मोदी के 'गुजरात मॉडल' का सच क्या है?

  • 11 दिसंबर 2017
गुजरात मॉडल इमेज कॉपीरइट SAM PANTHAKY/AFP/Getty Images

क्या मोदी का 'गुजरात मॉडल' डॉक्टर का लिखा वो पर्चा है जिस पर लिखी दवाई को खाने से मरीज़ प्रगति के पथ पर सरपट भागने लगता है?

भारतीय जनता पार्टी की वेबसाइट 'बीजेपी डॉट ओआरजी' पर एक पीडीएफ फाइल है जिस पर लिखा है कि 'गुजरात मॉडल' एक विज़न है जिसका इंतज़ार देश कर रहा है. इस फाइल को लोकसभा चुनाव के लिए बनाया गया था. फाइल के कवर पर ही एक नारा है- 'वोट फोर इंडिया, वोट फोर मोदी.'

फाइल में बताया गया है कि गुजरात मॉडल का मतलब है- भरपूर नौकरी, कम मंहगाई, ज़्यादा कमाई, तीव्र गति से अर्थव्यवस्था का विकास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, दुरुस्त सुरक्षा और बेहतरीन जीवन.

2014 में भारत का यह इंतज़ार ख़त्म हुआ और गुजरात मॉडल की वकालत वाले नरेंद्र मोदी के हाथों में देश की कमान है. इसी मॉडल की परीक्षा एक बार फिर से गुजरात में हो रही है.

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गुजरात का समुद्री तट

मोदी के गुजरात मॉडल में कितना फैक्ट है और कितना फिक्शन इसकी तहक़ीक़ात केवल चुनावों में मिलने वाली हार-जीत से केवल नहीं की जा सकती. हम इसकी छानबीन उन तथ्यों और ज़मीनी हक़ीक़त के आधार पर करेंगे जिनके होने का दावा इस मॉडल में बीजेपी ने किया है.

भारत की आबादी की महज़ पांच फ़ीसदी आबादी गुजरात में है और उसके हिस्से 6 फ़ीसदी क्षेत्रफल है. इसके साथ ही 7.6 फ़ीसदी जीडीपी है. भारत के कुल श्रम बल का दसवां हिस्सा गुजरात का है और कुल निर्यात का 22 फ़ीसदी गुजरात से होता है.

यहां की जलवायु और भौगोलिक स्थिति भी व्यापार के अनुकूल है. हालांकि बारिश नहीं होने के कारण यहां खेती करना आसान नहीं है. लंबी तटरेखा के कारण यहां से अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी काफ़ी सुगम है. आज की तारीख़ में भारत के एक तिहाई समुद्री जहाज गुजरात के समुद्री तट से होकर गुजरते हैं.

ज़ाहिर है गुजरात की प्राकृतिक और भौगोलिक ख़ासियत का श्रेय मोदी नहीं ले सकते. गुजरात की सालाना जीडीपी वृद्धि दर 2001 से 2012 तक औसत 10 फ़ीसदी रही है. ज़ाहिर है यह भारत की वृद्धि दर से ज़्यादा है. हालांकि भारत के अन्य निर्यातक राज्य महाराष्ट्र और तमिलनाडु भी अच्छा कर रहे हैं.

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मोदी का शासन

गुजरात 2002 से सरप्लस बिजली का उत्पादन कर रहा है. ऐसा तब है जब बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है. 18 हज़ार गांवों को ग्रिड से जोड़ा गया है. गुजरात के बारे में यह भी कहा जाता है कि यहां की नीतियां व्यावसायिक प्रगति में बाधा नहीं बनती हैं.

साल 2008 में टाटा मोटर्स की नैनो कार प्लांट को पश्चिम बंगाल से गुजरात के साणंद में शिफ्ट किया गया था. पश्चिम बंगाल की सरकार ज़मीन को लेकर जारी विरोध-प्रदर्शन से नहीं निपट पाई थी. अब गुजरात में फोर्ड ने भी अपना प्लांट शुरू किया है.

इस साल भारत को पहली बार व्यापार सुगमता के मामले में विश्व बैंक ने टॉप 100 में रखा है. पर गुजरात पहले से ही इस मामले में आगे है. यहां परमिट, लाइसेंस और पर्यावरण से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी कराने में क़ानूनी पेंच को आड़े नहीं आने दिया जाता है.

