जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी क्यों और कितना उबल रही है?

  • 28 नवंबर 2017
जेएनयू इमेज कॉपीरइट Getty Images

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी भारत की इकलौती ऐसी यूनिवर्सिटी जो वर्ल्ड रैंकिंगों में शुमार होती रही है. लेकिन नौ फरवरी, 2016 के बाद से इस यूनिवर्सिटी को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का जो सिलसिला शुरू हुआ, वो अब तक नहीं थमा है.

एक तरह से, इन दिनों जेएनयू में वर्चस्व को लेकर दो खेमों में होड़ मची हुई है. एक तरफ़ वो तबका है जो जेएनयू को अपने प्रगतिशील एजेंडे से चलाना चाहता है और दूसरी तरफ़ राष्ट्रवादी विचारधारा वाला तबका जेएनयू पर अपनी पकड़ मज़बूत करना चाहता है.

जेएनयू में स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ में प्रोफ़ेसर अजय पटनायक जेएनयू की मौजूदा स्थिति के बारे में कहते हैं, "बीते तीन साल के दौरान नेशनलिज़्म का नैरेटिव थोपने का दौर शुरू हो गया है, इसके चलते ही 2016 में जेएनयू के छात्रों की गिरफ़्तारी भी हुई. इसके साथ-साथ इंस्टीच्यूट की अपनी ऑटोनॉमी पर भी ख़तरा बढ़ गया है."

भारत के यूनिवर्सिटी कैम्पसों में आख़िर चल क्या रहा है?

जब नेहरू ने दंगाइयों से लड़ने के लिए अपनी पिस्टल निकाल ली

इमेज कॉपीरइट PTI
Image caption एम जगदीश कुमार

कुलपति के फ़ैसलों पर सवाल

ऐसे वक्त में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति एम जगदीश कुमार के हर फ़ैसले पर सवाल भी ख़ूब उठ रहे हैं.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (जेएनयूटीए) की अध्यक्ष और लिटरेचर एंड कल्चरल स्टडीज की प्रोफ़ेसर आयशा किदवई कहती हैं, "वाइस चांसलर मनमाने फ़ैसले थोप रहे हैं, हम लोगों से बात तक नहीं करते और इस अंदाज़ में काम कर रहे हैं जैसे उन्हें यूनिवर्सिटी को बंद कराने के लिए ही भेजा गया हो."

एम जगदीश कुमार जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति बनने से पहले आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर रहे हैं और यूनिवर्सिटी कैंपस में टैंक लगाने की मांग के साथ काफ़ी सुर्खियां बटोर चुके हैं.

लेकिन जेएनयू कैम्पस में ही बीते 23 से 27 अक्टूबर के बीच इन पर जेएनयू-टीए की ओर से सात मामलों पर जन सुनवाई की गई. ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि वाइस चांसलर के किन फ़ैसलों पर सवाल उठ रहे हैं?

'यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट के खाना बनाने में प्रॉब्लम क्या है'

5 मौके जब नरेंद्र मोदी सरकार से भिड़े छात्र

कैसे बदल रहा है जेएनयू का नैरेटिव

जेएनयू में बीते तीन सालों में कैसा बदलाव आया, इसे इसी साल नेहरू मेमोरियल लेक्चर से समझा जा सकता है. इस लेक्चर को देने के लिए श्री श्री रविशंकर को बुलाया गया.

जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष गीता कुमारी कहती हैं, "बताइए श्री श्री रविशंकर का नेहरू से क्या लेना देना हो सकता. ना जाने क्या-क्या अध्यात्म और दूसरी चीज़ों पर वो बोलकर गए. छात्रों को एक तरह से ठगा गया."

