अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी: ऑन बनाम ऑफ़ रिकॉर्ड में छिपी पूरी हक़ीक़त

  • 25 दिसंबर 2017
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Image caption एएमयू कैंपस (बाएं), सांकेतिक तस्वीर

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की एक सुबह. कुछ लड़कियां पीठ पर कॉलेज बस्ता लादे बुर्क़े में जाती दिख रही हैं. जींस, टीशर्ट के दौर में कुछ लड़के कैंपस में अब भी शेरवानी पहने हुए मुस्कान से सलाम करते नज़र आते हैं.

एएमयू कैंपस में लड़कियों की क्या स्थिति है, इसे समझने के दो तरीक़े हैं. पहला ऑन रिकॉर्ड और दूसरा ऑफ रिकॉर्ड. इनका फ़र्क अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को लेकर बनी या बनती समझ को 360 डिग्री तक घुमा सकता है.

Image caption रूबी क़ादरी और अरीषा आरिफ़

AMU: ऑन रिकॉर्ड

रूबी क़ादरी, एएमयू छात्रा: एएमयू ऐसी जगह है, जहां बिलकुल भेदभाव नहीं है. कैंपस में कुछ क्लब हैं, जहां लड़कियां जाकर परफॉर्म कर सकती हैं. इंजीनियरिंग, मेडिकल और लॉ फैकल्टी हर जगह को-एड एजुकेशन है. सिर्फ़ अब्दुल्ला हॉल में लड़कियां ही पढ़ती हैं.

अरीषा आरिफ़, एएमयू छात्रा: मैं भी अब्दुल्ला हॉल से पढ़कर आई हूं पर मेरे भीतर इस वजह से कोई झिझक नहीं है. प्ले ग्राउंड में लड़के और लड़कियां साथ खेलते हैं. पोस्ट ग्रेजुएशन में लड़के और लड़कियां साथ पढ़ते हैं. कैंपस लड़कियों के लिए बिलकुल सुरक्षित है.

कुंवर मोहम्मद, छात्र: अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में धर्म की वजह से किसी की पहचान नहीं होती है. जैसे जेएनयू में सारे कम्युनिस्ट नहीं होते, ठीक वैसे ही एएमयू में सारे फरिश्ते नहीं होते हैं. कुछ शैतान भी होते हैं. ये गोडसे के लोग हैं, जो सर सैयद के दामन पर दाग लगाना चाहते हैं.

मोहम्मद इमरान ख़ान, छात्र: एएमयू में जिन दिक्कतों की बात हो रही है. वो बीते 100 सालों में क्यों नज़र नहीं आई. मोदी सरकार के आने के बाद जो भगवाकरण हो रहा है, तब से ही दिक्कतें नज़र आ रही हैं.

डिपार्टमेंट ऑफ जर्नलिज़्म के प्रोफेसर शेफई किदवई: यूजीसी का पैनल 10 यूनिवर्सिटी का ऑडिट करने आता है लेकिन मीडिया में सिर्फ़ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट आती है. एएमयू के वूमेंस कॉलेज में लड़के और लड़कियों को हीन भावना से जोड़ कर पेश किया जाता है. इस लिहाज़ से तो दिल्ली का लेडी श्रीराम कॉलेज भी नहीं होना चाहिए.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कैंपस का एक बड़ा हिस्सा ऑन रिकॉर्ड ऐसी ही बात करता है. दिक्कत पूछी जाएं तो जवाब मिलता है- सब सही है, यहां जैसी तहज़ीब और सुरक्षा का माहौल कहीं नहीं.

अब कैमरा, माइक और नाम छिपाते हैं और ऑफ़ रिकॉर्ड बातों को सामने लाते हैं. ये वो लोग थे, जो पहचान छिपाकर अपनी बात सामने रखना चाहते थे.

एएमयू

'ऑफ रिकॉर्ड' क्या कहता है AMU?

