गुजरात: बनिये का दिमाग़ और मियांभाई की बहादुरी

  • 13 दिसंबर 2017
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गुजराती साहित्य परिषद के संस्थापक रंजीतराम मेहता ने 100 साल पहले अपने एक लेख में लिखा था कि पूरे भारत में सबसे ज़्यादा जातिवाद गुजरात में है.

उन्होंने ये बात 'गुजरात में एकता और एकता क्यों नहीं' नाम से छपे एक लेख में कही थी.

हालांकि इस बार के विधानसभा चुनाव को लेकर कहा जा रहा है कि जाति मुखर होकर सामने आई है.

क्या इससे पहले गुजरात की चुनावी राजनीति में जाति नेपथ्य में रहती थी?

1960 में गुजरात के गठन के बाद पहली बार 1973 में चिमनभाई पटेल ग़ैर ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने. इसके पहले जीवराज नारायण मेहता बनिया थे और बाक़ी के मुख्यमंत्री ब्राह्मण थे. ऐसा तब था जब गुजरात में ब्राह्मण जाति एक फ़ीसदी से भी कम थी.

सूरत में सोशल साइंस स्टडी सेंटर के प्रोफ़ेसर किरण देसाई कहते हैं कि चिमनभाई का आना कांग्रेस और गुजरात की राजनीति के लिए एक बड़ी घटना थी.

देसाई ने कहा, "इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई की कांग्रेस को कमज़ोर करने के लिए पटेलों और पिछड़ी जातियों को आगे किया था."

गुजरात में जाति कोई नई बात नहीं है. इससे पहले के चुनावों में भी जातीय गोलबंदी होती रही है. 80 के दशक में माधव सिंह सोलंकी ने क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुसलमानों को खाम मंच पर इकट्ठा किया. तब माधव सिंह सोलंकी के नेतृत्व में 149 सीटें मिली थीं.

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ब्राह्मणों का दबदबा

सूरत में वीर नारमद दक्षिण गुजरात यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर परवेज़ अब्बासी कहते हैं कि देश आज़ाद होने के बाद लगभग सभी अहम राज्यों में ब्राह्मणों का दबदबा था. उन्होंने कहा कि यह केवल गुजरात की बात नहीं है.

अब्बासी कहते हैं, "तब ग़ैर-ब्राह्मणों में जागरूकता नहीं थी. वे पढ़े-लिखे नहीं थे. उनकी महत्वाकांक्षा दबी हुई थी. आगे चलकर स्थिति बदली और हम इसका नतीजा भी देख सकते हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात समेत कई राज्यों के मुख्यमंत्री ब्राह्मण हुआ करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब वो अपने प्रतिनिधित्व को लेकर काफ़ी मुखर हैं."

कई विश्लेषकों का कहना है कि गुजरात में पिछले कुछ दशक से हिंदुत्व की राजनीति चल रही थी, इसलिए जाति ख़ामोश थी.

गुजरात यूनिवर्सिटी में सोशल साइंस के प्रोफ़़ेसर गौरांग जानी कहते हैं कि शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्म का वह संवाद- 'बनिये का दिमाग़ और मियांभाई की डेरिंग' गुजरात को समझने में काफ़ी मदद करता है.

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मुसलमान और दलित

वो कहते हैं कि गुजरात के दंगों को समझने के लिए यह संवाद बिल्कुल सही है. उन्होंने कहा, "उस ज़माने में हेराफेरी दारू की होती थी. इसके साथ तस्करी भी होती थी. ये दोनों चीज़ें अंडरवर्ल्ड की ऊर्जा थीं. गुजरात में दारू का धंधा हिन्दू और अपर कास्ट के लोग करते थे. इसलिए यहां बनिए का दिमाग़ हुआ और इसमें हेराफेरी करने का जोखिम मुसलमान लड़के उठाते थे. मतलब मियांभाई की ये डेरिंग हुई."

गैरांग जानी कहना है कि इसमें मुसलमान के साथ दलित लड़के भी थे. उन्होंने कहा कि उस ज़माने में बनिए का दिमाग़ और मियांभाई बहादुरी एक आर्थिक निर्भरता थी. मुसलमान और दलित लड़के बेरोज़गार थे इसलिए उन्हें इस रूप में इस्तेमाल किया जाता था.