ये एक उदाहरण है जेएनयू में हाल के दिनों में ऐसे आयोजन बढ़े हैं. इतना ही नहीं संस्कृत जैसे विषय के लिए एक पूरा स्कूल खोलने की तैयारी की जा रही है. हालांकि, जेएनयू में ऐसे आयोजनों की कोशिश अटल बिहारी वाजपेयी के समय में भी हुई थी, लेकिन इस बार ऐसी कोशिशें कहीं ज़्यादा संगठित तौर पर की जा रही हैं.

विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर अफ्रीकन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर एसएम मालाकार कहते हैं, "वाजपेयी और आडवाणी का दौर दूसरा था, वे दूसरे किस्म के लोग थे, जिन्हें भारत की विविधता का अंदाज़ा था. संघ के विचारों को उन्होंने धीमे-धीमे लागू करने पर ध्यान दिया था, पूरी तरह से थोपने की कोशिश नहीं की थी, जैसी कोशिश अभी की जा रही है."

हिंदी माध्यम से कोई नहीं बनना चाहता इंजीनियर?

विभाजन में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी कैसे बची?

इमेज कॉपीरइट Tarendra Kishore/BBC

जेएनयू कैंपस के अंदर बदलाव

जेएनयू कैंपस में यौन उत्पीड़न पर रोकथाम के लिए जेंडर सेंसिटाइज़ेशन कमेटी अगेंस्ट सेक्शुअल हैरसमैंट (जीएसकैश) का प्रावधान था. लेकिन मौजूदा कुलपति ने इसकी जगह नए प्रावधान इंटरनल कंप्लेंट्स कमिटी (आईसीसी) को लागू करने की घोषणा की.

उनकी इस घोषणा का जेएनयू के छात्र संघ और शिक्षक संघ ने बड़े पैमाने पर विरोध किया है. कुलपति के फ़ैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती भी दी गई है.

जेएनयू में एआईएसएफ की छात्र नेता और पीएचडी छात्रा राहिला परवीन कहती हैं, "जीएसकैश में छात्र और शिक्षकों के प्रतिनिधि शामिल होते थे लेकिन नए प्रावधान में छात्रों का प्रतिनिधित्व नहीं रखा गया है. ऐसा तब किया गया जबकि इस प्रावधान की मिसाल दी जाती रही है और दूसरी जगहों पर भी इसे अपनाया गया है."

जेएनयू में यूनाइटेड लेफ़्ट ने क्लीन स्वीप किया

जेएनयू में भगवा पर क्यों हावी है लाल झंडा?

इमेज कॉपीरइट SAJJAD HUSSAIN/AFP/GETTY IMAGES

सीट कटौती और एडमिशन पॉलिसी का सवाल

आयशा किदवई के मुताबिक जेएनयू में कई विभाग ऐसे हैं जिनमें 83 फ़ीसदी तक सीट कटौती की जा चुकी है. इतना ही नहीं, जेएनयू की नामांकन प्रक्रिया में इंटरव्यू को निर्णायक आधार बना दिया गया है.

पहले जेएनयू में नामांकन के दौरान 70 फ़ीसदी लिखित परीक्षा और 30 फ़ीसदी अंक साक्षात्कार के आधार पर दिए जाते थे. इस व्यवस्था का भारी विरोध यूनिवर्सिटी के दलित और अति पिछड़ा समुदाय से आने वाले छात्र पहले भी करते रहे थे.

यूनिवर्सिटी कैंपस में यूनाइटेड ओबीसी फ़ोरम से जुड़े पीएचडी के छात्र मुलायम सिंह कहते हैं, "पहले 30 अंक में ही दलितों और पिछड़ों के साथ भेदभाव होता था. इसको लेकर यूनिवर्सिटी में तीन-तीन कमेटियां बन चुकी हैं. 2016 में बने नाथे कमेटी ने कहा था कि इंटरव्यू के अंक 15 होने चाहिए."

