छत्तीसगढ़: ग्रीष्मकालीन धान बोने पर सरकारी रोक, नहीं मिलेगा बिजली-पानी

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धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में सरकार ने इस बार ग्रीष्मकालीन धान लगाने पर रोक लगा दी है.

सरकार ने पानी की कमी का हवाला देते हुये कहा है कि धान की फसल लगाने वाले किसानों को जलाशयों से पानी नहीं दिया जाएगा.

कई गांवों में मुनादी करवा दी गई है कि अगर किसी ने धान की फसल लगाई तो उसकी बिजली काट दी जायेगी.

छत्तीसगढ़ में 43 लाख किसान परिवार हैं और अधिकांश धान की खेती पर ही निर्भर हैं. राज्य सरकार समर्थन मूल्य पर धान खरीदती भी है और उस पर इस साल सरकार ने बोनस भी दिया है.

पिछले साल तक राज्य में किसानों ने लगभग पौने दो लाख हेक्टेयर क्षेत्र में रबी धान की बुआई की थी. लेकिन सरकार के ताज़ा फ़ैसले से किसान परेशान हैं.

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सूखे के हालात

इस साल कई ज़िलों में सूखे के हालात बने हुये हैं. बारिश नहीं हुई तो धान समेत खरीफ की दूसरी फसलें लगाई ही नहीं गईं. सूखे से परेशान किसानों को ग्रीष्मकालीन धान की खेती से बहुत उम्मीदें थी लेकिन पानी को लेकर सरकार के ताज़ा फैसले से किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है.

धमतरी के रामाधार देवांगन कहते हैं, "बरसात की धान में उपज भी कम होती है और कीड़ों का भी प्रकोप रहता है. लेकिन गरमी में धान की जो फसल तैयार होती है, उसमें कीड़े नहीं लगते, मौसम अनुकूल रहने से उसकी उपज दुगनी होती है. साल में दो बार धान उगाने वाले हम जैसों की तो कमर ही टूट जायेगी."

कृषि वैज्ञानिक डॉ. संकेत ठाकुर का कहना है कि सरकार ग्रीष्मकालीन धान पर तो रोक लगाने की बात कर रही है लेकिन किसान कुछ और लगायें, तो ना तो उसका कोई समर्थन मूल्य मिलता है और ना ही उस फसल का कोई बाज़ार विकसित किया गया है.

हालांकि कुछ कृषि वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि साल भर में दो बार धान की फसल लेने से खेत की उर्वरता प्रभावित होती है और छत्तीसगढ़ में अधिकांश किसानों द्वारा लगातार खेत में पानी भरकर धान उगाने से पानी का भी अतिरिक्त व्यय होता है. ऐसे में ग्रीष्मकालीन धान पर रोक लगनी ही चाहिये.

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'गांजा या अफीम की खेती नहीं करते'

लेकिन छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और विधायक भूपेश बघेल सरकार के फ़ैसले से बिफरे हुये हैं.

उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ में पहले ही किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं. ऐसे में सरकार का यह निर्णय किसानों को मौत के मुंह में धकेलने की तरह है.

भूपेश बघेल कहते हैं, "छत्तीसगढ़ के किसान गांजा या अफीम की खेती नहीं करते हैं कि उन्हें अब खेती के लिये भी अनुमति लेनी पड़े. धान उगाने पर भी सरकार अगर प्रतिबंध लगायेगी तो किसान जायेंगे कहां?"

दूसरी तरफ़ छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला का आरोप है कि सरकार औद्योगिक घरानों को तो हज़ार-हज़ार फीट गहरे बोरवेल करके भूजल दे रही है लेकिन किसानों के नाम पर सरकार को पानी की कमी का रोना आने लगता है.

आलोक कोरबा ज़िले के हसदेव बांगो बांध का उदाहरण देते हुये कहते हैं कि इस बांध में 3046 मिलियन घन मीटर पानी रहता है, जिसमें से सरकार का दावा है कि वह 84.63 प्रतिशत यानी 2,578 मिलियन घन मीटर पानी सिंचाई के लिये देती है. लेकिन पिछले कई सालों से सरकार ने रबी की धान के लिये इस बांध से पानी देने पर रोक लगा रखी है. इसके उलट उद्योगों को लगातार पानी दिया जाता है.

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'बिजली काटने की धमकी'

आलोक शुक्ला सरकार की नीतियों का हवाला देते हुये दावा करते हैं कि नीतिगत तौर पर पीने के पानी के बाद दूसरी प्राथमिकता खेती को दे गई है. तीसरे क्रम में खेती आधारित उपक्रम शामिल हैं. इस क्रम में उद्योग चौथे नंबर पर है.

आलोक कहते हैं, "उद्योग अगर सरकार की प्राथमिकता में पहले क्रम में आ जाये तो यह भयावह है. सरकार की इस उद्योग परस्ती के ख़िलाफ़ हम सड़कों पर उतरेंगे."

लेकिन राज्य के कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का दावा है कि गरमी में होने वाली धान की फसल पर रोक नहीं लगायी गयी है. उनका कहना है कि किसानों को धान के बजाये दूसरी फसलों को लगाने के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है.

अग्रवाल के अनुसार, "इस वर्ष पानी कम है. इसलिये किसान रबी में धान की फसल के बजाये दलहन-तिलहन की फसल, सब्ज़ी-भाजी की फसल लगायें. इससे जल स्तर को भी बनाये रखने में मदद मिलेगी."

हालांकि अग्रवाल के दावे के उलट रायगढ़ से लेकर धमतरी ज़िले तक, पानी की मांग करने वाले किसानों को कलेक्टरों ने दो टूक कह दिया है कि किसी भी क़ीमत पर धान के लिये पानी नहीं मिलेगा.

कोटवार गांवों में पानी नहीं देने की मुनादी कर रहे हैं और धान की फसल लगाने पर कृषि विभाग के अधिकारी बिजली काटने की धमकी देते घूम रहे हैं. इन सबके बीच सरकार को पानी पी-पीकर कोसते किसान फिलहाल सड़कों पर उतरने की तैयारी में है.

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