नज़रिया: सबसे पुरानी पार्टी को पुनर्जीवित कर पाएंगे राहुल गांधी?

  • 12 दिसंबर 2017
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132 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के लिए राहुल गांधी की ताजपोशी उस समय हो रही है जब यह पार्टी ख़ुद प्रासंगिक बने रहने को लेकर जूझ रही है.

राहुल गांधी का अध्यक्ष बनना तय था क्योंकि उनके ख़िलाफ़ कोई और दावेदार था भी नहीं.

2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 20 फ़ीसदी से भी कम वोट मिले और उसने 543 सीटों में से केवल 8 फ़ीसदी या कहें 44 सीटें ही जीतीं.

उसके बाद कांग्रेस ने आधा दर्जन विधानसभाओं के चुनाव हारे. केवल कर्नाटक और पंजाब जैसे राज्य में ही वह काबिज़ है.

2009 से 2014 के बीच शहरी और ग्रामीण दोनों मतदाताओं ने पार्टी का साथ छोड़ा और कांग्रेस ने अपने 9 फ़ीसदी से अधिक वोट खो दिए.

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राहुल गांधी के पक्ष में क्या और चुनौतियां कैसी?

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अविश्वसनीय असफलता

राजनीतिक विश्लेषक सुहस पालशिकर कहते हैं, "यह एक ऐसी पार्टी है जो अपने ख़ुद के सामाजिक निर्वाचन क्षेत्र से वंचित है."

कांग्रेस पार्टी ने अब तक वापसी की कोशिशें करते हुए असफलता की अविश्वसनीय मिसाल कायम की है.

तमिलनाडु में कांग्रेस आख़िरी बार 1962 में जीती थी तो वहीं पश्चिम बंगाल में वह 1977 से सत्ता में नहीं है. यह तो केवल असाधारण उदाहरण हैं. लेकिन कांग्रेस हाल में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में चुनाव हारी है.

47 साल के राहुल गांधी क्या अपनी कमज़ोर हो चुकी पार्टी का भविष्य बदल पाएंगे?

13 साल पहले राहुल गांधी ने राजनीति में प्रवेश किया था. तब से अपने ख़ानदान के पांचवीं पीढ़ी के वंशज को राजनीति में एक अनिच्छुक और उदासीन राजनीतिज्ञ के रूप में देखा गया है.

राहुल 2013 में पार्टी के दूसरे बड़े नेता बने थे, लेकिन इससे बदलाव नहीं आया. उन्होंने पार्टी में बदलाव की कोशिशें कीं. उन्होंने पदाधिकारियों के चुनावों में बदलाव के साथ-साथ, पार्टी की युवा इकाई को पुनर्जीवित किया और इसको कॉरपोरेट दफ़्तर की तरह चलाया, हालांकि इसके परिणाम ख़ासे असरदायक नहीं रहे और पार्टी का गिरना जारी रहा.

अमरीका जाकर आया बदलाव?

राहुल सितंबर में अमरीका दौरे पर गए जहां उन्होंने छात्रों, थिंक-टैंक, नेताओं और पत्रकारों से बात की और उनसे सवाल किए. उन्होंने अपनी कमियों पर यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ॉर्निया, बर्कले के छात्रों से ख़ुद कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनसे बेहतर वक्ता हैं.

उनके सोशल मीडिया कैंपेन में अब ज़ोरदार तब्दीली आई है. अब राहुल खुले और दिलचस्प शख़्स नज़र आते हैं. वह अपनी मां सोनिया गांधी की बीमारी की स्थिति के अलावा अपने कुत्ते के वीडियो तक ट्वीट करते हैं.

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Image caption 19 साल से कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के पास

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गुटबाज़ी से भरे पार्टी नेताओं और ज़मीनी कार्यकर्ताओं के होने के बावजूद गुजरात विधानसभा चुनावों में वह बेहद उत्साह से लगे हुए हैं. ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी के राज्य में बीजेपी ने 2014 लोकसभा चुनाव में सभी 26 सीटें जीती थीं.

चुनाव अभियान के दौरान राहुल ने मतदाताओं के मुद्दों को छुआ है. उन्होंने साफ़तौर से नौकरियों की कमी, नोटबंदी, असहिष्णुता, सुस्त अर्थव्यवस्था और मोदी सरकार के अधूरे वादों पर बात की.

इस 'नए अवतार' पर राहुल की जीवनी लिखने वाली आरती रामचंद्रन ने कहा कि, "वह मतदाताओं से जुड़ने को लेकर उत्सुक दिखते हैं."

क्या करें राहुल?

राहुल के इस उत्साह ने पार्टी नेताओं को ऊर्जावान ज़रूर किया है, लेकिन उनको अभी और राजनीतिक रणनीति की आवश्यकता है ताकि वह चुनाव जीतना शुरू करें.

उन्हें उन युवा भारतीयों के आगे एक आकर्षक आर्थिक दृष्टिकोण रखने की आवश्यकता है जो भ्रामक सुधारवादी बात को सुनकर थक गए हैं. उन्हें करिश्माई और साफ़-सुथरी छवि वाले स्थानीय नेताओं को खोजने और उन्हें प्रेरित करने की आवश्यकता है. साथ ही उन्हें क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन बनाने और यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि उनकी पार्टी राज्यों में बेहतर सरकार चलाए.

डॉ. पालशिकर कहते हैं कि कांग्रेस ने इस रणनीति को तब ही खो दिया था जब वह 'भारत की बदलती प्रतिस्पर्धी राजनीति' को अपना ही नहीं सकी. वह आगे कहते हैं कि देश एक प्रमुख पार्टी की सत्ता से हटकर अधिक वास्तविक और बहु-दलीय प्रणाली की ओर मुड़ गया और गठबंधन की राजनीति सफ़लता की कुंजी बन गई.

कांग्रेस को अब यह दिखाने की ज़रूरत है कि उस पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगाए जा सकते. साथ ही उसको प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी की मज़बूत मशीनरी पर बढ़त बनाने की ज़रूरत है.

कई लोग मानते हैं कि राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती अपने वंश के बोझ से संघर्ष करना होगा, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी साधारण पृष्ठभूमि को राजनीतिक लाभ में तब्दील किया है.

जब अमरीका में छात्रों ने उनसे वंशवादी राजनीति के बारे में पूछा तो उन्होंने इसकी तरफ़दारी करते हुए कहा था कि भारत को राजवंशों ने ही चलाया है.

उन्होंने कहा था, "इसी तरह से देश चलता है."

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'अल्पसंख्यक तुष्टीकरण'

राहुल गांधी की बात काफ़ी हद तक सही है. भारत में क्षेत्रीय पार्टियां एक परिवार द्वारा चलाई जाती रही हैं और यहां तक की वंशवाद से बीजेपी भी मुक्त नहीं है.

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) के निदेशक और राजनीति के जानकार संजय कुमार कहते हैं, "रिसर्च लगातार दिखाता है कि भारतीय मतदाता वंशवादी नेताओं के लिए मतदान के ख़िलाफ़ नहीं हैं."

वह आगे कहते हैं कि कांग्रेस को लेकर यह धारणा बढ़ी है कि वह अल्पसंख्यकों को ख़ुश करती है, इसके बाद कई मतदाता कांग्रेस से दूर हुए हैं.

2014 में भारत की हिंदू आबादी का कांग्रेस को 16 फ़ीसदी वोट गया था. सीएसडीएस के 2014 का विश्लेषण दिखाता है कि कांग्रेस के 10 मतदाताओं में से छह मुस्लिम, आदिवासी, सिख या इसाई थे जबकि बीजेपी में इनकी संख्या केवल तीन थी.

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विश्लेषक एजाज़ अशरफ़ कहते हैं, "राहुल की चुनौती बिना हिंदुत्व की ख़राब राजनीति किए बिना हिंदुओं का दिल और दिमाग़ जीतना है. साथ ही हिंदुओं की भावना को ख़ारिज किए बिना हिंदू राष्ट्रवाद का विरोध करना है."

अगले साल होने वाले प्रमुख राज्यों के चुनावों में पकड़ बनाना ही राहुल की ताक़त की असली परीक्षा होगी.

संजय कहते हैं, "उन्हें ख़ुद को लेकर धारणा बदलने के लिए एक चुनाव जीतने की आवश्यकता है."

इसके अलावा भी कई बड़े सवाल हैं. जैसे 2019 में पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगा? या क्या वह पार्टी को एक साथ रखेंगे और समय पर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को उभरने की अनुमति देंगे?

कांग्रेस पर किताब लिखने वाली ज़ोया हसन को विश्वास है कि "सभी कमियों के बावजूद, यह भारत के संकीर्ण विचार का प्रतिनिधित्व नहीं करती है." लेकिन वह आगे कहती हैं कि यह एक ऐसी पार्टी है जिसकी कोई विचारधारा नहीं है, बस रणनीति है.

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