा राजीव गांधी हत्याकांड में दोषी ठहराए गये वी. श्रीहरन उर्फ मुरुगन, संथन व अरीवू की रिहाई के आदेश के बाद जारी किया था.

साल भर बाद इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एचएल दत्तु की खंडपीठ ने 23 जुलाई 2015 को कुछ शर्तों के साथ राज्य सरकारों की सज़ा माफ़ी के अधिकार को फिर से बहाल कर दिया.

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क़ैदियों की सज़ा माफ़ी के इस मामले में 2 दिसंबर 2015 को अदालत ने एक विस्तृत फ़ैसला भी सुनाया.

लेकिन राज्य सरकारों द्वारा सज़ा माफ़ी पर रोक और बहाली के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले भी छत्तीसगढ़ में क़ैदियों की रिहाई के सैकड़ों मामले काग़जों में उलझे रहे.

आजीवन कारावास के क़ैदियों को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाली अधिवक्ता रजनी सोरेन उत्साह के साथ बताती हैं, "अगस्त 2017 में हमें हाईकोर्ट में सरकार ने बताया कि आजीवान कारावास के 234 क़ैदी ऐसे हैं जिनकी सज़ा को 14 साल से अधिक हो गए हैं. अब हमें जानकारी दी गई है कि इस बीच 65 क़ैदियों को रिहा कर दिया गया है और 69 क़ैदियों की रिहाई की प्रक्रिया जारी है."

रिहा होने वालों में आदिवासी मंगल सिंह भी शामिल हैं. उनके ही साथ हत्या के मामले में पिछले 27 सालों से बंद पुनीत राम की भी रिहाई की प्रक्रिया चल रही है.

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Image caption रजनी सोरेन, याचिकाकर्ता की वकील

छत्तीसगढ़ में जेल सुधार के लिए चर्चित जेल महानिदेशक गिरिधारी नायक कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए उम्र क़ैद की सज़ा पाए क़ैदियों की सज़ा माफ़ी के मामलों में हम अपनी तरफ़ से पूरी कार्रवाई कर रहे हैं. हमारी कोशिश है कि जेल प्रबंधन के कारण किसी क़ैदी या उनके परिजनों को किसी भी तरह की परेशानी न हो."

लेकिन अधिवक्ता अमरनाथ पांडेय की मुश्किल ये है कि जिस क़ैदी लक्ष्मण यादव की रिहाई के लिए उन्होंने याचिका लगाई थी, उनका नाम न तो रिहा हो चुके क़ैदियों की सूची में है और ना ही रिहा होने वाले क़ैदियों की सूची में.

अमरनाथ पांडेय का कहना है कि हाईकोर्ट ने पूरे छत्तीसगढ़ के क़ैदियों की सूची मांगी थी, लेकिन सरकार ने केवल राज्य के पांच सेंट्रल जेलों की सूची प्रस्तुत कर के छुट्टी पा ली और लक्ष्मण यादव इसलिए इस सूची से छूट गये क्योंकि जिस कांकेर जेल में वे बंद हैं, वह सेंट्रल जेल नहीं है.

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जेलों में पिसने को मजबूर

अमरनाथ पांडेय कहते हैं, "हमने हाईकोर्ट का ध्यान इस गड़बड़ी की ओर दिलाया है."

मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ इकाई के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह का कहना है कि आदिवासियों से जुड़े मामलों में सरकारी अनदेखी बहुत आम है. अकेले जगदलपुर जेल में उम्रक़ैद की सज़ा पाए 67 क़ैदी ऐसे हैं जो 14 साल से अधिक का समय जेल में गुजार चुके हैं.

डॉक्टर लाखन सिंह कहते हैं, "67 में से 32 मामले ऐसे हैं, जिनमें जजों ने क़ैदी की सज़ा माफ़ी को लेकर कोई स्पष्ट राय रखी ही नहीं. इसलिए इन मामलों में रिहाई अटकी पड़ी है."

ज़ाहिर है, अदालती कार्रवाइयों में इसी तरह दिन-महीने गुजरते चले जाते हैं. क़ैद की अवधि और लंबी खिंचती चली जाती है और लक्ष्मण यादव जैसों के मन में नाउम्मीदी के बादल और गहरा जाते हैं.

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