लेकिन जेएनयू प्रशासन ने अब लिखित परीक्षा को क्वॉलिफाइंग परीक्षा घोषित करते हुए इंटरव्यू के पूरे 100 अंक कर दिए हैं. बिरसा-मुंडा-फुले स्टुडेंट्स एसोसिएशन से जुड़े छात्र जे प्रवीण कहते हैं, "इससे बहुजन छात्रों की मुश्किल बढ़ेगी, वो जेएनयू पहुंच ही नहीं पाएंगे."

कार्टून: जेएनयू में टैंक तो कॉलेजों में?

'जेएनयू के लिए टैंक मांगा था, रक्षा मंत्री मिला'

इमेज कॉपीरइट Tarendra Kishore/BBC

यूजीसी की ताक़त

इतना ही नहीं, जेएनयू में पिछड़े इलाक़े से आने वाले लड़कों को डिप्रिवेशन प्वॉइंट के नाम पर कुछ प्वॉइंट मिलते थे, उसे भी ख़त्म कर दिया गया है. इन दोनों मामले में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी प्रशासन की ओर से बताया जा रहा है कि यूनिवर्सिटी, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के प्रावधानों को लागू कर रहा है.

यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर अफ्रीकन स्टडीज़ के प्रोफेसर एसएम मालाकार कहते हैं, "2014 के बाद से यूजीसी को इतनी ताक़त दे दी गई है कि वे पूरे देश में यूनिफॉर्म पॉलिसी लागू करें, इससे अलग-अलग विश्वविद्यालयों की अपनी पहचान ख़त्म हो जाएगी. ये पूरी प्रक्रिया ऑथेरेटेरियन है जो विविधता भरे भारत के मूल विचार के उलट है."

जेएनयू के एसोसिएट डीन डॉक्टर बुद्धा सिंह कहते हैं, "ऐसा तो हो नहीं सकता है ना कि यूजीसी के प्रावधान दूसरे विश्वविद्यालयों के लिए अलग होगा और जेएनयू के लिए अलग. ऑटोनॉमी का मतलब ये भी नहीं है कि आप यूजीसी के नियम का उल्लंघन करें."

यूजीसी के प्रावधानों के मुताबिक एक प्रोफ़ेसर, एसोसिएट प्रोफ़ेसर और असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के लिए अलग-अलग संख्या के छात्रों को निर्धारित कर दी है. जेएनयू में सीट कटौती की एक बड़ी वजह ये भी है.

सोशल साइंसेज़ स्टडीज़ के एसोसिएट प्रोफ़ेसर तनवीर फ़ज़ल बताते हैं, "यूजीसी का दबाव तो 2008-09 से ही बढ़ने लगा था. उसकी भूमिका केवल अनुदान देने भर की नहीं थी, लेकिन 2014 के बाद से उनकी सलाहें आदेश और गेजेट्स नोटिफिकेशन के तौर पर आने लगीं और जेएनयू में उसे लागू करने की होड़ लग गई."

'जेएनयू जैसा है, वैसा यूं ही नहीं है'

'सतही हो चुकी है जेएनयू की भीतरी विचारधारा'

इमेज कॉपीरइट Tarendra Kishore

शिक्षकों की नियुक्ति और सवाल

एम जगदीश कुमार ने जब विश्वविद्यालय का प्रभार संभाला, तब शिक्षकों के 308 पद खाली थे. इन पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. लेकिन इसको लेकर सवाल भी ख़ूब उठ रहे हैं. वामपंथी रूझान वाले शिक्षकों का आरोप है कि ख़ास विचारधारा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले लोगों को नियुक्त किया जा रहा है.

जेएनमयू में इंटरनेशनल स्टडीज़ विभाग में प्रोफ़ेसर अजय पटनायक कहते हैं, "पहले डिपार्टमेंट एक्सपर्ट की लिस्ट भेजते थे, उसमें से एक्सपर्ट के नाम वाइस चांसलर चुना करते थे. पहले उस लिस्ट में कुछ जोड़ने घटाने का अधिकार वाइस चांसलर के पास था, लेकिन लोग ऐसा नहीं करते थे. अब तो ये भी देखने को मिल रहा है कि तीनों के तीन एक्सपर्ट बाहर से आ गए हैं."