हालांकि यह मोदी के शासन से पहले से ही होता रहा है. अपोलो ने गुजरात में 1990 में ही टायर का एक बड़ा प्लांट लगाया था. गुजरात में तब भी बिना माथा खपाए प्लांटों को लगाने में नौकरशाही को आड़े नहीं आने दिया जाता था.

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बड़े आर्थिक सुधार

मोदी के सुशासन के उस पक्ष का ज़िक्र अक्सर किया जाता है कि उन्होंने ई-गवर्नेंस को प्रभावी तरीक़े से लागू किया. ई-गवर्नेंस के कारण प्रदेश में भ्रष्टाचार में कमी आने की बात भी कही जाती है.

क्या मोदी का गुजरात मॉडल कोई क्रांतिकारी आर्थिक सुधार है? अर्थशास्त्री विवेक देहेजिया ने द इकोनॉमिस्ट से कहा था कि गुजरात मॉडल गुड गवर्नेंस को लेकर एकवैचारिक निष्पक्षता का मामला है न कि 1980 के दशक में अमरीका और ब्रिटेन में हुए बड़े आर्थिक सुधारों की तरह है.

कोई भी सरकार के सुशासन के आकलन के कई पक्ष होते हैं. पहला और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि सरकार समाजिक-आर्थिक मोर्चे पर अपने अधिकार-क्षेत्र में कैसे और किस लक्ष्य के लिए काम कर रही है. इसी से सरकार के काम की दिशा भी पता चलती है.

गुजरात सरकार को पिछले कई सालों सुशासन के लिए मीडिया और कॉर्पोरेट घरानों से अवॉर्ड मिले. एक सवाल उठता है कि सुशासन यानी गुड गवर्नेंस का मतलब कुछ ख़ास सेक्टरों में बेहतरी से होता है या राज्य के सभी नागरिकों के लिए समान मौक़े और बुनियादी सुविधाओं से है.

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गुजरात में सरकारें और सुशासन

अगर 1976 से 1980 तक जनता मोर्चा और 1989-90 में बीजेपी-जनता पार्टी की गठबंधन सरकार को छोड़ दें तो गुजरात में 1952 (1960 से पहले यह बॉम्बे का हिस्सा था) से 1995 तक कांग्रेस का शासन रहा. इसके बाद से गुजरात में बीजेपी का शासन है.

ऑक्सफर्ड से आई किताब 'ग्रोथ और डेवलपमेंट व्हिच वे इज गुजरात गोइंग' में मोदी के गुजरात मॉडल की समीक्षा की गई है. किताब के एक चैप्टर गवर्नेंस ऑफ गुजरात के मुताबिक कुल मिलाकर देखें तो आर्थिक वृद्धि को लेकर नीति एक जैसी रही है चाहे जिसकी भी सरकार रही हो.

इस चैप्टर के लेखक अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर घनश्याम शाह हैं. घनश्याम शाह ने लिखा है कि जब बॉम्बे स्टेट से गुजरात अलग हुआ तब भी औद्योगिक विकास के मामले में गुजरात की रैंकिंग आठवें नंबर पर थी.

उस वक़्त की सरकार के लिए यह पहला काम था राजधानी बॉम्बे के आकर्षण को अपनी ज़मीन पर लाए. यहां की शुरुआती सरकारों ने ही निजी निवेशों को आकर्षित करने के अलावा संयुक्त निवेश कंपनियों में साझा निजी निवेश को भी प्राथमिकता दी.

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नेता गंभीर थे...

साल 1962 की शुरुआत में ही राज्य सरकार ने गुजरात स्टेट फर्टिलाइजर एंड केमिकल लिमिटेड की स्थापना की. इसके बाद 1969 में गुजरात एग्रो इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन बनाया गया. 1976 में गुजरात नर्मदा वैली फर्टिलाइजर्स कंपनी बनी. 1979 में गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन की स्थापना की गई.

यानी शुरू से ही गुजरात के नेता इस बात को लेकर गंभीर थे कि निजी सेक्टरों की तरह सार्वजनिक उद्यमों को भी प्रभावी होना चाहिए. गुजरात में न तो नेताओं ने और न ही नौकरशाहों ने कॉर्पोरेशनों के संचालन में बाधा नहीं डाली और यह परंपरा कभी थमी नहीं.

गुजरात में शुरुआती सरकारों ने ही गठन के बाद से ही बॉम्बे स्टेट के तरीक़ों को अपनाते हुए कई संस्थाओं का निर्माण किया. द गुजरात इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन, द गुजरात इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन, द गुजरात इंडस्ट्रियल फाइनैंशल कॉर्पोरेशन और गुजरात स्टेट फाइनैंश कॉर्पोरेशन की स्थापना तो 1960 के दशक में ही कर दी गई थी.

ये संस्थाएं इंडस्ट्री को प्रोत्साहित करने के लिए पूंजी, सब्सिडी, टैक्स में छूट, ज़मीन, पानी, बिजली और सड़क मुहैया कराती थीं. ज़िला स्तर पर उद्योग-धंधों को बढ़ावा देने के लिए डिस्ट्रिक्ट स्टेट सेंटर की स्थापना की गई थी.

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क्रांतिकारी क़दम

1965 की शुरुआत में ही निर्यात को बढ़ावा देने के लिए गुजरात एक्सपोर्ट कॉर्पोरेशन बनाया गया था. 1977 में इंडस्ट्रियल एक्सटेंशन ब्यूरो की स्थापना की गई थी. इसकी स्थापना को एक क्रांतिकारी क़दम माना जाता है. इसकी स्थापाना उद्योग धंधों में नौकरशाही जटिलता को ख़त्म करने के लिए किया गया था.

गुजरात ने पूंजी आकर्षित करने के लिए न केवल दिल्ली में अपना दफ़्तर खोला बल्कि मुंबई, चेन्नै, कोलकाता और दक्षिण अफ़्रीका में भी अपने कार्यालय स्थापित किए. इन कार्यालयों के ज़रिए उद्योग मंत्रालयों के अधिकारियों से निजी संपर्क स्थापित किए गए.

इन संपर्कों से उन निवेशकों के आवेदनों के देखा जाता था जो निवेश के लिए लाइसेंस चाहते थे. मतलब यह कि गुजरात को इस तरह के आकार देने में पूर्ववर्ती सरकारों की ठोस भूमिका रही है.

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आंकड़ों की कसौटी पर गुजरात का सच

आर्थिक सर्वे के अनुसार 1995 से 2005 के बीच गुजरात में रोजगार वृद्धि दर 2.6 फ़ीसदी रही जबकि हरियाणा में यह दर 36.7 फ़ीसदी थी. यह वृद्धि दर कर्नाटक में 29.8 फ़ीसदी, आंध्र प्रदेश में 27.7 फ़ीसदी और 24.9 फ़ीसदी तमिलनाडु में रही.

दूसरी तरफ़ फैक्ट्री में मिलने वाले रोजगारों में भी कमी आई है. 1960-61 में गुजरात में प्रति फैक्ट्री 99 लोगों को रोजगार मिलता था जो 2005 में यह संख्या घटकर 59.44 हो गई. जबकि इन फैकट्रियों में औसत पूंजी निवेश ढाई गुनी बढ़ी है. इस तथ्य को ख़ुद गुजरात सरकार ने भी स्वीकार किया है.

स्वास्थ्य पर अपनी जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय का जितना हिस्सा गुजरात में खर्च किया जाता है उस मामले में यह आठवें नंबर पर है. 2011 की जनगणना के अनुसार 2001 से 2011 तक भारत के लिंगानुपात में सुधार हुआ जबकि गुजरात में गिरावट आई.

इस दौरान भारत का लिंगानुपात 933 महिलाओं पर 1000 पुरुष से 1000 पुरुष पर 943 महिलाएं हो गईं. वहीं गुजरात में 922 से 119 हो गया. 2000 के दशक में गुजरात की वार्षिक कृषि वृद्धि दर 9.8 फ़ीसदी रही जो देश भर में शीर्ष स्थान पर थी. यह वृद्धि दर 90 के दशक में महज दो फ़ीसदी थी.

