गुजरात क्यों भेजे जा रहे हैं महुए के हज़ारों लड्डू?

  • 13 दिसंबर 2017
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दूसरी जगहों की बात छोड़िए, झारखंड में भी लोग महुआ लड्डू का नाम सुनकर चौंक जाते हैं.

नज़र पड़ी और सवाल शुरू. कैसे बनाया इसे? वही महुआ जिससे शराब बनाई जाती है? क्या कोई रसायन (केमिकल) या रंग इस्तेमाल किया?

तब हम बताते हैं, "रसायन, रंग और नशे का नामोनिशान नहीं. देसी तरीके से हाथों से बनाया है. ख़ुशबूदार और सेहत के लिए भी जानदार. चख कर देखिए." लड्डू बनाने वाली आरती तिर्की एक सांस में यह सब कह जाती हैं.

मुस्कुराते हुए आगे कहती हैं, "इस पहचान के लिए बहुत संघर्ष करती रही हूँ. बाज़ार मिलना बहुत मुश्किल है, लेकिन हम लोगों ने ठान लिया है कि रुकना नहीं है".

महुए से शराब बनाई जाती है. झारखंड में लंबे समय से गांव-कस्बों में महिलाएँ इस शराब के ख़िलाफ़ जंग लड़ रही हैं. दूरदराज़ और ख़ास तौर पर आदिवासी इलाकों में महुए की शराब बर्बादी की कहानी लिखती रही है.

मांडर तहसील के चटवल गांव की कुछ आदिवासी महिलाओं ने महुए से होने वाली बर्बादी को क़ामयाबी में बदलने की कोशिश शुरू की है.

इन महिलाओं को पांच जनवरी को बीस हज़ार लड्डू लेकर गुजरात जाना है. ये उनका पहला बड़ा ऑर्डर है जहाँ से उनकी सफलता की कहानी शुरू हो सकती है.

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Image caption आरती को गुजरात से बड़ी संख्या में लड्डुओं का ऑर्डर मिला है. सभी महिलाएं उसी तैयारी में जुटी हैं

महुआ का मतलब सिर्फ़ दारू नहीं है

चटवल गांव में सुशीला खलखो अपने घर के आंगन में कई बुज़ुर्ग महिलाओं के साथ लड्डुओं की पैकिंग करने में जुटी थीं जबकि कई महिलाएं खेत-खलिहान गई थीं.

आरती ने बताया कि 'धान कटने का वक़्त है. बुतरू (बच्चे) और परिवार के साथ खेत संभालना भी ज़रूरी है.'

सुशीला खलखो बताती हैं कि महुआ समेत कई जंगली उत्पादों का इस्तेमाल उनके पुरखे कई रूपों में करते रहे हैं.

उन्हें इस बात पर गुस्सा आता है कि लोग महुए के नाम पर बस दारू को ही क्यों याद करते हैं. यह जंगली फल है और इसमें आयरन की मात्रा बहुत होती है. इसके अलावा लड्डू में वे जिन चीज़ों को मिलाती हैं, उनसे भी इसकी ख़ूबियां बढ़ जाती हैं.

सुशीला से पता चला कि जानी-मानी सामाजिक और महिला कार्यकर्ता वासवी किड़ो ने उन्हें यह मुकाम हासिल करने में काफ़ी मदद की.

एक प्रशिक्षण लेने के बाद इन महिलाओं ने अपना आइडिया लगाया, तब जाकर यह बेहतरीन लड्डू बना है.

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गुजरात क्यों जाएंगे 50 हज़ार लड्डू?

वासवी बताती हैं, "गुजरात की एक संस्था आदिवासी विकास परिषद ने अपने एक कार्यक्रम के लिए 50,000 लड्डू की मांग की है. जनवरी में दस महिलाओं को लड्डू लेकर गुजरात जाना है. हाल ही में हमारे कार्यकर्ता छत्तीसगढ़ के जसपुर में पंद्रह किलो लड्डू लेकर गए हैं. चटवल के अलावा मलटी गांव में भी आदिवासी महिलाएं इस काम में जुटी हैं."

