गुजरात ग्राउंड रिपोर्ट- दलितों की जींस और मूँछें खटकती हैं

  • 1 दिसंबर 2017
मूंछे इमेज कॉपीरइट Getty Images

गुजरात की राजधानी गांधीनगर से सिर्फ़ 20 किलोमीटर की दूरी पर रहने वाले कुणाल महेरिया इन चुनावों को अहम नहीं मानते.

लिम्बोदरा गांव के दलित मोहल्ले में रहने वाले कुणाल का कहना है कि प्रदेश में भाजपा की सरकार हो या कांग्रेस की, उनके जैसे दलितों के जीवन में कोई बेहतरी नहीं आने वाली.

उनके ऐसा कहने के पीछे की कहानी यूँ है.

गुजरात में दलितों पर एक के बाद एक हमले

'दलित किशोर ने गढ़ी थी मूंछ को लेकर हमले की कहानी'

"उस रात मैं अपने एक दोस्त से मिलने के लिए घर से निकला ही था कि मुझे थोड़ी दूर से दरबार मोहल्ले में रहने वाले भरत वाघेला की मोटरबाइक की आवाज़ सुनाई पड़ी. मैं पैदल चल रहा था पर उसकी गाड़ी की आवाज़ सुनकर मैं पहले चुपचाप एक किनारे में होकर चलने लगा. वह फिर भी मेरी तरफ आया और अपनी बाइक मेरे ऊपर चढ़ा दी. मैं दूर हटा तो उसने मुझे गालियां देते हुए कहा मैं खुद को क्या समझता हूं. और यह कि छोटी जात का होते हुए भी मेरी हिम्मत कैसे हुई उसके सामने बोलने की".

इतना कहने के बाद दो कमरे के पक्के मकान में अपने पिता के साथ बैठे कुणाल खामोश हो जाते हैं. फिर अपने हाथों में रखे मोबाइल फ़ोन को बेचैनी से उलटते-पलटते हुए नज़रें नीची कर फर्श को घूरने लगते हैं.

ऊंची जातियों से टकराव

कुछ देर बाद कापंती हुई आवाज़ में वह आगे कहते हैं, "मैंने फिर कहा कि मुझे कोई झगड़ा नहीं करना और मैं अपने रास्ते जाने की कोशिश करने लगा. पर वह नहीं माना और अपनी बाइक सामने लाकर खड़ी कर दी. मुझे उसकी बातें चुभ रही थीं पर मैं लड़ना नहीं चाहता था. लेकिन फिर उसने अपनी बाइक में बंधा डंडा निकला और मुझे गालियां देते हुए ज़ोर-ज़ोर से पीटने लगा. वहां आस-पास खड़े लोगों ने मुझे बचाने की कोशिश की पर वो मुझे मारते हुए बार-बार मेरी जाति बताता रहा और देख लेने की धमकियाँ देता रहा."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कुणाल पर हुआ हमला बीते सितंबर और अक्तूबर के दौरान दलित युवकों पर हुए तीन हमलों में से एक है. मामले में तालुका के कालोल पुलिस थाने में भरत वाघेला के खिलाफ आईपीसी की धारा 323 और अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है.

कुणाल बाताते हैं कि पुलिस ने एक दिन आकर भरत और उसके दोस्तों को समझाया कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, उसके आगे कुछ नहीं हुआ.

"घटना के बाद जब मैं घर आया तो मेरे पिता मुझे अस्पताल ले गए. सरकारी अस्पताल था तो डॉक्टर ने मेरी पीठ के ज़ख्म देखकर कहा कि पुलिस केस बनेगा. हमने केस दर्ज भी करवाया पर कुछ हुआ नहीं. पुलिस की जांच अभी भी चल रही है".

कुणाल पर हुए इस हमले से जुड़े घटनाक्रम की शुरुआत 25 सितंबर को लिम्बोदरा में ही पीयूष परमार और दिगन मेहरिया पर हुए हमलों से हुई थी. 21 वर्षीय पीयूष और 17 वर्षीय दिगन गाँव में चल रहे गरबा मेले में गए थे.

"गांव के दरबार ठाकुर लोगों को उनका मेला देखना पसंद नहीं आया. दरबार के कुछ लड़कों ने पियूष और दिगन को दलित होकर भी मूंछ रखने, शर्ट को जींस में सेटिंग करके गरबा देखने आने को लेकर ताने दिए. उनके बीच में कहासुनी हो गई लेकिन उस दिन मामला वहीं ख़त्म हो गया. पर अगले दिन दरबार के दो लड़कों ने आकर पीयूष और दिगन को धमकते हुए कहा कि दलित होते हुए उनकी हिम्मत कैसी हुई उनको जवाब देने की".

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कुणाल बताते हैं, "दिगन और पीयूष ने गांव की चौकी में अर्जी दर्ज की पर कुछ नहीं हुआ. दरबार परिवारों के लड़के दिगन को स्कूल जाते हुए परेशान करते और पीयूष को नौकरी पर जाते हुए. दिगन तो अपनी ग्यारहवीं की परीक्षाएं भी ठीक से नहीं दे पाया. फिर मेरे साथ मारपीट हुई और उसके कुछ दिन बाद, 3 अक्टूबर को, दिगन की पीठ पर ब्लेड से हमला हुआ. तब मुझे लगा कि अब अगला नंबर मेरा है".

आरोप वापस लेने का दबाव

दिगन की पीठ पर हुए हमले के बाद पुलिस केस दर्ज किया गया लेकिन घटना के कुछ ही दिन बाद दिगन और उसके परिवार ने हमले की पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए शिकायत वापस ले ली.

कुणाल के पिता रमेश भाई का कहना है की दिगन और पीयूष पर सभी आरोप वापस लेने का दबाव था. "ब्लेड वाले हमले के बाद सब बहुत डर गए थे और दबाव में थे. उनके परिवारों ने अब समझौता कर लिया है इसलिए अब वह मीडिया से भी बात नहीं करते".

लिम्बोदरा में दलितों पर हो रहे इन हमलों की वजह पूछने पर कुणाल कहते हैं, "पहले हमारा परिवार गाँव के दरबार लोगों के यहां मज़दूरी करता था पर अब हमारे घर में सब नौकरी करते हैं इसिलए अब हम उनकी मजदूरी नहीं करते. बस उनको यही बात उन्हें बुरी लगती है".

कुणाल के पिता रमेश गांधीनगर में ऑटो चलाते हैं जबकि कुणाल टेलीकॉम कंपनी रिलायंस-जियो में कर्मचारी हैं.

"दरबार के लोगों को हमारा मूँछें रखना नहीं पसंद. हमारा जींस और शर्ट पहनना नहीं पसंद. हमारा शान्ति से कमाना खाना और अपने इस छोटे से मकान में रह पाना उन्हें अच्छा नहीं लगता. उनको इसी बात का बुरा लगता है कि अब हमने उनकी गुलामी बंद कर दी है".

लिम्बोदरा के दलित युवाओं पर हुए इन जातिगत हमलों के विरोध में सोशल मीडिया पर "जातिवाद के विरोध में और पीड़ितों के समर्थन में" जैसे हैशटैग के साथ "मैं भी दलित" अभियान शुरू हो गया था. इस अभियान के तहत देश भर के दलित युवाओं ने मूँछों के साथ अपनी तस्वीरों को सोशल मीडिया पर पोस्ट करना शुरू किया.

इमेज कॉपीरइट PIYUSH PARMAR
Image caption पीयूष परमार

सोशल मीडिया

सोशल मीडिया के बारे में कुणाल कहते हैं, "सोशल मीडिया पर जो सर्मथन मुझे मिला वो बहुत महत्वपूर्ण है और उससे मुझे हिम्मत भी मिली पर फिर भी मुझे रोज़ अपनी जिंदगी अकेले खुद ही जीनी पड़ती है. सोशल मीडिया से कोई भी आकर मुझसे यह नहीं पूछता कि आज मैं अकेले दफ्तर कैसे जाऊंगा? कहीं रास्ते में मुझे कोई मार तो नहीं देगा? कोई नहीं आता और कोई कुछ नहीं पूछता. मैं रोज़ डरते-डरते ऑफिस जाता हूँ".

29 सितंबर की घटना ने कुणाल को भीतर तक तोड़ दिया है. घटना के बाद का वक़्त याद करते हुए वह बताते हैं, "मैं डिप्रेशन में चला गया था. हर वक़्त उदास रहता था. मेरा पूरा आत्मविश्वास ख़त्म हो गया था. उस वक़्त मेरी कुछ परीक्षाएं भी थीं जिनकी तैयारी मैं ठीक से नहीं कर पाया था. अगले महीने दिवाली थी पर हमने दिए नहीं जलाए. पूरे घर में उदासी फैली थी जैसे कोई मर गया हो".

वे बताते हैं कि उनकी ज़िंदगी ही बदल गई, "पहले मैं रोज़ हर सुबह 5 किलोमीटर दौड़ने जाता था. पर अब कभी नहीं जाता. रात को भी अगर 9 बजे से ज़रा ज्यादा देर हो जाए तो मेरे मम्मी-पापा की सांस रुकने लगती है. ऑफिस जाने में भी डरता हूँ. अपने ही गाँव में डर डर के क़ैदियों की तरह जीना पड़ रहा है".

इमेज कॉपीरइट Facebook

गुजरात चुनाव से इस दलित युवा को कोई सरोकार नहीं. पर जिग्नेश मेवानी का नाम लेते ही वह नज़रें ऊपर करके कहते हैं, "जिग्नेश भाई ने हमारी बहुत मदद की. उनका फोन आया था मुझे. उन्होंने फोन पर कहा कि मैं न डरूँ और वो मेरे साथ हैं. उनसे हमें हिम्मत तो मिली पर राजनीति और चुनाव से कोई उम्मीद नहीं है.

प्रदेश में भाजपा की सरकार है और हमारे गाँव में जो विधायक हैं, वह कांग्रेस के टिकट से जीत कर आए थे. पर दोनों में से कोई हमारी मदद के लिए आगे नहीं आया. इसलिए मुझे विश्वास हो गया है कि दलितों की देश में और इन चुनावों में कोई सुनवाई नहीं है".

गुजरात में दलितों की आबादी सात प्रतिशत है लेकिन वो अभी तक कोई सियासी प्रेशर ग्रुप नहीं बना पाए हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे