गुजरातः हार्दिक पटेल को पाटीदार नेता बनाया किसने

  • 10 नवंबर 2017
Image caption हार्दिक पटेल का घर

अहमदाबाद से करीब 60 किलोमीटर दूर है वीरमगाम.

यहीं हार्दिक पटेल का घर है, जहां उनके माता-पिता भरतभाई पटेल और उषाबेन रहते हैं.

शाम के धुंधलके में जब हम वहां पहुंचे तो उनके घर की दीवार पर अगरबत्ती जल रही थी. पता चला कि हार्दिक के माता-पिता भोजन कर रहे हैं.

कुछ देर में भरतभाई पटेल आकर हमें भीतर ले गए. उषाबेन दूसरे कमरे में ज़मीन पर बैठकर खाना खा रही थीं.

भरतभाई ने हमें एक-एक करके स्टील के गिलास थमाए और फिर उनमें लोटे से पानी उड़ेला.

Image caption हार्दिक पटेल का घर

यह एक बेहद सामान्य घर है. छोटे से ड्रॉइंगरूम में सरदार वल्लभ भाई पटेल की दो तस्वीरें और एक मूर्ति है. कमरे में हार्दिक को मिले कुछ सम्मान प्रतीक चिह्न रखे हैं, जिनमें से एक पर उनकी तस्वीर है.

लंबे समय तक भाजपा से जुड़े हुये थे पिता

भरतभाई का कहना है कि यह घर उन्होंने ढाई लाख रुपये में बनवाया है. वह बताते हैं कि यहां से 6-7 किलोमीटर दूर चंद्रनगर में उनका पैतृक गांव है, जहां वह किसानी किया करते थे. उनके पिता की 80 बीघा की ज़मीन है, जिस पर वह कपास, जीरा और ग्वार उगाया करते थे.

हार्दिक पटेल ने भाजपा के पारंपरिक वोटर माने जाने वाले प्रदेश के 18 फीसदी पाटीदार समुदाय को पाटीदार अनामत आंदोलन समिति यानी 'पास' के बैनर तले लाकर सत्तारूढ़ पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं. लेकिन उनके पिता लंबे समय तक भाजपा से जुड़े रहे थे.

गुजरात में हार्दिक पटेल और कांग्रेस और पास आए

भरतभाई पटेल बताते हैं, 'मैं भाजपा में पहले से था. मेरे पास उस दौर में जीप हुआ करती थी. मेरी जीप से भाजपा का प्रचार हुआ करता था. मैं गाड़ी चलाया करता था और आनंदीबेन मेरे बाजू में बैठा करती थीं. कई साल तक आनंदीबेन ने मुझे राखी भेजी. वह मेरे घर में खाना भी खाकर गई हैं. इसलिए आंदोलन में हार्दिक ने जब भी उनका नाम लिया तो उन्हें हमेशा 'फोई' (बुआ) कहा.'

51 साल के भरतभाई आठवीं कक्षा तक पढ़े हैं, लेकिन राजनीतिक सवालों का जवाब भी बख़ूबी देते हैं. उषाबेन हिंदी समझ लेती हैं, लेकिन गुजराती में ही बोलती हैं.

Image caption हार्दिक पटेल का घर

उषाबेन से पूछा कि हार्दिक की ज़ुबान इतनी आक्रामक कैसे है कि वह कई बार हिंसा के पक्ष में भी बोलने लगते हैं. उषाबेन बोलीं, 'मेरा बेटा सच बोलता है और सच बोलने वालों की भाषा लोगों को उग्र ही लगती है.'

भरतभाई इस बात को स्वीकार नहीं करते कि उनका बेटा राजनीति कर रहा है. वह कहते हैं, 'यह आंदोलन है, राजनीतिक नहीं. उसकी तो उम्र ही नहीं है राजनीति करने की. वह तो समाज के लोगों का काम कर रहा है और हमें उस पर गर्व है.'

नहीं करनी थी राजनीति- हार्दिक के पिता

भरतभाई कहते हैं कि हार्दिक को कई बड़े नेताओं ने राज्यसभा टिकट के प्रस्ताव दिए. अगर उन्हें राजनीति करनी होती तो वह चले जाते.

वह कहते हैं, 'हम किसी ने नहीं डरते. मेरा बच्चा भी किसी से नहीं डरता है. हमने कोई ग़लत काम नहीं किया.'

बीजेपी की ज़मीन कमज़ोर या कांग्रेस की ख़ुशफ़हमी

आरक्षण पर कांग्रेस के हार्दिक को तीन विकल्प

हार्दिक पटेल का मुख्य मुद्दा पाटीदारों के लिए आरक्षण की मांग है. कांग्रेस से उनकी बातचीत चल रही है कि अगर वे सत्ता में आए तो पाटीदारों को आरक्षण किस फॉर्मूले के तहत देंगे.

आरक्षण की मांग से उनके पिता भी सहमत हैं, लेकिन भाजपा से उनकी नाराज़गी की बड़ी वजह कुछ और है.

वह कहते हैं, 'भाजपा हमारी दुश्मन नहीं है. कांग्रेस हमारा भाई नहीं है. लेकिन हमारे 14 पाटीदार नौजवानों को किसी ने तो मारा. अगर नियम ऐसे हैं कि आरक्षण नहीं दे सकते तो न दें. लेकिन जिन्होंने हमारे बच्चों को मारा, आज तक क्यों उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं हुई?'

चुनाव पर इसके असर के बारे में पूछने पर वह कहते हैं, 'हम लोगों को बोलेंगे कि भाजपा को वोट मत दो. लेकिन यह नहीं बोलेंगे कि कांग्रेस को दो.'