प्रोफ़ेसर जानी ने कहते हैं, "ये एक फंक्शनल रिलेशनशिप थी. ये रिलेशनशिप पूरे गुजरात और अहमदाबाद में थी. अगर किसी को स्कूटर बनवाना है तो मुसलमान के पास जाना होगा. पतंग बनाने वाले मुसलमान थे. यहां तक कि स्वामीनारायण मंदिर में रेशम का काम करने वाले भी मुसलमान थे. हालांकि इनके काम बिल्कुल असंगठित थे. गुजरात में जो दंगे हुए उनमें सबसे पहले मुसलमानों की कमाई पर चोट की गई."

उनका कहना है कि जिस लतीफ़ को अंडरवर्ल्ड कहा जाता है उसे ऐसे ही पैदा किया गया. उनके मुताबिक जब तक मुसलमान विलेन रहे तब तक हिन्दू एकता के नाम पर जाति चुप रही है, लेकिन इमोशन की भी एक उम्र होती और सच बहुत दिनों तक पांव दुबकाए नहीं रहता.

उन्होंने कहा, "जातियों को इतने साल बाद अब लग रहा है कि उनके दुश्मन मुसलमान नहीं बल्कि सरकार की नीतियां हैं और इसलिए वे सड़क पर हैं."

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गुजरात में कौन जाति कितनी?

ब्राह्मण और बनिया यहां डेढ़-डेढ़ फ़ीसदी हैं. मतलब दोनों तीन फ़ीसदी हैं. पांच फ़ीसदी राजपूत हैं. ये पांच फ़ीसदी राजपूत ओबीसी में नहीं हैं. इन्हें राजघराने वाला राजपूत कहा जाता है.

यहां जाडेजा, वाघेला और गोहिल राजपूत ओबीसी में नहीं हैं. वाघेला टाइटल लगाने वाले कुछ ऐसे लोग भी हैं जो ओबीसी में हैं. 12 फ़ीसदी पटेल हैं. पटेलों में दो उपजातियां हैं कड़वा और लेउवा. लेउवा को प्रगतिशील माना जाता है. सरदार पटेल लेउवा थे.

इन सबको जोड़ दें तो गुजरात में 20 फ़ीसदी अपर कास्ट और 60 फ़ीसदी से ऊपर ओबीसी, एसटी और एससी हैं. इस बार बीजेपी को ओबीसी और पटेलों को लेकर डर सता रहा है.

माधव सिंह सोलंकी कोली जाति के थे और इन्होंने ही खाम समीकरण को ज़मीन पर उतारा था. गुजरात में कोली ओबीसी में सबसे बड़ा तबका है.

1955 में सौराष्ट्र में जब भूमि सुधार हुआ तो राजपूतों की ज़मीन पटेलों के पास आई. इसीलिए पटेलों और राजपूतों में दुश्मनी की स्थिति रहती है. प्रोफ़ेसर जानी कहते हैं कि राजपूत पुलिस में ख़ूब जाते थे लेकिन आरक्षण के बाद इसमें भी कमी आई और इनकी हालत ख़राब होती गई.

लेकिन दिलचस्प है कि जहां पाटीदार के पास ज़्यादा ज़मीन थी वहां भूमि सुधार नहीं किया गया और उनके पास आज भी काफ़ी ज़मीन है.

गुजरात में दलितों के लिए 13 सीटें आरक्षित हैं और 2012 में बीजेपी ने 10 सीटों पर जीत हासिल की थी. आदिवासियों के लिए 27 सीटें रिज़र्व हैं. इन पर 2012 में कांग्रेस ने 16, बीजेपी ने 10 और जेडीयू ने एक सीट पर जीत दर्ज़ की थी.

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Image caption स्रोतः चुनाव आयोग

बढ़ती कांग्रेस और घटती बीजेपी

2014 के आम चुनाव में पाटीदार बीजेपी की रीढ़ थे. आज की तारीख़ में बड़ी संख्या में पाटीदार हार्दिक पटेल के साथ हैं. इससे पहले के चुनाव में कुछ जातियाँ अपने प्रभुत्व और अस्मिता को रेखांकित करती थीं पर इस बार सभी जातियाँ स्वतंत्र और प्रभुत्व की चाहत के साथ चुनाव में दिख रही हैं.

पाटीदार और ठाकोर के उभार और उनकी मांग से बाक़ी जातियों को भी प्रेरणा मिली है. इस बार दलित और आदिवासी भी फ्रंटफुट पर हैं.

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 60.11 फ़ीसदी वोट मिले थे जबकि कांग्रेस को 33.45 फ़ीसदी वोट मिले थे. दोनों में 26.66 का फ़र्क़ रहा.

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