वीरता पदक विजेताओं के भत्ते सुनिएगा तो शर्मा जाइएगा

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सूबेदार मेजर बाना सिंह को 1988 में सियाचिन की पहाड़ियों से घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए बहादुरी के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

पुरस्कार में उन्हें एक लाख रुपए नक़द मिले. इसके साथ उनकी तनख़्वाह में 50 रुपए का मासिक भत्ता जुड़ गया.

चंडीगढ़ जाते वक्त फ़ोन पर उन्होंने बताया, "(उस वक्त) सर्विस में होने के कारण हम कुछ नहीं कह सकते थे. प्रदर्शन भी नहीं कर सकते थे. तनख़्वाह में 50 रुपए जुड़ना मज़ाक की बात है. सोचा था कि सरकार आहिस्ता आहिस्ता इस रक़म को बढ़ा देगी."

बाना सिंह बताते हैं कि करीब अगले 18 सालों तक उन्हें यही 50 रुपए भत्ते में मिलते रहे.

वो कहते हैं, "चार-पांच साल पहले इसे बढ़ाकर 1,500 रुपये कर दिया गया.... एक बार 26 जनवरी की परेड के लिए हम गए तो हमने एक अधिकारी से कहा कि 1,500 रुपये देकर क्या मज़ाक हो रहा है.... फिर हमने सरकार को चिट्ठी लिखी तो उसे बढ़ाकर 10 हज़ार रुपये कर दिया गया."

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Image caption बाना सिंह

विजेताओं का भत्ता

सरकार ने अब इस भत्ते को दोगुना कर दिया है. परमवीर चक्र विजेताओं का भत्ता 10,000 रुपये से बढ़ाकर 20,000 रुपये हो गया है. अशोक चक्र जीतने वालों का भत्ता 6,000 से बढ़कर 12,000 होगा.

महावीर चक्र विजेताओं का भत्ता 5,000 रुपये से बढ़कर 10,000 रुपये हो गया है. कीर्ति चक्र विजेताओं का भत्ता 4,500 रुपये से बढ़कर 9,000 रुपये हो गया है. वीर चक्र विजेताओं को 3,500 रुपये से बढ़कर 7,000 रुपये होगा. इसी तरह शौर्य चक्र, मिलिट्री क्रॉस और अन्य विजेताओं के भत्ते को भी बढ़ा दिया गया है.

पहले और द्वितीय विश्व युद्ध में जंगी इनाम जीतने वालों का भत्ता 500 रुपए से बढ़ाकर 1,000 रुपए हो गया है.

क्या भत्ते में बढ़ोत्तरी देर से उठाया कदम है और क्या ये सैनिकों की उम्मीदों के अनुरूप है?

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रेल मुआवज़े से तुलना

आईपीकेएफ़ सदस्य रहे मेजर जनरल शेओनान सिंह को श्रीलंका में बहादुरी के लिए 1988 में वीर चक्र से सम्मानित किया है.

वो बताते हैं, "मुझे 1988 में 120 रुपये भत्ते के तौर पर मिलने शुरू हुए. उसके बाद वो बढ़ा तो 300 रुपये हुआ. फिर 1,500 रुपये हुआ. जब छठा पे कमीशन आया तो साढ़े तीन हज़ार हो गया. ये भत्ता सिपाही की इज़्ज़त बढ़ाने के लिए दिया जाता है. लेकिन अगर आप कहें कि आप इज़्ज़त बढ़ा रहे हैं लेकिन 120 रुपये या साढ़े तीन हज़ार महीने में आप क्या इज़्ज़त बढ़ा रहे हैं?"

मेजर जनरल शेओनान सिंह आगे कहते हैं, "दूसरी तरफ़ रेल एक्सीडेंट में मरने वाले व्यक्ति को पांच या दस लाख रुपये दिए जाते हैं. सेना में मरने वाले जवान को सिर्फ़ आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस से पैसा मिलता है जिसके लिए वो खुद योगदान करता है. केंद्र और राज्य सरकार का इसमें कोई योगदान नहीं है…. उसका मासिक प्रीमियम भी बढ़ गया है."

पुरस्कार विजेता को भारतीय रेल पर आनेजाने के किराये पर भी छूट मिलती है. वीरता के लिए सम्मानित सैनिकों को पेंशन पर टैक्स नहीं देना होता और उनकी मौत के पत्नी या निकटतम संबंधी को ये भत्ता मिलना जारी रहता है.

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सैनिकों की प्रतिष्ठा

उधर, कुछ लोग सरकार के ताज़ा फ़ैसले को आने वाले चुनाव से भी जोड़कर देख रहे हैं. बाना सिंह कहते हैं, "ये बढ़ोत्तरी पूर्व में किए गए सरकारी वायदे से कम है. पहले जो प्रस्तावों की बात उठी थी तो सरकार ने इसे तीन गुना बढ़ाने की बात कही थी. मगर बाद में कहां लैप्स हो गया, क्या हुआ?"

साल 1948 में आज़ाद भारत में वीरता सम्मान देने शुरू हुए थे. इससे पहले जंगी इनाम दिया जाता था. परमवीर चक्र विजेताओं पर किताब लिख चुके और सेना मेडल विजेता मेजर जनरल कार्डोज़ो बताते हैं कि पहले और द्वितीय विश्व युद्ध में वीरता दिखाने पर ब्रितानी सरकार जंगी इनाम देती थी.

वो कहते हैं, "जंगी इनाम मतलब सैनिकों को एकड़ों ज़मीन दी जाती थी. इससे सैनिक की प्रतिष्ठा बढ़ जाती थी. ये अच्छी बात है कि सरकार ने ईनाम की राशि बढ़ा दी है लेकिन उनका क्या जो युद्ध में मारे गए, उनकी विधवाओं का क्या?"

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मेजर जनरल कार्डोज़ो कहते हैं कि ये अच्छी बात है कि सरकार ने राशि को बढ़ाया है लेकिन परमवीर चक्र देते वक्त दी जाने वाली राशि 1948 में 50 रुपए थी और दशकों तक इतनी ही रही.

वो कहते हैं, "सेना में हम आदेश पर सवाल नहीं उठाते हैं. हम भीख नहीं मांगते. अगर कोई चीज़ आई तो अच्छी बात है. नहीं आई तो भी अच्छी बात है. अगर सरकार खुशी से देती है, तो अच्छी बात है. नहीं देती तो भी अच्छी बात है. कोई पैसे के लिए सेना में शामिल नहीं होता. बहादुरी के दाम लगाना बेमतलब है. अगर सरकार ने भत्ता बढ़ाया है तो हम शुक्रिया अदा करते हैं. सेना में अगर कोई हमें कुछ देता है तो हम शुक्रिया अदा करते हैं. अगर नहीं तो हम चुप रहते हैं."

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