जब यौन शिक्षा से जुड़ा एक केस हार गए थे आंबेडकर

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Image caption अदालती प्रसंग पर नाटक का मंचन

"अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" आज एक चर्चा और बहस का मुद्दा बन गया है. 1934 में भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी. तब डॉ. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने बतौर वकील एक ऐतिहासिक केस लड़ा था.

अदालत में आंबेडकर के व्यक्त किए गए विचार आज की तारीख़ में भी लागू होते हैं. यह "समाज स्वास्थ्य" नामक एक पत्रिका के लिए लड़ा गया मुक़दमा था.

20वीं सदी की शुरुआत में महाराष्ट्र के रघुनाथ धोंडो कर्वे अपनी पत्रिका "समाज स्वास्थ्य" के लिए रूढ़िवादियों के निशाने पर रहते थे. कर्वे अपनी पत्रिका में यौन शिक्षा, परिवार नियोजन, नग्नता, नैतिकता जैसे उन विषयों पर लिखा करते थे जिस पर भारतीय समाज में खुले तौर पर चर्चा नहीं हुआ करती थी.

स्वस्थ्य यौन जीवन और इसके लिए चिकित्सा सलाह पर केंद्रित उनकी पत्रिका में कर्वे ने इस संवेदनशील मुद्दे पर निडरता पूर्वक चर्चा की. वो तर्कसंगत और वैज्ञानिक बातें लिखते.

लोगों की आम ज़िंदगी पर अत्यधिक धार्मिक प्रभाव वाले समाज के रूढिवादियों को उनके लेख से बेहद चिढ़ थी. इस दौरान उनके कई दुश्मन बन गये. लेकिन कर्वे निराश नहीं हुए.

उन्होंने लिखने के साथ ही अपनी लड़ाई जारी रखी. तब भारत का राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व इतना मज़बूत नहीं था कि वो कर्वे का पक्ष लेता और उनके लेखन का समर्थन कर पाता.

ऐसे समय में बाबा साहेब आंबेडकर कर्वे के लिए मसीहा बन कर सामने आए और उनके लिए अदालत में वकालत की.

यह भारत के सामाजिक सुधारों के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण क़ानूनी लड़ाई में से एक है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लड़ा गया.

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मुसलमान क्यों नहीं बने थे अंबेडकर?

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व्यभिचार के प्रश्न

1931 में कर्वे को पहली बार पुणे में रूढिवादी समूह ने उनके एक लेख "व्यभिचार के प्रश्न" के लिए उन्हें अदालत में घसीटा.

उन्हें गिरफ़्तार किया गया और दोषी ठहराए जाने के बाद 100 रुपये जुर्माना भी लगाया गया.

जब कर्वे ने उच्च न्यायालय में अपील की, तो मामले की सुनवाई जज इंद्रप्रस्थ मेहता के सामने हुई और उनकी अपील ख़ारिज कर दी गयी.

तीन साल के भीतर ही फरवरी 1934 में कर्वे दोबारा गिरफ़्तार किए गए. इस बार "समाज स्वास्थ्य" के गुजराती संस्करण में पाठकों द्वारा निजी यौन जीवन के बारे में सवाल के जवाब रूढिवादियों को अच्छा नहीं लगा.

प्रश्न हस्तमैथुन और समलैंगिकता के विषय में थे जिसका कर्वे ने खुल कर उत्तर दिया था. तब समाज में इस तरह की बातें करना अश्लील और हानि पहुंचाने वाला माना जाता था.

लेकिन इस बार कर्वे अकेले नहीं थे. तब मुंबई के एक सधे हुए वकील बैरिस्टर बी आर आंबेडकर उच्च न्यायालय में उनके लिए लड़ने को तैयार थे.

तब तक महाड और नासिक सत्याग्रह के बाद आंबेडकर वंचितों के लिए लड़ने वाले राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे.

वो लंदन में गोलमेज सम्मेलन में आरक्षण की मांग और महात्मा गांधी के साथ प्रसिद्ध पुणे समझौता कर चुके थे.

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Image caption आर डी कार्वे

अंबेडकर ने कर्वे का केस क्यों लिया?

