ग्राउंड रिपोर्ट: 'अफ़राजुल की ग़लती थी कि वो मज़दूर थे, मजबूर थे, मुसलमान थे'

  • दिलनवाज़ पाशा
  • बीबीसी संवाददाता राजसमंद, राजस्थान से
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मालदा के अफ़राजुल एक दशक से ज़्यादा समय से राजसमंद में मज़दूरी करते थे

मिट्टी का बड़ा चूल्हा जिस पर बड़े बर्तन में खाना पकाया जाता था ठंडा पड़ा है. उसके पीछे बजरी पर रखे फावड़े वहीं हैं जहां उन्हें रख छोड़ा गया था.

बिना बरामदे के कमरे में चारपाई पड़ी है जिस पर हिसाब की कॉपी वहीं पड़ी हैं जहां हिसाब लगाने वाला छोड़ गया था. बाट में रखी रकाबी में रखीं दो मोटी रोटियां खाए जाने का इंतज़ार कर रही हैं.

एक पुरानी मेज़ पर पुराना टीवी बंद है. बगल में एक बड़ा भगोना और बड़ी कड़ाही आलुओं के बोरे के साथ रखे हैं जो बताते हैं कि इस जगह कई लोगों का खाना एक साथ बनता था.

कमरे के बाहर दर्जनों जूते चप्पल हैं जिन्हें पहनने वाले जल्दबाज़ी में यहीं छोड़ गए हैं.

खौफ़ से वापस बंगाल लौट रहे मज़दूर

ये पश्चिम बंगाल के मालदा ज़िले के सैयदपुर कलियाचक गांव से आकर राजस्थान के राजसमंद में रह रहे 50 वर्षीय प्रवासी मज़दूर अफ़राजुल का कमरा है जो अब खाली पड़ा है.

अफ़राजुल अपने भांजे इनामुल, दामाद मुशर्रफ़ शेख और कई बंगाली मज़दूरों के साथ यहां रहते थे.

अफ़राजुल की मौत का वीडियो आपने अब तक देख लिया होगा और उनकी बेबस चीखों को भी सुन लिया होगा.

उन्हीं चीखों से पैदा हुए ख़ौफ़ के साये में उनके साथ रहने वाले मज़दूर वापस पश्चिम बंगाल चले गए हैं. जो नहीं गए वो अब शहर के दूसरे इलाक़े में रह रहे हैं.

मकान के मालिक पंडित खेमराज पालीवाल की आंखें ग़म में डूबी है. वो बस इतना ही कह पाते हैं कि इतने नेक आदमी के साथ इतना बुरा नहीं होना चाहिए था.

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अफ़राजुल के मकानमालिक पंडित खेमराज(बाएं) और उनके साथी बरकत अली (दाएं)

'नेक और साफ़ दिल थे अफ़राजुल'

ऑटो चालक रामलाल पिछले नौ-दस सालों से अफ़राजुल और उनके साथी मज़दूरों को काम की जगह तक पहुंचाते थे.

रामलाल कहते हैं कि वो बेहद नेक और साफ़ दिल इंसान थे. उन्हें चाय पीना अच्छा लगता था और वो मुझे भी हमेशा चाय पिलाया करते थे.

रामलाल की इतनी हिम्मत नहीं हुई है कि अफ़राजुल की मौत का वीडियो देख सकें. वो उन्हें याद कर सुबकने लगते हैं.

अफ़राजुल करीब बारह-तेरह साल पहले पश्चिम बंगाल से राजसमंद आए थे और मज़दूरी शुरू की थी.

इन तेरह सालों में वो मज़दूर से ठेकेदार बन गए थे और सड़कें बनाने लगे थे. दरअसल वो दूसरे ठेकेदारों का काम कम मज़दूरी पर करवा देते थे.

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जब से अफ़राजुल की हत्या हुई, किसी को खाने की सुध नहीं

कुछ दिन पहले खुलवाया था बैंक खाता

उन्होंने एक मोटरसाइकिल ख़रीद ली थी जिसके नंबर के आख़िर में 786 है और हाल ही में उन्होंने बीस हज़ार रुपए का एक स्मार्टफ़ोन ख़रीदा था जो उनके साथ ही जल गया है.

कुछ दिन पहले उन्होंने बैंक खाता भी खुलवाया था जिसका एटीआम कार्ड अभी भी उस लिफ़ाफ़े में रखा है जिसमें वो आया था.

तीन बेटियों के पिता अफ़राजुल की दो बेटियों की शादी हो चुकी है और बड़े दामाद मुशर्रफ़ शेख उन्हीं के साथ रहते थे.

मुशर्रफ़ शेख अफ़राजुल के आख़िरी दिन को याद करते हुए बताते हैं, "मंगल के रोज़ बारिश हुई तो हमने काम आधे दिन में ही बंद कर दिया. बुध को भी हल्की बारिश हो रही थी और हमने काम शुरू नहीं किया. दो मज़दूरों ने खाना बनाया और हम सबने खाया"

"वो चाय पीने का कहकर बाहर निकले थे. करीब साढ़े दस बजे फ़ोन करके उन्होंने कहा कि मज़दूरों का हिसाब करके पैसा दे देना, मैं थोड़ी देर में लौटूंगा."