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय शिक्षक संघ की अध्यक्ष आयशा किदवई कहती हैं, "शिक्षकों की नियुक्ति सब्जेक्टिव मामला है. लेकिन ये बहुत चिंता की बात है क्योंकि अभी ख़ास विचारधारा के लोगों को कमतर योग्यता के बाद भी नियुक्ति पाते हैं तो इसका असर छात्रों पर पड़ेगा. लेकिन हमलोग इसका विरोध कर रहे हैं."

इमेज कॉपीरइट Tarendra Kishore/BBC

जेएनयू प्रशासन

इस मामले में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति एम जगदीश कुमार से बातचीत करने की कई बार कोशिशें कीं, लेकिन उनके दफ़्तर से हमेशा ये बताया गया है कि वे बेहद व्यस्त हैं.

हालांकि, बुद्धा सिंह कहते हैं, "जिन शिक्षकों को नियुक्त किया जा रहा है वो सबके सब उपयुक्त उम्मीदवार हैं और तय मानकों से बेहतर उम्मीदवार हैं. विदेशों से रिसर्च करने वाले लोग हमारे विश्वविद्यालय से जुड़े हैं."

वैसे मौजूदा समय में 600 से ज्यादा फ़ैकल्टी मेंबरों में दलित, पिछड़ा और मुसलमानों को मिलाकर करीब 100 सदस्य होंगे. जेएनयू प्रशासन के सामने इस अनुपात को भी बेहतर करने की चुनौती है.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में छात्रों में एक अजीब डर देखने को मिल रहा है. किसी भी तरह के धरना प्रदर्शन करने वाले छात्रों में नोटिस मिलने का डर सताता रहता है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

जेएनयू में नोटिस राज

जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष गीता कुमारी कहती हैं, "अब तो किस बात पर नोटिस मिल जाए, फ़ाइन लग जाए नहीं कहा जा सकता. धरना प्रदर्शन पर बैठे, इधर बैठ गए, उधर क्यों नहीं, इन बातों के लिए भी नोटिस भेजे जा रहे हैं. इतना ही नहीं हज़ारों रुपये जुर्माना भरने को कहा जा रहा है."

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र नेता सौरभ शर्मा कहते हैं, "अनुशासनहीनता का मामला हो तो नोटिस मिलता है, फ़ाइन भी लगता रहा है. कोई पहली बार तो नहीं लग रहा है. मुझे भी नोटिस मिला है."

बुद्धा सिंह कहते हैं, "एडमिनिस्ट्रेटिव कामों में नोटिस तो लगाना पड़ता है. लेकिन इससे जेएनयू के 99 फ़ीसदी छात्रों को कोई समस्या नहीं है. समस्या केवल उन लोगों को है जो पढ़ाई लिखाई के बदले एक्टिविज़्म करना चाहते हैं, पॉलिटिक्स करना चाहते हैं."

निशाने पर ढाबा कल्चर

जेएनयू की एक पहचान यहां देर रात तक खुले रहने वाले ढाबे भी रहे हैं. जहां छात्र खाने-पीने के साथ बहसों के लिए भी एकजुट होते रहे थे. लेकिन मौजूदा प्रशासन ने रात के 11 बजे के बाद गंगा ढाबा को छोड़कर तमाम ढाबों को बंद करा दिया है, जिससे छात्रों को काफ़ी मुश्किल भी होती है.

ऐसा सुरक्षा के नाम पर किया गया है, लेकिन जेएनयू प्रशासन के फ़ैसले का विरोध करने के लिए इन दिनों जेएनयू में स्टोव पर चाय बनाकर गपशप करते देर रात छात्र गुटों में नज़र आते हैं. ये छात्र इसे गोरिल्ला ढाबे का नाम भी देते हैं.