आंबेडकर अपने राजनीतिक और सामाजिक मिशन में पूरी तरह व्यस्त थे फिर भी उन्होंने कर्वे का केस क्यों लिया? और वो भी उस मसले पर जिसका समाज में अस्तित्व नहीं था और जिस पर तीखी प्रतिक्रिया का मिलता तो तय था. आख़िर उन्हें कर्वे का मामला अपने हाथ में लेने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?

मराठी नाटककार प्रोफ़ेसर अजीत दल्वी ने आंबेडकर के उसी कोर्ट केस पर आधारित एक नाटक "समाज स्वास्थ्य" बनाया है जिसका पूरे देश में मंचन किया जा रहा है.

प्रोफ़ेसर दल्वी कहते हैं, "आंबेडकर निश्चित तौर पर दलितों और वंचितों के नेता थे लेकिन वो पूरे समाज के लिए सोच रखते थे. सभी वर्गों से बना आधुनिक समाज उनका सपना था और वो उसी दिशा में आगे बढ़ रहे थे."

भीमराव आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर कहते हैं, "उन्होंने 1927 में मनुस्मृति क्यों जलायी, क्योंकि उनका मानना था कि ऐसी साहित्य व्यक्तिगत आज़ादी को दबा देती है. इसलिए जहां भी व्यक्तिगत आज़ादी के लिए संघर्ष चला बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर उसके पीछे खड़े हुए."

वो कहते हैं कि, "समाज स्वास्थ्य के मामले में हम देख सकते हैं कि यहां कट्टरपंथी ब्राह्मणवाद व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के ख़िलाफ़ खड़ा था. इसलिए उन्होंने इस केस को लिया."

आंबेडकर ने अपनी पूरी पढ़ाई और शोध यूरोप और अमरीका में की. इसलिए वो भारत में उदारवादी परंपराओं के साथ ही आधुनिक पश्चिमी उदारवादी विचारों से भी प्रभावित हुए.

कर्वे के लेखों में उनका तर्कवादी विचार आंबेडकर के लेखों और उनके कार्यों में भी साफ़ झलकता है. इसलिए जिस विषय पर बड़े से बड़े नेता बोलने में हिचकते आंबेडकर ने इसे आसानी से अपने हाथों में ले लिया.

"यौन मामलों पर लिखना अश्लीलता नहीं"

कर्वे ने पाठकों के वास्तविक संदेहों का केवल उत्तर दिया और सरकार ने रूढिवादियों को ख़ुश करने के लिए उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.

इससे आंबेडकर आश्चर्य में पड़ गये. अगर "समाज स्वास्थ्य" का विषय यौन शिक्षा और यौन संबंध है और आम पाठक उसके विषय में प्रश्न पूछता है तो उसका उत्तर क्यों नहीं दिया जाना चाहिए. यह अंबेडकर का सीधा सवाल था.

अगर कर्वे को इसका उत्तर नहीं देना दिया जाए तो इसका मतलब है पत्रिका को बंद कर दिया जाना चाहिए.

दल्वी कहते हैं, "आंबेडकर के लिए, कर्वे को समाज की तथाकथित नैतिक मान्यताओं के अनुसार जवाब देने के लिए बाध्य किया जाना भी अन्याय है."

मामले में फिर 28 फरवरी से 24 अप्रैल 1934 के बीच बॉम्बे हाई कोर्ट में न्यामूर्ति मेहता के सामने दलील रखी गयी. कर्वे के ख़िलाफ़ मुख्य आरोप यौन मुद्दों पर सवालों के जवाब देकर अश्लीलता फ़ैलाना था.

प्रोफ़ेसर दल्वी बताते हैं, "आंबेडकर का पहला तर्क यह था कि अगर कोई यौन मामलों पर लिखता है तो इसे अश्लील नहीं कहा जा सकता. हर यौन विषय को अश्लील बताने की आदत को छोड़ दिया जाना चाहिए. इस मामले में हम केवल कर्वे के जवाबों पर नहीं सोच कर सामूहिक रूप से इस पर विचार करने की जरूरत है. हमारे राजनीतिक नेता आज भी इस तरह के मुद्दों पर कुछ नहीं कहना चाहते वहीं आंबेडकर इस पर 80 साल पहले ही इस पर निर्णायक स्थिति में थे."

