ब्लॉग: शादी के बाहर इश्क़ पर किसे हो जेल?

  • 13 दिसंबर 2017
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Image caption 'अडल्ट्री' का मौजूदा क़ानून कहीं पुराना तो नहीं हो गया?

ये जो क़िस्सा-ए-अडल्ट्री है, जिसमें मर्द भी है, औरत भी; इश्क़ भी है, अपराध भी; क़ानून भी है, सज़ा भी; उसमें एक दिलचस्प मोड़ आया है. सवाल उठा है कि कहीं कहानी पलट तो नहीं गई? आज के किस्से में मुजरिम कौन है और इंसाफ़ क्या हो?

एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि सिर्फ मर्द को गुनहगार माननेवाला 'अडल्ट्री' का मौजूदा क़ानून कहीं पुराना तो नहीं हो गया? क्योंकि 'अडल्ट्री' तो मर्द और औरत दोनों की मिलीभगत है.

काश मैं यहीं लिख देती कि जवाब सीधा-साधा है कि 'जब प्यार सांझा है तो सज़ा भी सांझी होनी चाहिए', और ब्लॉग शुरू होने से पहले ही यहीं ख़त्म हो जाता.

लेकिन किस्सा इससे ज़्यादा पेचीदा है. पढ़ते रहिए.

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150 साल से अधिक पुराने क़ानून में है क्या?

सबसे पहले तो ये जान लें कि पुरुष-विरोधी और महिला-समर्थक माने जा रहे इस 150 साल पुराने क़ानून में है क्या?

1860 में 'अडल्ट्री' पर बनाए गए इस क़ानून (आईपीसी की धारा 497) के तहत अगर एक मर्द

• किसी औरत से ये जानते हुए शारीरिक संबंध बनाए कि वो किसी और से शादीशुदा है,

• और उस औरत का पति इस संबंध की इजाज़त नहीं देता है,

• और ये संबंध औरत की सहमति से बनाया गया है,

तो वो मर्द 'अडल्ट्री' के लिए गुनहगार है और उसे पांच साल की क़ैद और जुर्माना दोनों हो सकते हैं.

ग़ौरतलब है कि शादीशुदा मर्द अगर कुंवारी या विधवा औरत से शारीरिक संबंध बनाए तब वो 'अडल्ट्री' का दोषी नहीं है.

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क्या है अडल्ट्री?

इसका एक ऐतिहासिक संदर्भ है. दरअसल 'अडल्ट्री' को अपवित्रता से जोड़ा गया है. जैसे खाना पवित्र है और उसमें बाहरी तत्व मिलाने से वो 'अडल्ट्रेट' यानी ख़राब हो जाता है.

एक मर्द और औरत की शादी पवित्र है और उससे होनेवाला बच्चा परिवार का वंश बढ़ाता है.

पर अगर कोई 'ग़ैर' मर्द एक शादीशुदा औरत से शारीरिक संबंध बनाता है तो उससे होनेवाला बच्चा, वंश की शुद्धता को ख़राब करने की संभावना पैदा करता है. यही अपवित्रता 'अडल्ट्री' है.

औरत शादीशुदा ना हो तो अपवित्रता का सवाल ही नहीं उठता. तब शादीशुदा मर्द चाहे शादी के बाहर सेक्स करे, क़ानून की नज़र में ये 'अडल्ट्री' नहीं है.

ग़ौर करनेवाली दूसरी बात ये है कि क़ानून की नज़र में 'अडल्ट्री' से जुड़े सारे फ़ैसले मर्द के हाथ में हैं.

ऊपर लिखी परिभाषा को फिर से पढ़िए, आप देखेंगे कि क़ानून की भाषा ये मान रही है कि 'अडल्ट्री' का रिश्ता बनाने का फ़ैसला एक मर्द ही करता है इसलिए सज़ा का हक़दार भी वही है.

और सज़ा सिर्फ़ एक सूरत में नहीं होगी अगर 'अडल्ट्री' करनेवाली औरत का पति इस रिश्ते को इजाज़त दे दे!