जेएनयू में अलग-अलग मुद्दों पर बहस और विचार विमर्श की लंबी परंपरा रही है, जहां विचारधारा के स्तर पर मतभेद रखने वाले भी एक साथ बात करते रहे हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

संवाद पर सवाल

हालांकि जेएनयू शिक्षक संघ और छात्र संघ दोनों की ओर से बताया जा रहा है कि मौजूदा वाइस चांसलर समय मांगने पर भी नहीं मिलते हैं.

छात्र संघ की अध्यक्ष गीता कुमारी ने कहा, "उन्होंने महीने में एक दिन फिक्स किया हुआ है, छात्रों से मिलने को. कई बार कोशिश करने पर भी नहीं मिलते हैं. गार्जियन होने के बाद भी बस एक दिन मिलते हैं और उसमें भी संवाद नहीं होता है. वो अपने फ़ैसले सुनाते हैं."

वहीं, बुद्धा सिंह का कहना है कि वाइस चांसलर ने छात्रों से एक दिन तो फिक्स किया हुआ ही है, साथ में ज़रूरत पड़ने पर लोग उनसे दफ़्तर में मिलने आते हैं.

वैसे नए कुलपति के आने के बाद जेएनयू के मामले अदालतों में भी पहुंचने लगे हैं. छात्र संघ और शिक्षक संघ जीएसकैश को लेकर वाइस चांसलर के फ़ैसले को चुनौती दे रहे हैं.

इमेज कॉपीरइट PTI

जेएनयू के मामले अदालतों में

इसके अलावा लापता छात्र नजीब अहमद मामले में जेएनयू प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाने वाले छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष मोहित पांडेय के निष्कासन को भी हाइकोर्ट में चुनौती दी गई है.

व्यक्तिगत स्तर पर भी कुछ शिक्षक अपने प्रमोशन और कुछ छात्र अपने ऊपर हो रही कार्रवाई को अदालत में चुनौती दे रहे हैं. आयशा किदवई कहती हैं कि वाइस चांसलर के साथ संवाद की कोई स्थिति नहीं होने के चलते ही लोग अदालतों में जा रहे हैं.

हालांकि, इन तमाम आरोपों के बीच एम जगदीश कुमार जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में आने वाले समय में काफ़ी कुछ विस्तार करने जा रहे हैं.

इन विस्तारों के बारे में जानकारी देते हुए बुद्धा सिंह कहते हैं, "अगले साल से इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम शुरू होने वाला है और भी कई पाठ्यक्रम शुरू होंगे. मैनेजमेंट के पाठ्यक्रम भी शामिल किए जाएंगे. पहले इसे केवल एक स्ट्रीम के लिए जाना जाता है, अब मल्टीपल स्ट्रीम के लिए इसकी पहचान बनेगी."

इमेज कॉपीरइट PTI

जेएनयू का विस्तार

जेएनयू प्रशासन का ये भी दावा है कि एम. जगदीश कुमार के कार्यकाल के दौरान ही यूनिवर्सिटी में दो नए हॉस्टल बनाए जा रहे हैं ताकि एक भी छात्र को हॉस्टल का इंतज़ार नहीं करना पड़े.

करीब आठ हज़ार छात्रों को सस्ती दरों पर आला दर्जे की शिक्षण सुविधा मुहैया करा रहे जेएनयू के सामने एक ख़तरा बाज़ार का भी है.

तनवीर फ़ज़ल कहते हैं, "जिस तरह से एनसीआर रीजन में अशोक, शारदा और जिंदल यूनिवर्सिटी बढ़ रही हैं, उसे देखते हुए सबसे बड़ा ख़तरा तो बाज़ार का भी दिख रहा है."

वहीं, अजय पटनायक कहते हैं, "जेएनयू एक लंबी प्रक्रिया के बाद तैयार हुआ था, जल्दी से इसे ख़त्म नहीं किया जा सकता."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए