अब एमआरपी से ज़्यादा वसूल सकेंगे होटल और रेस्त्रां

  • 13 दिसंबर 2017
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सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद अब होटल और रेस्टोरेंट्स बोतलबंद पानी जैसी पैकेज़्ड चीजों पर एमआरपी से ज़्यादा कीमत ले सकेंगे.

मंगलवार को सुनाए गए एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि होटल और रेस्टोरेंट्स को इन उत्पादों को तय कीमत पर बेचने के लिए नहीं कहा जा सकता है.

कोर्ट ने कहा कि 'जब होटल और रेस्टोरेंट खाना और ड्रिंक बेचते हैं तो वो एक सेवा प्रदान करते हैं, इसके लिए वो अपने सिस्टम के तहत बिलिंग करते हैं. इनके लिए एमआरपी दरों पर ज़ोर नहीं दिया जा सकता है.'

कहीं पानी की बोतल 20 की, तो कहीं 40 की क्यों?

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मामला

यह मामला फ़ेडरेशन ऑफ़ होटल और रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एफएचआरएआई) और केंद्र सरकार के बीच चल रहा था. फेडरेशन ने सरकार के उस आदेश के ख़िलाफ़ याचिका दायर की थी जिसमें एमआरपी से ज़्यादा कीमत पर बेचने पर रोक लगाई गई थी.

केंद्र सरकार ने इस फ़ैसले से उलट पहले कहा था कि 'होटल और रेस्टोरेंट पहले से पैकेज़्ड उत्पादों पर एमआरपी से ज़्यादा पैसे वसूल नहीं सकते हैं. ऐसा करना उपभोक्ता अधिकारों का हनन है.'

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया था कि ऐसा करने वालों के ख़िलाफ़ जुर्माना लगाया जा सकता है और जेल की सज़ा हो सकती है.

लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट के तहत भी कहा गया है कि भी प्री-पैकेज़्ड उत्पाद पर छपी हुई क़ीमत से ज़्यादा क़ीमत पर बेचने पर जुर्माना लगाया जाएगा.

पानी की बोतल में निकला ज़िंदा सपोला

लेकिन जस्टिस रोहिंटन एफ़ नरीमन की बेंच ने कहा है कि लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट होटल और रेस्टोरेंट पर लागू नहीं होता है.

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समीक्षा संभव

इस संबंध में कनज़्यूमर राइट्स एक्टिविस्ट प्रोफ़ेसर श्रीराम खन्ना कहते हैं, ''ये लड़ाई लंबे समय से चल रही है. पहले सरकार ने पैकेज़्ड उत्पादों पर एमआरपी से ज़्यादा लेने पर रोक लगाई थी जिसके ख़िलाफ़ होटल और रेस्टोरेंट दिल्ली हाई कोर्ट में चले गए.''

''फिर यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश देने के बाद यह नियम सभी पर लागू हो जाएगा.''

प्रोफ़ेसर श्रीराम ने कहा कि इस मामले में हारने की ज़िम्मेदारी भारत सरकार पर है जो पूरी मज़बूती से सुप्रीम कोर्ट में उपभोक्ताओं के हितों का बचाव नहीं कर पाई. दूसरे पक्ष ने बेहतर दलीलों से इस फ़ैसले को अपने पक्ष में कर लिया. यह उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की हार है.''

श्रीराम खन्ना बताते हैं कि अब सरकार के पास ये विकल्प है कि वो पहले सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू के लिए जाए और अगर तब भी फ़ैसला नहीं बदलता है तो क़ानून में संशोधन करके इस फ़ैसले को रद्द कर दे. अब सबकुछ सरकार की इच्छा पर निर्भर करता है कि वो उपभोक्ताओं के लिए कितना प्रयास करती है.''

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