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अडल्ट्री के लिए औरत दोषी क्यों नहीं?

औरत की भूमिका सिर्फ़ सेक्स के लिए सहमति देने तक सीमित है. क्योंकि बिना मर्ज़ी का सेक्स तो बलात्कार होता है.

हंगामा इसी बात पर बरपा है. जब औरत सहमति देने लायक है तो उस फ़ैसले के लिए दोषी उतनी ही होनी चाहिए जितना मर्द.

सही भी है, औरतें सेक्स के लिए सहमति और रिश्ता बनाने के फ़ैसले में बराबर की भूमिका रखती हैं. ना ये उनके लिए ग़ैर-मर्द का किया फ़ैसला है ना उन्हें इसके लिए अपने पति से इजाज़त चाहिए.

और ये हंगामा पहली बार नहीं बरपा. सुप्रीम कोर्ट में ये सवाल 1954, 1985 और 1988 में भी पूछा गया था.

भारत की 42वीं 'लॉ कमिशन' ने भी अपनी रिपोर्ट में क़ानून में संशोधन कर औरत को दोषी बनाने की बात कही थी. पर यही क़ानून कायम रहा.

अब अगर क़ानून की समीक्षा हो रही है तो दो सूरत बनती हैं. एक ये, कि क़ानून बरक़रार रहे और उसमें औरतों को भी सज़ा देने का प्रावधान आए और दूसरा ये कि 'अडल्ट्री' को दोषमुक्त कर दिया जाए.

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कई यूरोपीय देशों में अडल्ट्री अपराध नहीं

ये कोई क्रांतिकारी बात नहीं है. 150 साल पहले भारत में ये क़ानून लानेवाले देश ब्रिटेन समेत ज़्यादातर यूरोपीय देशों में आज की तारीख़ में 'अडल्ट्री' अपराध नहीं माना जाता.

जहां अपराध माना जाता है वहां भी उसके लिए जेल नहीं बल्कि जुर्माने की सज़ा है.

क़ानून की समीक्षा करते व़क्त ये ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि भारत में 'अडल्ट्री' के लिए गिरफ़्तारी या जेल की सज़ा के बहुत कम ही मामले होते हैं.

इसका सबसे ज़्यादा इस्तेमाल तलाक़ लेने के लिए होता है. इसमें गिरफ़्तारी नहीं होती, बस 'अडल्ट्री' को तलाक़ की बिनाह बनाया जाता है.

इसके लिए आईपीसी की धारा 497 की ज़रूरत ही नहीं, 'हिंदू मैरिज ऐक्ट' में पहले से ही इसका प्रावधान है.

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पेचीदा है किस्सा-ए-अडल्ट्री

आप ही सोचिए अगर कोई पति या पत्नी शादी के बाहर रिश्ता बना रहे हैं तो इसका समाधान उन्हें जेल में डालना है या शादी के रिश्ते को फिर से मज़बूत करना या फिर उसे तोड़कर तलाक़ ले अपनी-अपनी राह चले जाना.

इसी विचारधार को ध्यान में रखते हुए साल 2007 में भारत के गृह मंत्रालय को दिए गए 'नैशनल पॉलिसी ऑन क्रिमिनल जस्टिस' के मसौदे में ये सुझाव दिया गया था कि, 'हर जुर्म की सज़ा जेल होना ज़रूरी नहीं है'.

ये कहा गया था कि, 'अन्य अपराधों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटना चाहिए और शादी के झगड़ों समेत ग़ैर-हिंसक अपराधों में सज़ा की जगह सुलह-सफ़ाई के रास्ते निकालने चाहिए'.

पर अभी इसपर भी कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है.

अब बताइए, ब्लॉग पहले कैसे ख़त्म कर देती? किस्सा-ए-अडल्ट्री पेचीदा था, पेचीदा है. तो सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ आप भी सोचिए आज के किस्से में मुजरिम कौन है और इंसाफ़ क्या हो?

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