'मेरा नाम मत छापना. न ही मेरी तस्वीर दिखाना. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जब-जब मैं लड़कियों के हक़ की बात करती हूं, मुझे निशाने पर ले लिया जाता है. ये लोग लड़के और लड़कियों की बराबरी की बात करते हैं, लेकिन AMU में ऐसा नहीं है. तहज़ीब के नाम पर क़ैद में रहने को ही लड़कियों ने भी बेहतर ज़िंदगी मान लिया गया है. वो समझना ही नहीं चाहती कि बराबरी और आज़ादी किसे कहते हैं?'

'अब्दुल्ला वूमेन कॉलेज की थ्योरी ये है कि हम लड़कियों को सब कुछ कैंपस के भीतर ही मुहैया कराएंगे. लड़कियों को बाहर आने की ज़रूरत नहीं है. मुझे लगता है कि दिक्कत एडमिनिस्ट्रेशन की तरफ़ से नहीं है. लड़कियों ने खुद पर ही ये पाबंदियां लगाई हुई हैं. माहौल ऐसा है कि ये कंफर्टेबल नहीं होता है. जिन जगहों पर क्लास के बाद लड़के जाकर बातें कर सकते हैं लेकिन लड़कियां ऐसी जगहों पर खुद नहीं जाती हैं.'

'लड़कियों को कल्चरल एजुकेशन सेंटर में जाने के लिए वॉर्डन से इजाज़त लेनी होती हैं. बड़ी मशक्कत के बाद अगर इजाज़त मिल जाए और देर हो जाए तो आफत ही समझिए. इजाज़त लेने की एप्लीकेशन लिखने में ही सारा वक़्त बीत जाता है. आप आधे घंटे भी लेट हैं तो इसका जवाब देना होगा. एएमयू की लड़कियों ने अपनी स्वीकार्यता के लिए खुद ही खुलकर बोलना बंद कर दिया है.'

'अगर कोई लड़की यहां बोलती है तो उसका चरित्रहरण किया जाता है. बीच में लड़कियों ने लाइब्रेरी में जाना शुरू किया था लेकिन बीते कुछ महीनों में हालात बदतर हुए हैं. खुद को ठेकेदार मानने वाले कुछ लोग हैं, जो एएमयू के नाम पर तहज़ीब के ब्रिगेड बने हुए हैं.'

'आप अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी आइए, आपको लड़कियां लड़कों के साथ ज़्यादा बाहर नहीं दिखेंगी.'

'मैं एक लड़का हूं. मेरी सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि यहां लड़कियों को लोग खुलापन नहीं देना चाहते हैं. मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी लड़कों के लिए दो बजे रात तक खुली रहती है और लड़कियों पांच या छह बजे के बाद नहीं जा सकती हैं. तर्क दिया जाता है कि छेड़खानी की घटना हो सकती है. छेड़छाड़ लड़के खुद करेंगे और फिर कहेंगे कि छेड़खानी के नाम पर लड़कियों के पीछे रखिए. लड़कियों के लिए अब्दुल्ला हॉल एक क़िला बन गया है.'

'यहां जो लड़कियों की यूनियन बनती हैं वो खुद लड़कियों को पीछे रखना चाहती हैं. कैंपस में मेरी नॉर्थईस्ट के जो कुछ दोस्त हैं, वो खुले माहौल से आए हैं, उनसे पूछिए, तब पता चलेगा कि यहां कितनी दिक्कत है.'

एएमयू कैंपस

ऑफ़ बनाम ऑन रिकॉर्ड की वजह?

एएमयू के ये दोनों पहलू बिलकुल अलग हैं. एएमयू के छात्रों और छात्राओं से अगर बात की जाए तो तहज़ीब के नकाब के पीछे सब ढका हुआ है. लड़कियों की दिक्कतें और झुकी नज़रों वाला वो पर्दा भी, जिसके लिए कोई प्रशासनिक आदेश या दबाव तो नहीं है लेकिन मानने वालों ने इसे बस अपना सा लिया है.

एएमयू कैंपस की एक प्रोफेसर इसकी वजह कहती हैं, ''यहां ज़्यादातर लड़कियां ऐसे परिवारों से आई हैं, जिनके लिए यहां पढ़ना भी बड़ी बात है. वो इसे ही जन्नत की हक़ीक़त माने हुई हैं. बीते कुछ वक्त में बुर्का कल्चर भी बढ़ा है. इन दिनों मुस्लिमों के बीच पहचान का संकट बढ़ा है. इन्हें लगता है कि एक साथ नज़र आएंगे तो बेहतर रहेगा. धर्म को बचाए रखने का एक तरीका भी मान लीजिए. लेकिन इस तरह ये कुंए का मेंढक ही बनी रहेंगी. कैंपस में जो स्टूडेंट्स हैं, वो आइडेंटिटी और कम्युनिटी क्राइसेस से गुज़र रहे हैं.''

एएमयू की एक प्रोफेसर जब मुझसे ये बात कह रही थीं, तब उनके चेहरे से ग़ुस्सा और निराशा दोनों साफ़ झलक रहा था.

नाउम्मीदी भरे लहज़े में वो कहती हैं, ''मैं लड़कियों की बात उठाती हूं तो ये कहते हैं कि इस औरत को मशहूर होने का शौक है. मैं मीडिया के सामने बात रखकर भी थक चुकी हूं. कितनी ही मीडिया रिपोर्ट्स आईं लेकिन कुछ नहीं बदलता. लड़कियों की दिक्कतें वैसी ही हैं, जैसी पहले थीं. आप भी क्या ही कर लेंगे.''

सर सैयद अहमद ख़ान

लड़के और लड़कियां: क्या वाकई होता है भेदभाव?

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से क़रीब तीन किलोमीटर की दूरी पर है वूमेन्स कॉलेज अब्दुल्ला हॉल. इस वूमेन्स कॉलेज को डॉ शेख अब्दुल्ला उर्फ पापा मियां ने साल 1906 में शुरू किया था. उस दौर में शेख अब्दुल्ला के इस क़दम की कुछ लोगों ने आलोचना भी की थी.

इस कॉलेज में लड़कियों के लिए स्कूल और अंडरग्रेजुएट कोर्स कराए जाते हैं. अब्दुल्ला हॉल के नियम काफ़ी सख्त हैं. शाम पांच बजे के बाद बाहर निकलने के लिए मशक्कत भरी इजाज़त लेनी होती है. हॉस्टल के नियम भी यूनिवर्सिटी के मुख्य कैंपस के मुक़ाबले काफ़ी कड़े हैं.

एएमयू की प्रोफेसर बताती हैं, ''अब्दुल्ला हॉल में लड़कियों को सिर्फ एक दिन आउटिंग की इजाज़त दी गई. रविवार को 8 से 11 बजे तक. एक बस शुरू की गई लेकिन बाद में उसे भी बंद कर दिया गया. कहा गया कि लड़कियां जाती ही नहीं हैं.''

अब्दुल्ला हॉल की अंडर ग्रेजुएशन की छात्राओं को सेंट्रल लाइब्रेरी में जाने की इजाज़त तो है. लेकिन लाइब्रेरी में लड़कियां गिनती की नज़र आती हैं.

एएमयू के पीआरओ उमर पीरज़ादा समेत कुछ स्टूडेंट्स कैंपस में लड़कियों और लड़कों के लिए स्पोर्ट्स ग्राउंड होने की बात करते हैं. लेकिन शाम साढ़े पांच के क़रीब इन खेल के मैदानों में लड़के तो दिखते हैं लेकिन लड़कियां नज़र नहीं आईं.

एएमयू कैंपस

एएमयू की एक प्रोफेसर 2011 की एक रिपोर्ट के हवाले से बताती हैं, ''कैंपस में लड़कों के लिए जिस कोर्स में 120 सीटें हैं. लड़कियों के लिए उसी कोर्स में सिर्फ 15 सीटें हैं. लड़कियों के लिए किसी कोर्स में दाखिले के लिए कटऑफ भी हाई रहती है.''

एएमयू के पूर्व प्रोफेसर और जाने-माने इतिहासकार इरफान हबीब भी एएमयू कैंपस में छात्राओं के लिए कम सुविधाएं होने की बात करते हैं.

इरफान हबीब कहते हैं, ''लड़कियों की साइंस में लड़कों के मुकाबले कटऑफ ऊंची होती है. ये असंवैधानिक है. आप ये तो कर सकते हैं कि लड़कियों का दाखिला 68 फीसदी पर होगा और लड़कों का 75 फीसदी पर. लेकिन आप इसका उल्टा नहीं कर सकते. वूमेन कॉलेज में साइंस डिपार्टमेंट में ज़्यादा सुविधाएं नहीं हैं, इसलिए ऐसा हो रहा है. यूनिवर्सिटी तो इस पर गौर करने की ज़रूरत है. हालांकि जो लोग कहते हैं लड़कियों का अलग कॉलेज नहीं होना चाहिए, वो गलत है. ये संवैधानिक है.''

एएमयू का एक स्कॉलर छात्र कहता है, ''यहां लड़की और लड़के के बीच इतनी दूरी है कि मैं कई साल से एक लड़की को देख रहा हूं. हम दोनों एक-दूसरे को देखते हैं. बैग रखकर सीट भी एक-दूसरे के लिए रोकते हैं लेकिन आज तक हिम्मत नहीं हुई. ये एएमयू की तहज़ीब है.''

ये सुनकर एएमयू की एक छात्रा की बात याद आ गई, ''यहां खुद को कैद में रखने को तहज़ीब मान लिया गया है.

इस वीडियो में देखिए, AMU में हिंदू छात्राओं का कैसा है अनुभव....

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में छात्राओं का अनुभव?

'इस्लाम में महिलाएं: 360 डिग्री नज़रिया'

एएमयू के उर्दू डिपार्टमेंट की ओर से 10 और 12 नवंबर को एक सेमिनार आयोजित किया गया था. इसे इस्लाम में महिलाओं का रोल समझने के लिए दो दिन का शॉर्ट टर्म कोर्स कहा गया.

कैंपस की दीवार पर चिपका पोस्टर बताता है कि ये सेमिनार सिर्फ महिलाओं के लिए था. इसमें तलाक, निजी और सार्वजनिक जगहों पर मुस्लिम महिलाओं की भूमिका पर बात की गई थी.

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पहचान छिपाए रखने की शर्त पर एएमयू के एक प्रोफेसर ने बताया, ''इस सेमिनार में फेमिनिज़्म कैसे महिलाओं के लिए ख़राब है, इस पर चर्चा हुई. जो हैंडआउट बांटे गए, वो भी काफी आपत्तिजनक हैं. सेमिनार का मक़सद था कि कैसे महिलाओं का पर्दे में रहना, जायज़ है. और ये सब कैंपस के उर्दू विभाग में आयोजित हुआ.''

इस पर्चे में महिलाओं को परिवार के लिए कमाने की ज़िम्मेदारी से मुक्त रहने और पुरुषों को महिलाओं की देखरेख करने वाला बताया गया.

पर्चे में छपी एक लाइन के मुताबिक, ''एक बेटे को पढ़ना क्यों ज़रूरी है, इसकी इस्लामिक वजह है. वहीं महिलाओं के पढ़ने लिखने का मकसद बच्चों को बड़ा करके समाज की मदद करना होना चाहिए.''

Image caption अब्दुल्ला हॉल

एएमयू की ये प्रोफेसर कहती हैं, ''मैं लड़कियों के हक़ में आवाज़ उठाती-उठाती थक चुकी हूं. सालों की मशक्कत के बाद भी कुछ नहीं बदला. मुझे भी चुप रहने की हिदायतें दी जाती हैं. निशाने पर लिया जाता है, लेकिन मैं डरूंगी थोड़ी. ज़्यादा से ज़्यादा क्या कर लेंगे. मार थोड़ी देंगे?''

मग़रिब की नमाज़ का वक्त हो चला था. लड़कियां हाथों में किताबें लिए लौट रही थीं, लड़के बाइकों पर शाम की हवा में टहलने निकल रहे थे.

अब्दुल्ला हॉल के बाहर शाम साढ़े पांच बजे रिकशा से एक बुर्कानशी लड़की उतरती है. मैं उससे पूछता हूं कि एएमयू में आपको किन दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

वो जवाब देती है, ''अल्लाह का शुक्र है, एएमयू में सब ठीक है.''

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