दल्वी कहते हैं, "न्यायाधीश ने उनसे पूछा कि हमें इस तरह के विकृत प्रश्नों को छापने की आवश्यकता क्यों है और यदि इस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं तो उनके जवाब ही क्यों दिये जाते हैं? इस पर आंबेडकर ने कहा कि विकृति केवल ज्ञान से ही हार सकती है. इसके अलावा इसे और कैसे हटाया जा सकता है? इसलिए कर्वे को सभी सवालों को जवाब देने चाहिए थे."

यौन शिक्षा का अधिकार

आंबेडकर ने अदालत में इस विषय पर आधुनिक समाज में उपलब्ध साहित्य और शोध का उल्लेख भी किया.

उन्होंने समलैंगिकों पर हेवलॉक एलिस के शोध को भी अदालत में पेश किया. उनका मानना था कि यदि लोगों में इस तरह की भी इच्छा होती है तो इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. उन्हें अपने तरीक़े से खुशी हासिल करने का अधिकार है.

प्रोफ़ेसर दल्वी कहते हैं, "उस दौर में जब कोई भी यौन संबंधों पर खुल कर नहीं बोलता था, समलैंगिकता पर आंबेडकर के विचार मेरे लिए क्रांतिकारी हैं."

आंबेडकर दो अधिकारों पर बिल्कुल दृढ़ थे. एक यौन शिक्षा का अधिकार. वो इसके ख़िलाफ़ किसी धार्मिक रूढ़िवादी विचार को नहीं आने देना चाहते थे. ये पारंपरिक बाधाएं थीं.

प्रकाश आंबेडकर कहते हैं, "जैसा कि मैं देख रहा हूं, भारतीय समाज में कामुकता का प्रश्न वैदिक परंपराओं से संबंधित है. समाज के कुछ वर्ग उदार विचारों के रास्ते चलने को तैयार थे. लेकिन वैदिक परंपराओं को मानने वाला उच्च वर्ग रूढ़िवादी विचारों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था. बाबा साहेब इस परंपरागत धारणा के ख़िलाफ़ थे."

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आंबेडकर के तर्क आज भी प्रभावी

दल्वी कहते हैं, "बाबा आंबेडकर की स्थिति केवल अदालत में तर्कों तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि यह उनके राजनीतिक कामों में भी दिखा. कर्वे ने अपने लेखन के माध्यम से परिवार नियोजन की जरूरत पर जोर दिया और आंबेडकर ने एक सांसद के रूप में इसे क्रियान्वित किया. आंबेडकर 1937 में तत्कालीन बंबई क्षेत्रीय सभा में परिवार नियोजन पर एक बिल लाये. इस विषय पर उनका विस्तृत भाषण उपलब्ध है."

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वो दूसरा अधिकार था जिसके लिए वो लड़े. वो इस बात से सहमत नहीं थे कि यदि समाज का कोई वर्ग किसी खास विषय पर कोई बात नहीं सुनना चाहता या पसंद नहीं करता है तो किसी और को ऐसा करने की अनुमति नहीं है. उदारवादी रवैया अपनाते हुए उन्होंने दृढ़ता से कहा था कि जब हम सभी मुद्दों पर खुल कर बहस और चर्चा करेंगे तभी समाज से विकृतियां जायेंगी, ज्ञान ही इसका एकमात्र जरिया है.

प्रोफ़ेसर दल्वी अंत में कहते हैं, "क्या आज हमारे समाज में "समाज स्वास्थ्य" जैसी कोई पत्रिका उपलब्ध है. बीते युग में बड़े बड़े नेताओं ने कामुकता को छोड़ कर कई विषयों पर खुल कर बातें की. बहुत कम लोग इस पर बातें करने की हिम्मत रखते हैं. मुझे ऐसा लगता है कि आज भी इसकी ज़रूरत है."

आर डी कर्वे और डॉक्टर बी आर आंबेडकर 1934 की वो लड़ाई अदालत में हार गये. अश्लीलता के लिए कर्वे पर एक बार फिर 200 रुपये का जुर्माना लगाया गया. लेकिन ऐसी लड़ाईयां वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करती हैं और उनका प्रभाव परिणाम से परे है.

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