कब और कैसे बन जाते हैं बच्चे क़ातिल?

  • 9 नवंबर 2017
रेयान इंटरनेशनल स्कूल, गुड़गांव
Image caption रेयान इंटरनेशनल स्कूल, गुड़गांव

गुरुग्राम के बहुचर्चित प्रद्युम्न हत्याकांड में पिछले दिनों उस समय नया मोड़ आ गया जब सीबीआई ने दावा किया है कि प्रद्युम्न की हत्या उसी स्कूल में 11वीं के छात्र ने की है.

16 साल के इस छात्र को सीबीआई ने बुधवार को हिरासत में लिया था. सीबीआई ने ये भी दावा किया है कि उसने परीक्षा और पेरेंट-टीचर मीटिंग को टलवाने के लिए प्रद्युम्न का क़त्ल किया.

मामला अभी अदालत में है, लेकिन छात्र का परिवार इस आरोप को नहीं मानता. उसके पिता ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''मेरा बच्चा सुबह जिन कपड़ों में स्कूल गया था, उन्हीं साफ़-सुथरे कपड़ों में वापस आया तो फिर इस बीच उसने क़त्ल कैसे कर दिया? हमारे पास अदालत जाने के अलावा अब कोई रास्ता नहीं बचा है.''

प्रद्युम्न की याद में पल-पल बिलखता परिवार

Image caption प्रद्युम्न की साइकिल

रेयान इंटरनेशनल: प्रद्युम्न मर्डर केस में नया टर्न

आठ सितंबर को हुई थी हत्या

अभियुक्त नाबालिग छात्र उन पांच लोगों में से है जो प्रद्युम्न के क़त्ल के समय की सीसीटीवी फ़ुटेज में टॉयलेट के आसपास नज़र आए थे. पकड़ा गया छात्र वही है जिसने सबसे पहले माली को इसकी सूचना दी थी.

प्रद्युम्न की हत्या गला रेतकर की गई थी.

मशहूर साइकॉलॉजिस्ट जयंती दत्ता कहती हैं कि वैल्यू एजुकेशन और फ़ैमिली सपोर्ट धीरे-धीरे कम हो रहा है या ख़त्म हो रहा है.

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'मेंटल हेल्थ पर भी ध्यान दे सरकार'

बीबीसी से बातचीत में जयंती दत्ता ने कहा, ''पहले बड़े परिवार होते थे. वैल्यू एजुकेशन होती थी. फ़ैमिली सपोर्ट होता था. बच्चों को सिखाया-समझाया जाता था. अब सब ख़त्म हो गया है. लगातार तनाव से जूझते माता-पिता की टेंडेंसी भी अग्रेसिव हो गई है. आजकल सभी सेल्फ़ सेंटर्ड हैं, सिर्फ़ अपनी-अपनी सोच रहे हैं. बच्चे भी वही सीखते हैं. सरकार को चाहिए कि जैसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बना रही है वैसे ही मेंटल हेल्थ पर भी काम करे. ऐसे क्रेच बनाने के लिए दबाव डालना चाहिए जिनमें माएं काम करते हुए भी अपने बच्चों की देखभाल कर सकें.''

रायन स्कूल से पहले भी हिंसा के शिकार हुए छात्र

क्या ये मुमकिन है कि समय रहते पहचान लिया जाए कि बच्चे के मन में क्या चल रहा है, इस सवाल के जवाब में वो कहती हैं, ''अपने बच्चे पर नज़र रखें. कोई भी बच्चा पहली दफ़ा में ही क़त्ल नहीं कर देता. बहुत से ऐसे संकेत होते हैं. वह कई तरीकों से ज़ाहिर करता है कि उसे मदद चाहिए. बच्चे की दिनचर्या में बदलाव दिखे या वह अजीब-सा व्यवहार करता दिखे तो सतर्क हो जाएं. उसका इलाज कराएं. छिपाने की कोशिश न करें.''

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.... वो 15 मिनट जिसने एक पिता की ज़िंदगी बदल दी

माता-पिता की ज़िम्मेदारी

क्या अभिभावक इसके अलावा भी ऐसा कुछ कर सकते हैं जिनसे ऐसी घटना को रोका जा सके?

इस पर जयंती कहती हैं, ''आजकल दाख़िले इतने मुश्किल हो गए हैं कि एक अच्छे स्कूल में नर्सरी के एडमिशन के लिए भी लाखों रुपए भरने पड़ते हैं. ऐसे में बहुत से अभिभावक इस डर से शिकायत नहीं करते कि बच्चे को निकाल दिया जाएगा. ऐसा न करें. लगातार स्कूल और अपने बच्चे को मॉनीटर करते रहें. स्कूल पर एक पेरेंट्स बॉडी बनाने का दबाव डालें जिसका कार्यकाल दो साल से ज़्यादा न हो.''

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स्कूली बच्चों की सुरक्षा के लिए क्या क़दम ज़रूरी?

कैसे करें काबू?

एहतियात अपनी जगह है, लेकिन इसका समाधान क्या हो सकता है?

दरअसल ऐसे मामलों में स्कूलों की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं. जयंती का मानना है कि स्कूलों को भी इससे निपटने के लिए क़दम उठाने चाहिए और स्कूल में ऐसी व्यवस्था भी करनी चाहिए जिससे ऐसी स्थिति से निपटा जा सके.

उन्होंने इसकी भी पैरवी की कि ऐसे स्कूलों से सख़्ती से निपटना चाहिए और गंभीर मामलों में उनकी मान्यता भी रद्द कर देनी चाहिए.

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