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विकास की प्राथमिकता

इस दौरान केरल में कृषि वृद्धि दर शून्य रहा जबकि 1990 के दशक में 1.3 फ़ीसदी थी. वहीं 2000 के दशक में ही उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की कृषि वृद्धि दर तीन फ़ीसदी से भी कम दर्ज़ की गई.

हालांकि कई विशेषज्ञों का कहना है कि गुजरात में कृषि वृद्धि दर नक़दी फसल आधारित कीमत और उत्पादकता के कारण थी, जिसका फ़ायदा छोटे किसानों और खेतों में मजदूरी करने वालों को नहीं मिला.

मोदी के गुजरात मॉडल के बारे में कहा जाता है कि सरकार फ़ैसले लेने में देरी नहीं करती है. हालांकि आलोचकों का कहना है कि सरकार यह कभी नहीं बताती है कि फ़ैसले कितने पारदर्शी और समावेशी हैं.

सूरत में सेंटर फोर सोशल साइंस स्टडी सेंटर में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर किरण देसाई कहते हैं कि निजी निवेशक न केवल निवेश करते हैं बल्कि विकास की प्राथमिकता भी तय करते हैं. उनका कहना है कि इसका सीधा असर उत्पादनों के वितरण पर पड़ता है.

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नेशनल सैंपल सर्वे

किरण देसाई कहते हैं कि गुजरात में निवेश और रोजगार पैदा होने के बीच कोई संबंध नहीं है. देसाई के मुताबिक गुजरात में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिए प्रति व्यक्ति मिलने वाले सामानों में भारी गिरावट आई है.

नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार 2011-12 में औसत वास्तविक मजदूरी राष्ट्रीय औसत वास्तविक मजदूरी से भी कम थी. 2002 में सांप्रदायिक दंगों के बाद मोदी ने 2003 में मोदी ने वाइब्रेंट गुजरात शुरू किया. 2003 में इसमें केवल 500 लोग आए थे जबकि 2017 के इस चार दिवसीय सम्मेलन में 55 हज़ार लोग आए.

इस समिट एमओयू पर ख़ूब हस्ताक्षर किए जाते हैं लेकिन निवेश की राशि कभी सार्वजनिक नहीं की जाती है. पुरुषों की औसत मजदूरी दर के मामले में गुजरात 2005-06 में नौवें नंबर पर था जो 2009-10 में 18वें नंबर पर पहुंच गया जबकि महिलाओं के मामले में 2005-06 से ही सातवें नंबर पर है. इसमें हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड अव्वल हैं.

गुजरात में 79.31 फ़ीसदी लोग साक्षर हैं और इसके साथ ही गुजरात साक्षरता के मामले में देश में 18वें नंबर पर है. दिलचस्प है कि 2001 में गुजरात 16वें नंबर पर था और 2012 में और बुरी स्थिति हो गई. गुजरात महिलाओं के कुपोषण मामले में भारत के अन्य राज्यों से आगे हैं. वॉल स्ट्रीट जनरल ने इसी से जुड़ा सवाल मोदी से पूछा था.

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भारत सरकार

सितंबर 2012 में मोदी ने वॉल स्ट्रीट जनरल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि यहां कुपोषण इसलिए है क्योंकि गुजराती शाकाहारी होते हैं और मध्य वर्ग सेहत से ज़्यादा अपने लुक्स और वेट को लेकर चिंतित रहता है. मोदी के इस तर्क की तब कड़ी आलोचना भी हुई थी.

भारत के दूसरे मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट के अनुसार इस मोर्चे गुजरात नौंवे नंबर पर है जबकि केरल, दिल्ली, हिमाचल और पंजाब क्रमशः अव्वल हैं. राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़े के मुताबिक 2016 में दलितों के प्रति अपराध दर 32.5 थी जबकि राष्ट्रीय अपराध दर 20.4 थी.

इन अपराधों के ख़िलाफ़ गुजरात में कार्रवाई दर 4.7 थी जबकि राष्ट्रीय स्तर पर 27 फ़ीसदी रही. इन आंकड़ों को दिखाते हुए मैंने बीजेपी के गुजरात प्रवक्ता भरत पंड्या से पूछा तो उन्होंने भारत सरकार के ही आंकड़ों का ख़ारिज कर दिया.

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