Image caption हार्दिक पटेल का घर

उषाबेन बताती हैं कि हार्दिक पढ़ाई में औसत थे. भरतभाई कहते हैं, 'सौ में पचास टका था.'

लेकिन जिसे आज के दौर में 'लीडरशिप' कहा जाता है, उसकी झलक कम उम्र से ही हार्दिक के व्यक्तित्व में दिखती थी.

हार्दिक पटेल सरदार पटेल ग्रुप (एसपीजी) से जुड़े थे, जिसके मुखिया लालजी भाई पटेल हैं. तभी से वह ब्लड डोनेशन और ऐसे दूसरे कार्यक्रम करवाया करते थे. लेकिन बाद में उन्होंने अपना अलग संगठन बना लिया.

पाटीदार समाज खेती और व्यापार के लिए ज़्यादा जाना जाता है. सूरत में कपड़े और हीरे के काम में भी काफी पाटीदार रहे हैं. सौराष्ट्र के ज़्यादातर पाटीदार खेती करते हैं. लेकिन अलग-अलग कारणों से कपड़े और हीरे के काम में मंदी आई और बढ़ती बेरोज़गारी से पाटीदार समाज के भीतर एक गुस्सा पनपा.

भरतभाई बताते हैं कि इसके बाद हार्दिक इतने गांवों में घूमे कि तीन महीने तक घर नहीं आए.

उन्होंने अलग-अलग जगहों पर नौजवानों को जोड़ा और फिर एक दिन उन्होंने एसपीजी के साथ मिलकर पाटीदार समाज की एक रैली जीएमडीसी ग्राउंड में की. इसी रैली में उमड़ी भारी भीड़ ने उन्हें रातोंरात सितारा बना दिया.

Image caption हार्दिक पटेल का घर

गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार आरके मिश्रा मानते हैं कि हार्दिक की लोकप्रियता जैसी है, वैसी स्थिति के लिए गुजरात भाजपा भी बहुत ज़िम्मेदार है.

क्या लोकप्रियता के दम पर आगे बढ़ रहे हैं हार्दिक पटेल?

वह कहते हैं, 'पाटीदारों में जो नौजवान वर्ग है, वह काफ़ी तादाद में हार्दिक के साथ है. भाजपा सरकार के साथ जब भी उनका आमना-सामना हुआ है, भाजपा की ताक़त ने उनसे मात खाई है.'

हार्दिक के पिता का कहना है कि उनकी भाजपा से कोई वैचारिक लड़ाई नहीं है. लेकिन यह सवाल कई बार हार्दिक के आलोचकों की ओर से उछलता रहा है कि उनके पास सिर्फ पाटीदारों को आरक्षण का अस्थायी सा लगने वाला मुद्दा है और वह बिना ठोस वैचारिक आधार के सिर्फ लोकप्रियता के दम पर आगे बढ़ रहे हैं.

लेकिन आरके मिश्रा इसे अलग तरह से देखते हैं. वह कहते हैं, 'यह क्यों मानकर चला जाए कि हर आदमी की वैचारिक प्रतिबद्धताएं हैं और हर आदमी किसी लंबी यात्रा पर निकल पड़ा है. एक नाराज़गी है और नाराज़गी अपने आप नेता का निर्माण करती है. यह नाराज़गी ओबीसी और दलितों में भी है और तीनों समुदायों में युवा नेता खड़े हो रहे हैं. ये वोट बैंक आपस में लड़ भी नहीं रहे हैं. बल्कि साथ में चल रहे हैं. ये तीनों नेता जानते हैं कि अगर ये भाजपा के साथ गए तो इनकी राजनीति ख़त्म हो जाएगी.'

आरके मिश्रा मानते हैं कि यह कोशिश भी की जा रही है कि पाटीदारों के दो पारंपरिक हिस्सों कड़ुवा और लेउवा को आपस में भिड़ा दिया जाए.

Image caption हार्दिक पटेल का घर

हार्दिक के कांग्रेस के 'क़रीब' आने का अर्थ क्या?

हालांकि वीरमगाम से थोड़ी ही दूरी पर पटेलों में हार्दिक को लेकर राय बंटी हुई मिली. एक दुकान के सामने बैठे सुनील पटेल ने कहा, 'वो 14 लोगों की बात होती है, जिनकी पाटीदार आंदोलन में मौत हो गई. लेकिन उनकी मय्यत में कोई नहीं गया. यहां हार्दिक जब घूमते थे तो कोई उन्हें नहीं पूछता था. अब वो फॉर्चुनर गाड़ी में घूमते हैं. विकास सिर्फ उनका हुआ है.'

कल्लूभाई शांतिलाल पटेल ने कहा कि हार्दिक ने पार्टी बदल ली है. उन्हें पहले भाजपा से काम कराना था, काम नहीं हुआ तो वह कांग्रेस के दरवाज़े पर चले गए हैं. वह आरक्षण की बात करते हैं, लेकिन आरक्षण मिलने ही वाला नहीं है.

एक अन्य व्यक्ति ने कहा, 'हार्दिक पटेल मेरी जाति के नहीं है. लेकिन संविधान में सबको अपना हक़ मांगने की इजाज़त है. इसमें कोई ग़लत बात नहीं है.'

भरतभाई के घर के ड्रॉइंगरूम में दीवार के एक हिस्से में शायद बाद में मरम्मत कराई गई है. उसमें अलग से की गई पुताई का रंग बाकी दीवार से गाढ़ा दिखता है.

भरतभाई आज भी मानते हैं कि उन्होंने अतीत में भाजपा के लिए काम करके ग़लती नहीं की. वे नाराज़ हैं, क्योंकि भाजपा ने कुछ काम ग़लत किए हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए