झारखंड में kiss को लेकर किसकी कैसी सियासत?

  • 12 दिसंबर 2017
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Image caption चुंबन प्रतियोगिता

पाकुड़ ज़िले के डुमरिया मेले में हुई चुंबन प्रतियोगिता के बाद झारखंड में सियासत तेज़ हो गई है.

यहां सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्य विपक्षी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) इस मुद्दे पर आमने-सामने हैं.

भाजपा ने इस मामले को विधानसभा के शीतकालीन सत्र में उठाने के संकेत दिए हैं. वहीं झामुमो का कहना है कि भाजपा के पास जनहित के मुद्दों की कमी है, इसलिए वह ऐसे मामले उठाकर जनता का ध्यान भटकाना चाहती है.

आदिवासी बुद्धिजीवियों ने भी भाजपा के इस विरोध को ग़ैरवाजिब करार दिया है.

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क्या है मामला?

दरअसल, लिट्टीपाड़ा प्रखंड के तालपहाड़ी गांव में नौ दिसंबर को सिदो-कान्हू मेले के दौरान 'दुलार-चो' नाम की प्रतियोगिता हुई.

इसमें सबसे ज़्यादा समय तक चुंबन लेने वाले तीन जोड़ों को इनाम दिया गया.

इस दौरान झामुमो के दो विधायक स्टीफ़न मरांडी और साइमन मरांडी भी मौजूद थे.

इन लोगों ने मेले के दौरान हुई विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कार दिए जिसमें 'दुलार-चो' प्रतियोगिता के विजेता भी शामिल थे.

मेले में शामिल हुए वरिष्ठ पत्रकार रामप्रसाद सिन्हा ने बताया, ''देर शाम हुई प्रतियोगिता के दौरान दस हजार से ज़्यादा लोग मौजूद थे, लेकिन तब किसी ने इसका विरोध नहीं किया. अलबत्ता इसमें भाग ले रहे क़रीब एक दर्जन जोड़ों का लोगों ने तालियां बजाकर उत्साह बढ़ाया.''

यह मेला धान कटने के बाद हर साल लगता है. इसमें तरह-तरह के मुक़ाबले किए जाते हैं.

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Image caption झारखंड भाजपा के उपाध्यक्ष हेमलाल मुर्मू

छुपा कर नहीं हुई चुंबन प्रतियोगिता

रामप्रसाद सिन्हा ने बीबीसी को बताया कि तालपहाड़ी के डुमरिया मैदान में आयोजित इस मेले के लिए छपे पर्चे और आमंत्रण कार्ड में 'दुलार-चो' प्रतियोगिता का प्रमुखता से उल्लेख था.

'दुलार-चो' दरअसल संथाली शब्द है जिसका हिंदी अनुवाद होता है 'प्यार का चुम्मा'. यह आमंत्रण पत्र पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों को भी दिया गया था.

इसके बाद कुछ अधिकारियों की वहां नियुक्ति भी हुई थी.

झारखंड में सामूहिक चुंबन के आयोजन से विवाद

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झामुमो विधायक के गांव की घटना

तालपहाड़ी झामुमो विधायक साइमन मरांडी का पैतृक गांव है. उन्होंने बताया कि ग्राम प्रधान और समस्त गांव वालों ने इसका आयोजन किया था. लिहाज़ा, वे इस मेले में मौजूद थे.

साइमन मरांडी ने कहा कि इस प्रतियोगिता में लोग अपनी मर्ज़ी से शामिल हुए. मेले के पैंफ़लेट में भी 'दुलार-चो' का ज़िक्र था, तब लोगों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया?

मरांडी के मुताबिक़, ''हाल के दिनों में आदिवासी समाज में तलाक़ के मामले बढ़े हैं. हमारी सोच थी कि इसके ज़रिए पति-पत्नी के बीच के संबंध और प्रगाढ़ होंगे. इसमे कुछ भी ग़लत नहीं है.''

भाजपा का विरोध

झारखंड भाजपा के उपाध्यक्ष हेमलाल मुर्मू ने इस प्रतियोगिता के आयोजन के लिए झामुमो विधायक साइमन मरांडी और स्टीफ़न मरांडी को ज़िम्मेदार ठहराया.

उन्होंने कहा कि भाजपा इस मुद्दे को विधानसभा के इसी शीतकालीन सत्र में उठाएगी.

हेमलाल मुर्मू ने बीबीसी से कहा, `'झामुमो विधायकों ने आदिवासी संस्कृति के ख़िलाफ़ काम किया है. वे संथाल परगना को रोम और यरुशलम बनाने पर तुले हैं. हम इस कोशिश को कामयाब नहीं होने देंगे. ईसाई मिशनरियों के इशारे पर काम कर रहे इन विधायकों का लोग ख़ुद विरोध कर रहे हैं. उनके पुतले फूंके जा रहे हैं. इसमें हमारी कोई राजनीति नहीं है. हम सिर्फ संस्कृति बचाने की बात कर रहे हैं.''

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'आदिवासी संस्कृति पर हमला'

भाजपा के इस विरोध को केंद्रीय सरना समिति का भी समर्थन मिल गया है. समिति के कार्यकारी अध्यक्ष बबलू मुंडा ने कहा है, ''यह आदिवासी संस्कृति के विनाश की कोशिश है. इसलिए हमलोग क्रिसमस की पूर्व संध्या पर रांची में विरोध जुलूस निकालेंगे और काले झंडे लगाएंगे.''

आदिवासी धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने भी इस प्रतियोगिता की आलोचना की है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''आदिवासी समाज में ऐसे आयोजनों की इजाज़त नहीं है. हमारे समाज में सरहुल, करमा जैसे त्योहार मनाए जाते हैं. इसमें लड़के-लड़की एक साथ नाचते हैं, लेकिन सार्वजनिक तौर पर चुंबन लेने की इजाज़त सरना समाज नहीं देता.''

असमंजस में झामुमो

अपने दो वरिष्ठ विधायकों पर भाजपा के हमले के बाद झामुमो में असमंजस की स्थिति है. झामुमो के केंद्रीय महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने बताया कि पार्टी ने इस मामले में विधायक साइमन मरांडी से लिखित जवाब मांगा है, हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि 'पार्टी इस मामले में अपने विधायको के साथ खड़ी है. अगर विधानसभा में भाजपा ने इसे उठाया तो हम फ़्लोर पर इसका जवाब देंगे.'

उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा जनसमान्य के मुद्दों पर बात करना नहीं चाहती है. इसलिए फूहड़ मुद्दों को उठाकर लोगों का ध्यान भटकाने में लगी है.

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आदिवासी बुद्धिजीवियों का विरोध

आदिवासी बुद्धिजीवियों ने भाजपा के इस विरोध को हिंदू कट्टरपंथ थोपने की कोशिश करार दिया है. वे सरना समिति के तर्क से भी इत्तेफ़ाक नहीं रखते.

जाने-माने आदिवासी कवि डॉ. अनुज लुगुन ने बीबीसी से कहा, ''दरअसल विरोध करने वाले लोग आदिवासी समाज को भी हिंदू नज़रिए से देखने की कोशिश कर रहे हैं. उन्हें यह समझना होगा कि आदिवासी समाज हिंदू समाज नहीं है. न ही उसका व्यवहार और आचरण हिंदू समाज की तरह हो सकता है. यह समाज शुरू से ज़्यादा स्वच्छंद रहा है. इसे किसी दायरे में बांधने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए. इस प्रतियोगिता में कुछ भी अराजक नहीं था क्योंकि वे विवाहित जोड़े थे और अपनी मर्ज़ी से इसमें भाग ले रहे थे. इसे मुद्दा नहीं बनाना चाहिए.''

आदिवासी मामलों के लेखक अश्विनी कुमार पंकज भी इससे सहमत हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''यह प्रेम प्रदर्शन का एक तरीका है. आदिवासी समाज मानता है कि प्रेम कोई बुरी चीज़ नहीं है. संथाली समाज संकीर्ण दायरों में नहीं रहना चाहता. इस कारण वे फ़ैशन शो जैसे आयोजनों में भी शामिल हैं. लिहाज़ा इसे एक इवेंट की तरह देखा जाना चाहिए न कि संस्कृति पर हमले की नज़र से.''

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सरकारी जांच

इस बीच पाकुड़ के डीसी ने इस मामले की जांच के लिए एसडीएम जीतेंद्र कुमार देव के नेतृत्व में एक जांच टीम गठित की है.

इस टीम ने घटनास्थल पर जाकर लोगों से बातचीत करनी चाही, लेकिन उनके बुलावे पर कोई नहीं पहुंचा. इस कारण टीम को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा.

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