26/11 हमले के बाद भारत कितना सुरक्षित?

  • 26 नवंबर 2017
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26/11 मुंबई हमलों के बाद सुरक्षा के लिए कुछ छोटी-छोटी कोशिशें हुई हैं. तटीय सुरक्षा और पुलिस बल की क्षमता बढ़ाई गई है.

नए हथियारों की ख़रीद के साथ-साथ विशेष सुरक्षा बलों का गठन किया गया है. काफ़ी ख़र्चे किए गए जिनमें से कुछ तो बेवजह हैं जैसे कि कई शहरों में आर्म्ड कारें ख़रीद कर खड़ी कर दी गई हैं जिनका इस्तेमाल मुश्किल से ही होता है.

अधिकतर फ़ालतू चीज़ें हमारी सुरक्षा चौकसी में इसलिए लगा दी जाती हैं क्योंकि इनकी ख़रीद का फ़ैसला रक्षा विशेषज्ञ नहीं करते हैं. इन चीज़ों की ख़ासियतें बताकर कंपनियां इन्हें बेच देती हैं जबकि इसकी समझ सुरक्षाबलों को नहीं होती है.

आमतौर पर यह देखा जाता है कि जो चीज़ करोड़ों में होती है उसे बेहतर समझा जाता है. इसके अलावा करोड़ों रुपयों के सौदों में एक धांधली का मौका भी होता है.

उदाहरण के तौर पर हमने पूरी बिल्डिंग के एक दरवाज़े पर लोहा और एक पर ताला ज़रूर लगा दिया है लेकिन बाकी के खिड़की-दरवाज़े पूरी तरह खुले हैं. जहां से कोई भी आ सकता है.

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सुरक्षा को लेकर एक सिस्टम नहीं

इस समय देश में सुरक्षा को लेकर एकीकृत प्रणाली नहीं है. मुंबई हमलों के लिए चरमपंथियों ने समुद्री रास्ते का इस्तेमाल किया था. इस हमले के बाद तटीय सुरक्षा की महत्ता को समझा गया. इसके बाद कुछ तटीय थाने और पट्रोल बोट्स ख़रीदी गईं लेकिन उसके लिए लोग ही नहीं भर्ती किए जिसके बाद वह खड़ी-खड़ी ही ख़राब हो गईं.

पट्रोल बोट्स का भी कोई फ़ायदा नहीं है. तट तब तक सुरक्षित नहीं हो सकता है जब तक एक-एक नाव का हिसाब न हो. तटीय सुरक्षा एकीकृत नहीं है. यह ज़रूरी है कि अवैध तरीके से कौन-सी नाव घूम रही है.

रेडियो सिग्नल पकड़ने के लिए बोट में ट्रांसपोंडर ज़रूरी हैं. सरकार ने कानून पारित करके कहा गया है कि 20 मीटर से लंबी बोट में ही ट्रांसपोंडर लगाया जाना चाहिए जबकि यह फ़ैसला आंशिक रूप से लागू है. एक सवाल यह भी अहम है कि क्या कोई चरमपंथी 20 मीटर से लंबी नाव में ही मंसूबे लेकर देश में दाख़िल होगा.

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सुरक्षाबल इसके ज़िम्मेदार?

सुरक्षा मज़बूती के लिए सुरक्षाबलों को ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं होगा क्योंकि बजट से संबंधित फ़ैसले प्रशासन या सरकार ही लेती है. सुरक्षाबल ज़रूर प्रस्ताव भेजते हैं लेकिन नीतियों का निर्धारण सुरक्षाबलों के हाथ में नहीं होता है और जब नीतियों का फ़ैसला हो रहा होता है तो बजट देखा जाता है.

ज़रूरी चीज़ों को बजट के हिसाब से तवज्जो दी जाती हैं और विशेष सुरक्षाबलों पर ही ध्यान दिया जाता है. इनका ध्यान भी ख़ास चीज़ों पर ही होता है. इसकी जगह पुलिस और इंटेलिजेंस को ही मज़बूत करने की ज़रूरत है.

इस बात पर हैरत होती है कि ऐसे माहौल में भारत की इंटेलिजेंस एजेंसी कैसे कामयाब हैं. भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) की कुल क्षमता 8 से 9 हज़ार के बीच है और इसमें एजेंट नहीं हैं. इस क्षमता के लिहाज़ से इतने बड़े देश के लिए यह काफ़ी नहीं है.

वहीं, आंतरिक इंटेलिजेंस का ज़िम्मा संभालने वाली आईबी के 5 से 7 हज़ार से अधिक एजेंट नहीं होंगे. राज्य के ख़ुफ़िया ब्यूरों की बात करें तो कहीं-कहीं छोटे-छोटे डिपार्टमेंट हैं. साथ ही इंटेलिजेंस का डेटा बेस भी नहीं बना है.

क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रेकिंग नेटवर्क सिस्टम की तकरीबन 1996 से तैयारी बनाए जाने की जा रही है. इसमें आधार कार्ड भी काम नहीं आ सकता है क्योंकि बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन कोई भी कर सकता है.

क्रिमिनल डेटाबेस सिस्टम पहली बार अमरीका में 1968 में शुरू हुआ था जो आज तक भारत में शुरू नहीं हो सकता है. पश्चिमी देशों में पहली बार ट्रैफिक नियम तोड़ने पर ऑनलाइन डेटा बन जाता है और कोई अपराध करने पर उसे चेक किया जा सकता है.

भारत में कोई चरमपंथी पहली बार पकड़ा जाता है. बरी होने के बाद उसका कोई पता नहीं चलता है और इसकी वजह डेटाबेस सिस्टम है.

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डर फ़ैलाने में तब्दीली

दहशतगर्दों के काम करने की तरीक़ों में बदलाव ज़रूर आया है. तकनीक ने भी इसमें बढ़ावा दिया है. साथ ही चरमपंथी संगठनों के काम में बदलाव भी आया है. आज लश्कर का एक साथी दूसरे साथी को नहीं पहचानता है.

किसी को पकड़ा जाए तो वो दूसरे शख़्स के बारे में नहीं बताता है. इसका अर्थ है कि एक पूरी चेन के बारे में पता करना बहुत कठिन है.

कई देश चरमपंथ रोकने में कामयाब रहे हैं. उसमें सेना का आगे रहना भी बड़ी वजह है जो भारत में नहीं हो सकता है. पंजाब में ख़ालिस्तान आंदोलन के दौरान भी सेना आगे नहीं थी उसमें पुलिस आगे थी.

केपीएस गिल ने टार्गेटेड ऑपरेशन किया. वह छोटे-छोटे चरमपंथियों के पीछे नहीं भागते थे. उन्होंने बड़े नेतृत्व को निशाना बनाया.

पाकिस्तान में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ पूरे के पूरे गांव खाली करा दिए जाते हैं जिसके बाद सेना आगे रहती है और गांव उड़ा दिए जाते हैं. भारत में ऐसा उदाहरण देखने को नहीं मिलता.

भारत की रणनीति मानवतावाद के क़रीब है और गांव उड़ाने के उदाहरण नहीं मिलते. हालांकि, ज़्यादतियां होती रही हैं. हर जगह पर सेना के इस्तेमाल को लेकर विरोध भी होता है.

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परमाणु हथियार घातक?

इस वक़्त किसी चरमपंथी संगठन के पास परमाणु हथियार नहीं है. हालांकि, कोशिशें सब की हैं. सोवियत यूनियन से अलग हुए देशों के पास ज़रूर ये हथियार हैं. इन हथियारों को किसी दूसरे संगठनों को नहीं दिया गया है.

अगर किसी राष्ट्र से यह हथियार चरमपंथियों के पास जा सकते हैं तो वह पाकिस्तान होगा. क्योंकि इसकी विचारधारा चरमपंथी संगठनों से बहुत मिलती-जुलती है. पाकिस्तानी सेना में भी इस विचारधारा के बहुत लोग हैं.

परमाणु हथियार अगर चरमपंथियों के हाथ लगते हैं तो इससे उतना नुक़सान नहीं होगा जितना जैविक हथियारों से हो सकता है.

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मुंबई 26/11 - कैसे बदली ज़िंदगी

जैविक हथियारों से भारत को कितना नुकसान

26/11 जैसा हमला अगर जैविक हथियारों से हो तो इसके संक्रमण से लाखों लोग प्रभावित होंगे. वायरस तेज़ी से फैलने वाला हथियार हो सकता है.

इससे गंभीर बीमारियां हो सकती हैं और यह बारूद से कहीं घातक होगा. इसको लेकर तैयारी के साथ-साथ जागरुकता भी फैलाई जा सकती है.

विशेषज्ञों का कहना है कि एमएससी का छात्र भी इन हथियारों को तैयार कर सकता है और इसको चलाने में भी मुश्किल नहीं है जबकि परमाणु हथियारों के लिए काफ़ी तैयारी करनी होती है. परमाणु हथियार मिलना तो मुश्किल है और साथ ही उसे लॉन्च करना और भी मुश्किल है.

(बीबीसी हिंदी रेडियो के संपादक राजेश जोशी से बातचीत पर आधारित)

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