"उन्होंने फिर करीब साढ़े 11 बजे फ़ोन किया और कहा कि दिन भर सोते ही रहोगे तो मजदूरों का पैसा कब दोगे. इसके बाद मेरी उनसे कोई बात नहीं हुई. उन्होंने कहा था कि मैं दस मिनट में आ जाउंगा लेकिन वो नहीं आए और मैं सोता ही रहा."

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अफ़राजुल का कमरा

डर दिल में घर कर गया

दोपहर में मुशर्रफ़ के एक जानने वाले ने फ़ोन करके उन्हें बताया कि अफ़राजुल का एक्सीडेंट हो गया है. मुशर्रफ़ को लग रहा था कि मोटरसाइकिल टकरा गई होगी.

लेकिन जब वो मौके पर पहुंचे तो उनके होश उड़ गए. वो कहते हैं, "उन्हें देखते ही मुझे रोना आ गया. कुछ समझ नहीं आया. ऐसा लगा कि मैं भी मर गया हूं. मैं वहीं सर पकड़कर रोने लगा."

मुशर्रफ़ ने जबसे अफ़राजुल की मौत का वीडियो देखा है वो कुछ खा नहीं सके हैं. डर उनके भीतर इस हद तक बैठ गया है कि मकान मालिक के भरोसे के बावजूद वो अब अपने कमरे में ताला लगाकर दूसरे इलाक़े में अन्य मज़दूरों के साथ रह रहे हैं.

अफ़राजुल के भांजे इनामुल कहते हैं, "हम मजदूर हैं, पेट भरने के लिए यहां आए थे. बमुश्किल 8-10 हज़ार रुपए कमा पाते हैं. भारत के लोग भारत में कहीं भी जाकर काम कर सकते हैं, लेकिन अगर सरकार ऐसी घटनाओं को नहीं रोकेगी तो लोग कैसे काम करने के लिए बाहर निकलेंगे?"

वो कहते हैं, "भूखे पेट की वजह से ही तो हम घर से इतनी दूर हड्डियां तोड़ रहे हैं. हम काम करते हैं, औरों से बेहतर और तेज़ काम करते हैं, सस्ते में काम करते हैं तब ही तो हमें काम मिलता है. अगर हमें सुरक्षा नहीं मिलेगी तो कैसे काम करेंगे?"

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अफ़राजुल के भांजे इनामुल

'हम कमज़ोर हैं, क्या बदला लेंगे'

जब उनसे पूछा कि वीडियो देखकर किस तरह के भाव उभरे तो उन्होंने कहा, "हमने बस बेबसी महसूस की. हम क्या बदला लेंगे. हम कमज़ोर हैं हमारा बदला लेने की ज़िम्मेदारी तो सरकार की है. सरकार हत्यारे को फांसी चढ़ाए तब ही हम महसूस करेंगे कि हम सुरक्षित है. अगर हत्यारे को ज़मानत हो गई तो हम कुछ भी नहीं कर पाएंगे. वापस लौट जाएंगे."

बरकत अली मालदा में अफ़राजुल के गांव के पास ही रहते हैं और उनके साथ ही काम करने राजसमंद आए थे. अफ़राजुल की मौत का वीडियो देखकर उनकीं आंखों में आंसू आ जाते हैं.

वो कहते हैं, "वो रहम की गुहार लगा रहे हैं लेकिन क़ातिल के दिल में कोई रहम नहीं आ रहा. ये वीडियो देखकर हम रातों को सो नहीं पा रहे हैं. कोई किसी के साथ बेवजह इतना बुरा कैसे कर सकता है?"

अफ़राजुल को क्यों मारा गया इसकी वजह मुशर्रफ़, इनामुल और बरकत अली की समझ से परे हैं. 'लव जिहाद' जैसा शब्द उनके लिए नया है.

बरकत अली कहते हैं, "दो वक़्त की रोटी के लिए हज़ारों किलोमीटर दूर आकर पसीना सुखा रहा आदमी क्या लव करेगा और क्या जिहाद करेगा. हम तो भूख से आगे सोच ही नहीं पाते हैं."

क्या अफ़राजुल के कभी किसी महिला से रिश्ते थे इस सवाल पर वो कहते हैं कि ऐसा सोचना भी गुनाह है.

तो फिर अफ़राजुल को मारे जाने की क्या वजह रही होगी, बरकत अली कहते हैं, "उसे किसी को मारना था, अफ़राजुल मिल गए तो उन्हें मार दिया. मैं मिल जाता तो मुझे मार देता."

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इसी जगह हुई थी अफ़राजुल की हत्या

राजसमंद के मेहता मंगरी इलाक़े में जहां अफ़राजुल रहते थे वहीं कुछ युवा कह रहे थे कि अगर उसकी ग़लती थी तो शंभूलाल को पुलिस से शिकायत करनी चाहिए थी.

एक स्थानीय युवा ने कहा, "मान लिया कि उन्होंने कुछ ग़लत भी किया था तो इस तरह मारने का अधिकार किसने दिया. पुलिस है प्रशासन है उनसे कहो."

खेमराज पालीवाल की बीए कर रही बेटी भी यही दोहराते हुए कहती हैं, "अगर कोई कुछ ग़लत करता भी है तो उसके लिए पुलिस है, क़ानून है. क़ानून अपने हाथ में लेने की क्या ज़रूरत है?"

लेकिन अफ़राजुल की ग़लती क्या थी? इनामुल कहते हैं, "यही की वो मज़दूर थे, मजबूर थे, मुसलमान थे."

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