नज़रिया: क़ानून के मनमाफिक इस्तेमाल से कैसे बनेगा मोदी के सपनों का 'न्यू इंडिया'?

  • 3 दिसंबर 2017
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संविधान दिवस पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और चीफ़ जस्टिस ने क़ानून के राज पर ज़ोर दिया. दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में आईपीसी की धारा 498-ए दहेज क़ानून की वजह से होने वाली गिरफ़्तारियों पर पुनर्विचार हो रहा है.

क्या राज्यों की पुलिस और केंद्र सरकार की एजेंसियों द्वारा क़ानूनों के मनमौजी इस्तेमाल पर अब देशव्यापी बहस नहीं शुरू होनी चाहिए?

दिल्ली में जनता ने भाजपा को ठुकराया, कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ कर दिया और आम आदमी पार्टी को ऐतिहासिक जनादेश दिया.

देश में एक तिहाई सांसद और विधायक आपराधिक और दागी पृष्ठभूमि के हैं. आप पार्टी भी अन्य राजनीतिक दलों से अलग नहीं है, यह साबित करने के लिए उसके 13 विधायकों के ख़िलाफ़ कई आपराधिक मामले दर्ज किए गए.

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अवमानना की कार्यवाही

सभी पार्टियों की सरकारें अपने विधायकों को संसदीय सचिव या दूसरे तरीके से 'गैर-क़ानूनी लाभ' देती रही हैं.

सवाल यह है कि विधायकों को अयोग्य घोषित करने की कार्रवाई सिर्फ़ दिल्ली में आप के 21 विधायकों के ख़िलाफ़ क्यों हो रही है?

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'आप' नेताओं के ख़िलाफ़ दर्ज मामले अगर क़ानून का दुरुपयोग नहीं हैं, तो दूसरी पार्टियों के नेताओं के संबंध में ऐसी सख़्त कार्रवाई क्यों नहीं की जाती?

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सोशल मीडिया और इंटरनेट

फिल्म 'पद्मावती' के ख़िलाफ़ कई मंत्रियों और नेताओं ने कलाकारों और निर्देशक संजय लीला भंसाली के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक बयान दिए. इसके बावजूद उन पर आपराधिक मामले दर्ज नहीं हुए.

दूसरी ओर तमिलनाडु में मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ कार्टून बनाने और मध्य प्रदेश में फ़ेसबुक पोस्ट लिखने पर पत्रकार पर मामला दर्ज हो गया. क्या इससे सरकारी तौर-तरीकों पर सवालिया निशान नहीं खड़े होते?

प्रधानमंत्री ने डिजिटल इंडिया में सबको इंटरनेट देने की मुहिम शुरू की है जिसके तहत नेट-न्यूट्रिलिटी की भी बात हो रही है. सुप्रीम कोर्ट की ओर से आईटी एक्ट की धारा 66-ए को निरस्त किए जाने के दो साल बाद सरकार अब सख़्त क़ानून लाने की तैयारी में है.

केंद्र सरकार ने 7 अगस्त 2017 को टेलीग्राफ एक्ट के तहत नोटिफ़िकेशन जारी करके इंटरनेट सेवाओं को बंद करने की प्रक्रिया और नियम बनाए हैं.

हरियाणा, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में सरकार की ओर से गैरक़ानूनी तरीक़े से इंटरनेट सेवाओं को बंद किया जाना जनता के मौलिक अधिकारों का हनन तो है ही, साथ ही डिजिटल इंडिया के लिए भी झटका है.

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गुंडा एक्ट और नेताओं पर मामले

उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव प्रचार के दौरान युवा कांग्रेस नेता राहुल राय के कथित समर्थकों के जुलूस निकाले जाने पर पुलिस ने धारा-144 के उल्लघंन के आरोप में एफ़आईआर दर्ज की थी.

सिर्फ़ उस मामले के आधार पर झांसी के सिटी मजिस्ट्रेट ने दिव्यांग राहुल राय पर गुंडा एक्ट के तहत नोटिस जारी करते हुए उनसे मुचलका भरने को कहा.

इसके उलट उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर दर्ज कई संगीन मामले वापस लिए जा रहे हैं.

समर्थकों के जुलूस निकालने पर अगर कोई नेता गुंडा मान लिया जाए और अगर ऐसे सख़्त मापदंड देश के सभी नेताओं पर लागू हो जाएं तो राजनीति के अपराधीकरण पर तुरंत लगाम लग जाएगी.

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विचाराधीन क़ैदियों का मामला

संविधान के अनुच्छेद-14 के अनुसार, सभी नागरिक समान हैं. उसके बावजूद क़ानूनों को मनमाफ़िक तरीक़े से लागू किया जाता है. जम्मू कश्मीर में राजनीतिक कारणों से पत्थरबाजों पर 4327 मामले सरकार ने वापस ले लिए.

देश की विभिन्न जेलों में बंद चार लाख कैदियों में 90 फ़ीसदी ग़रीब और लाचार हैं. उन पर राजनेताओं की ऐसी कृपा दृष्टि क्यों नहीं पड़ती?

बिजली की कुछ किलो तार चोरी करने वाले कई साल से जेल के भीतर हैं और दूसरी तरफ बैंकों का आठ लाख करोड़ हज़म करने वाले उद्योगपति सरकारी कार्यक्रमों की रौनक बढ़ाते हैं. पनामा पेपर्स लीक मामले ने पाकिस्तान की राजनीति को बदल दिया पर भारत में अब भी 'बकरों और गधों को ही जेल भेजा जा रहा' है.

'मजबूत लाठी वाले की भैंस' की व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए आज़ादी के बाद देश में संविधान के शासन की आधारशिला रखी गई थी. ऐसे में पुलिस द्वारा क़ानूनी डंडे का मनमौजी इस्तेमाल और अदालतों द्वारा क़ानून की मनमाफिक व्याख्या से प्रधानमंत्री मोदी के सपनों का न्यू इंडिया कैसे बनेगा?

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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