'कारसेवक तय करके आए थे कि उन्हें क्या करना है'

  • 3 दिसंबर 2017
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Image caption प्रेमशंकर दास

"छह दिसंबर की सुबह से ही या यों कहिए कि रात से ही विवादित परिसर के आस-पास सिर्फ़ कारसेवक और पुलिस वाले ही दिख रहे थे.

सुबह होते ही उत्साह से लबरेज कारसेवक सारी बैरीकेडिंग तोड़ते हुए अंदर पहुंच गए. जो जिधर से जगह पाया उधर से ही ढांचे के ऊपर चढ़ गया.

किसी के हाथ में कुछ था नहीं लेकिन उत्साह इतना प्रबल था कि ईंट-पत्थर जो मिला उसी से ढांचा तोड़ना शुरू कर दिया और देखते ही देखते सैकड़ों की संख्या में कारसेवक ढांचे के ऊपर चढ़ गए और कुछ घंटों के भीतर मस्जिद ध्वस्त कर दी गई."

अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 की घटना को बयान करते हुए 45 वर्षीय प्रेमशंकर दास इतने आवेश में आ जाते हैं, मानो वही विवादित ढांचा उनके सामने खड़ा हो, और वो उसे ध्वस्त करने को आतुर हों.

अयोध्या में जब कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद का विध्वंस किया था, प्रेमशंकर दास उस समय 21-22 साल के थे और वो भी उन हज़ारों कारसेवकों में शामिल थे जो कारसेवा के मक़सद से यानी विवादित ढांचे को ढहाने के लिए अयोध्या में जमा थे.

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बीबीसी से बातचीत में प्रेमशंकर दास कहते हैं, "उस वक़्त कारसेवकों का उत्साह इतना प्रबल था कि उसी ताक़त से सब कुछ हो सका. न तो किसी का निर्देश था, न किसी की योजना थी, न ही किसी ने कुछ समझाया कि आप लोग आए हैं तो कुछ करके जाइए और न ही किसी को इसका कोई श्रेय है. मस्जिद गिराने का केवल और केवल श्रेय कारसेवकों को है."

प्रेमशंकर दास कहते हैं कि जो भी नेता और साधु संत लोग थे, वो ते यही चाहते थे कि यहां प्रतीकात्मक कार सेवा करके कारसेवक लौट जाएं, लेकिन कारसेवक इस बार तय करके आए थे कि कुछ करके जाना है.

वो बताते हैं, "चार दिन पहले महंत नृत्यगोपाल दास जी के यहां से एक आदेश आया था कि सरयू नदी की रेत लाकर हम लोग यहां प्रतीकात्मक कार सेवा करेंगे, यानी उस बालू को रख देंगे जो बाद में मंदिर बनते समय ईंट जुड़ाई के काम आएगा.

लेकिन इस बात को लेकर कारसेवकों में बेहद नाराज़गी थी. कई कारसेवक मंत्रियों, नेताओं और यहां तक साधु संतों तक को गाली देने लगे कि हम लोगों को हर बार बुलाकर यही सब नौटंकी कराई जाती है. सच बताएं तो कारसेवक तय कर चुके थे कि इस बार उन्हें इन लोगों की बात नहीं माननी है."

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प्रेमशंकर दास बताते हैं कि दरअसल, लोगों की कल्पना से भी ज़्यादा कारसेवक अयोध्या में पहुंच चुके थे और मंच पर मौजूद नेताओं को ये आभास हो चुका था कि यदि अब उन्हें वापस लौटने को कहा गया या फिर उनकी इच्छा के विपरीत कोई फ़रमान दिया गया तो कारसेवक भड़क जाएंगे और फिर कुछ भी कर सकते हैं.

उनके मुताबिक, "मंच पर भाषण ख़त्म होने के बाद कारसेवकों को दूसरी ओर मुड़ने के लिए कहा गया था, लेकिन कारसेवक सीधे राम जन्मभूमि परिसर की ओर मुड़ गए. न तो कारसेवकों का कोई नेतृत्व कर रहा था और न ही उनसे कोई कुछ कह रहा था."

प्रेमशंकर दास कहते हैं कि उस समय सिर्फ़ साध्वी ऋतंभरा ने मंच से एक बात कही थी- 'जो कहा जाता है, वो किया नहीं जाता और जो किया जाता है, वो कहा नहीं जाता'.

प्रेमशंकर दास कहते हैं कि इसी को चाहे आदेश मान लीजिए या फिर कुछ और, लेकिन इसके अलावा और कारसेवकों को कुछ नहीं कहा गया था, आज भले ही कोई कुछ दावा करे.

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प्रेमशंकर दास बताते हैं कि मंच पर भाषण ख़त्म होने के बाद कारसेवकों का हुजूम जन्मभूमि परिसर की ओर बढ़ गया और फिर उन्होंने वो शुरू कर दिया, जो वो तय करके आए थे. वो बताते हैं कि ढांचे की ऊंचाई बहुत ज़्यादा थी नहीं और कारसेवकों का उत्साह चरम पर था, इसलिए कुछ पता ही नहीं चला कि कब हज़ारों कारसेवक ढांचे के ऊपर चढ़कर उसे तोड़ना शुरू कर दिए.

वो कहते हैं कि एक साधु तो पीएसी की बड़ी सी बस को ही अचानक स्टार्ट करके परिसर की ओर दौड़ा दिया, "बैरीकेडिंग तोड़ते हुए वो परिसर के अंदर दाख़िल हुआ और जितना कुछ नुक़सान कर सकता था किया. बाद में कारसेवकों ने ही उसे क़ाबू किया."

प्रेमशंकर दास के मुताबिक मुश्किल से तीन-चार घंटों के भीतर ढांचा गिरा दिया गया और शाम को तीन-चार बजे तक तो वहां मलबा तक नहीं दिख रहा था. वो बताते हैं, "गुंबद के ऊपर रस्सी फेंककर पहले तो लोग चढ़ गए और फिर रस्सी को गुंबद से बांधकर दोनों ओर से हज़ारों लोग खींचने लगे. वहीं नीचे खड़े लोग पूरी ताक़त से धक्का दे रहे थे और तोड-फोड़ कर रहे थे. कोई खिड़की तोड़ रहा था, कोई दरवाज़ा तोड़ रहा था. देखते ही देखते ढांचे का नामोनिशान मिट गया."

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प्रेमशंकर दास कहते हैं कि ढांचा गिरने के बाद तमाम लोग उन ईंटों को अपने साथ लेकर चले गए ताकि इस बात का प्रमाण रहे कि वो यहां आए थे, "हज़ारों कार सेवक जाते समय एक-एक ईंट तक उठा ले गए ताकि अपने गांव-घर जाकर दिखा सकें कि हमने कारसेवा में हिस्सा लिया है. पूरा मलबा तो इसी समें साफ़ हो गया."

प्रेमशंकर दास बताते हैं कि कार्यकर्ताओं का उत्साह इतना प्रबल था और संख्या इतनी ज़्यादा थी कि यदि कोई उन्हें वैसा करने से मना करता तो कारसेवक उसे भी मार देते. वो कहते हैं, "कारसेवक तय करके आए थे कि उन्हें क्या करना है. कोई उन्हें मना करता तो कारसेवक फिर ये न देखता कि कौन साधु है, धर्माचार्य है या फिर कुछ और. इसी डर के मारे किसी ने कारसेवकों को रोकने की कोशिश नहीं की और यही सोचकर रह गए कि शायद भगवान को यही मंज़ूर था."

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