गौरतलब है कि झारखंड में 47.8 फ़ीसदी बच्चे कुपोषित हैं और 15 से 49 साल की 65.2 फ़ीसदी महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं.

जानकारों का मानना है कि इन हालात में महुए से बना पौष्टिक आहार झारखंड जैसे राज्य की सेहत में बदलाव ला सकता है.

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Image caption बहुत मेहनत का काम है महुए के लड्डू बनाना

कैसे बनता है महुए का लड्डू?

हालांकि इस लड्डू को बनाना आसान नहीं है. महिलाएँ बाज़ार से महुआ ख़रीदकर अच्छी तरह धोकर सुखाती हैं. तब उसे घी में भूना और फिर पीसा जाता है.

पहले पिसाई-कुटाई का काम वे लोग ढेंकी (जाँता) में करती थीं, लेकिन उससे लड्डू खुरदुरा बनता था. इसलिए उन्होंने पैसे जुटाकर बारीक़ पिसाई के लिए ग्राइंडर ख़रीदा है.

दस किलो महुए में सफेद तिल, काग़ज़ी बादाम, मूंगफली के दाने, चावल और गुड़ एक-एक किलो के हिसाब से मिलाया जाता है. लड्डू बांधने के बाद उस पर नारियल का चूरा लगाया जाता है.

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Image caption महुए के लड्डू बनाती महिलाएं

महुए के लड्डू कीक़ीमत?

एक किलो लड्डू की क़ीमत तीन सौ रुपये है जिसमें तीस के क़रीब लड्डू आते हैं यानी एक लड्डू दस रुपये का पड़ता है.

क़ीमत के सवाल पर सुशीला कहती हैं कि, "लागत कम है और फ़िलहाल उन्हें जगह बनानी है. यह समझना होगा कि ये बूंदी वाला लड्डू नहीं है, जो कुछ ही घंटों में तैयार हो जाता है. महुए का लड्डू बांधने से पहले सारी प्रक्रिया पूरी करने में कम-से-कम पांच दिन का वक़्त लगता है और मेहनत खुद आप देख ही रहे हैं."

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Image caption दस रुपये का एक लड्डू

'कोई सरकारी मदद नहीं मिलती'

फूलमनी उरांव स्थानीय कुड़ुख भाषा में बताती हैं, ''गांव की क़रीब बीस महिलाएं 'आस्था' और 'सरना' नामक स्वयं-सहायता समूह से जुड़ी हैं.''

अब तक उन लोगों ने समूह में जमा किए सारे पैसे खुदरा में बिके लड्डुओं से कमाए हैं.

इस पूंजी का इस्तेमाल उन्होंने बर्तन-बासन ख़रीदने और कच्चा सामान लाने में किया. हालांकि उन्हें सरकारी मदद न मिलने की शिकायत भी है.

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Image caption डॉ. विवेक कश्यप

क्या कहते हैं जानकार?

राजेंद्र आर्युविज्ञान संस्थान रांची में प्रीवेंटिव एंड सोशल मेडीसिन विभाग के अध्यक्ष डॉ. विवेक कश्यप बताते हैं कि महुए में रिच आयरन के अलावा कार्बोहाइड्रेट्स और भरपूर खनिज भी होते हैं.

वो कहते हैं, "बिना फ़रमेंटेशन अगर गुड़, बादाम, तिल डालकर लड्डू बनाए जा रहे हैं तो बेशक सेहतमंद होंगे. बढ़ते बच्चों, ख़ासकर लड़कियों और महिलाओं के स्वास्थ्य में ये बहुत लाभकारी हो सकता है क्योंकि राज्य में एनीमिया एक बड़ी समस्या है."

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