जयकारों से पिघल रहा है अमरनाथ का शिवलिंग?

  • 14 दिसंबर 2017
अमरनाथ गुफा की तस्वीर इमेज कॉपीरइट SAJJAD HUSSAIN/ AFP/ GETTY IMAGES

क्या जयकारे और मंत्रों के उच्चारण का असर अमरनाथ शिवलिंग के पिघलने की वजह है?

नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल यानी एनजीटी ने इस बारे में केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय को एक कमेटी बनाकर पता लगाने को कहा है.

इस पर हमने बात की एनजीटी में इस मामले में याचिका दायर करने वाली गौरी मऊलेखी से.

गौरी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''अमरनाथ का शिवलिंग प्रकृतिक तरीके से बनता है और वह बहुत ही नाज़ुक होता है. लोगों के शोर-शराबे, लाउड स्पीकर की आवाज़ और घोड़े खच्चर की वजह से अब वहां तरह- तरह का प्रदूषण फैल रहा है जिसका शिवलिंग पर ग़लत असर पड़ रहा है. शिवलिंग विलुप्त होने की कगार पर है. इसलिए इसे बचाने के लिए मैंने ये याचिका दायर की थी.''

आवाज़ और हिम स्खलन के बीच रिश्ता?

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लेकिन आवाज़ और बर्फ के पिघलने का क्या रिश्ता है, इस सवाल पर गौरी कहती हैं, ''आप किसी भी पर्वतारोही संस्थान से इस बारे में बाते करेंगे तो वो आपको बताएंगे कि एक ऊंचाई पर पहुंचने के बाद छोटी-सी आवाज़ भी हिमस्खलन का कारण बन सकती है.

हालांकि गौरी कहती हैं कि जयकारे और मंत्रों के उच्चारण पर रोक लगाने की बात उन्होंने अपनी याचिका में नहीं की थी. उनकी याचिका अमरनाथ यात्रा के दौरान सभी तरह के प्रदूषण और उसके वातावरण पर प्रभाव को लेकर थी.

लेकिन क्या आवाज़ से शिवलिंग पिघल सकता है? इस पर हमने देहरादून के वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के हिम वैज्ञानिक डॉ. डी पी डोभाल से बात की.

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कैसे बनता है शिवलिंग

डॉ. डी पी डोभाल पहले भी अमरनाथ गुफा में शिवलिंग बनने की प्रक्रिया पर एक अध्ययन कर चुके हैं.

डॉ. डोभाल ने बीबीसी को बताया कि 'यह बात सही है कि पहाड़ों पर आवाज़ों से हिमस्खलन का ख़तरा रहता है. यही वजह है कि अक्सर पहाड़ पर लोग चिल्लाने को मना करते हैं. लेकिन तेज़ आवाज़ से पहाड़ों पर हिमस्खलन और तेज़ आवाज़ से अमरनाथ के शिवलिंग पिघलना - दोनों एक जैसी बात नहीं है.'

डॉ. डोभाल के मुताबिक, आवाज़ और शिवलिंग के पिघलने के रिश्ते को समझने से पहले ज़रूरी है अमरनाथ में शिवलिंग के बनने की प्रक्रिया को समझना.

उनके मुताबिक अमरनाथ में शिवलिंग हर साल बनता और पिघलता है. शिवलिंग का बनना इस पर निर्भर करता है कि बर्फ़बारी कितनी हुई है.

डॉ. डोभाल की बात को दूसरे हिम वैज्ञानिक डॉ. नबीन जुयाल भी दोहराते हैं. बीबीसी ने जब डॉ. नबीन से पूछा कि क्या आवाज़ से शिवलिंग पिघल सकता है, तो पहले वह ज़ोर से हंसे.

फिर बोले, "आवाज़ से शिवलिंग नहीं पिघल सकता. हो सकता है कोर्ट ने आवाज़ से हिमस्खलन के ख़तरे के बारे में कहा हो. लेकिन जिस इलाके में अमरनाथ गुफा है वहां हिमस्खलन का ख़तरा भी नहीं है."

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आइस और स्नो में फ़र्क

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अमरनाथ शिवलिंग जमी हुई बर्फ़ (आइस) से बना है न कि ताज़ा बर्फ़ (स्नो) से. शिवलिंग बहुत बड़ी अमरनाथ गुफा के भीतर है.

अमरनाथ गुफा की लंबाई चौड़ाई का ज़िक्र करते हुए डॉ डोभाल कहते हैं, गुफा की लंबाई तकरीबन 7 मीटर है, गहराई तकरीबन 20 मीटर और चौड़ाई तकरीबन 30 से 40 मीटर. इसलिए गुफा के भीतर तापमान बाहर के मुक़ाबले कम होता है.

डॉ डोभाल के मुताबिक ताज़ा बर्फ (स्नो) आवाज़ से पिघल सकती है, पर जमी हुई बर्फ (आइस) पर आवाज़ का असर नहीं होता.

इसके पीछे वो वैज्ञानिक कारण बताते हैं. ताज़ा बर्फ (स्नो) बेहद मुलायम होती है जबकि जमी हुई बर्फ (आइस) कठोर होती है. दोनों के घनत्व में भी बहुत फर्क होता है.

जमी हुई बर्फ (आइस) जिससे अमरनाथ शिवलिंग बनता है उसका घनत्व अमरनाथ गुफा के बाहर पड़े ताज़ा बर्फ (स्नो) के मुकाबले बहुत ज्यादा होता है. इसलिए शिवलिंग पर आवाज़ का असर न के बराबर होता है, जबकि गुफा के बाहर ताज़ा बर्फ (स्नो) पर आवाज़ का असर हो सकता है.

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पूजा करने के तरीके का पड़ सकता है असर

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दूसरी वजह है शिवलिंग ताज़ा बर्फ़ (स्नो) के डीफ़्रीज़ होने से बनती है. इसलिए भी इसे पिघलने में ज़्यादा ज़ोर लगता है. ताज़ा बर्फ़ (स्नो) और जमी हुई बर्फ़ (आइस) दोनों के बनने के तरीके में भी काफ़ी फ़र्क होता है. ताज़ा बर्फ (स्नो) को जमी हुई बर्फ़ (आइस) बनने में कई साल लग जाते हैं.

डॉ. डोभाल का मानना है कि अगर आवाज़ से फ़र्क पड़ता तो सबसे पहले हेलीकॉप्टर पर पाबंदी लगनी चाहिए.

लेकिन डॉ. डोभाल ये जरूर मानते हैं कि वहां जाने वाले लोगों की संख्या, पूजा करने का तरीका या फिर दीया जलाने का असर शिवलिंग पर पड़ सकता है. इसलिए अमरनाथ में पूजा थोड़ी दूर से ज़रूर होनी चाहिए और लोगों के अंदर जाने की संख्या निर्धारित होनी चाहिए ताकि शरीर की गरमाहट से शिवलिंग पिघलने न पाए.

लेकिन गौरी का पक्ष अलग है. गौरी के मुताबिक अगर आने वाले दिनों में अमरनाथ के शिवलिंग के इलाके को 'साइलेंट ज़ोन' घोषित कर दिया जाता है तो ये अकेला ऐसा धार्मिक स्थल नहीं होगा. तिरुपति में भी दर्शन स्थल और अक्षरधाम में भी इस तरह के 'साइलेंट ज़ोन' हैं जहां जयकारे और मंत्रों के उच्चारण की इज़ाजत नहीं होती.

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