ब्लॉग: मोदी नहीं बदले, राहुल बदले और बदला ये सब

  • 14 दिसंबर 2017
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Image caption नरेंद्र मोदी के मुखौटे में उनका एक समर्थक

नरेंद्र मोदी की कोई कसर न छोड़ने की सियासी शैली ने यूनिवर्सिटियों और नगर निगम तक के चुनावों को अहम बना दिया है, ये तो फिर उनके गृह राज्य गुजरात की बात है.

2014 के लोकसभा चुनाव का नारा 'अबकी बार, मोदी सरकार' था, बीजेपी सरकार नहीं, वो मुक़ाबला भी मोदी अपना पूरा राजनीतिक करियर दाँव पर लगाकर लड़े थे. उस चुनाव में मोदी जिस आक्रामक तरीक़े से प्रचार कर रहे थे उसमें अब भी कोई बदलाव नहीं आया है बल्कि उसमें सी-प्लेन जैसे नए कारनामे जुड़ गए हैं.

अगर आप 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव को याद करें तो मोदी ऐसे लड़े थे मानो वे ख़ुद ही बिहार का मुख्यमंत्री बनना चाहते हों, बीसियों रैलियाँ करके उन्होंने 'डीएनए', 'गाय' और 'पाकिस्तान में दिवाली' जैसे चुनावी जुमले पूरी आक्रामकता के साथ उछाले थे.

मोदी की शिद्दत उनकी घबराहट नहीं

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गुजरात चुनाव में एक बार ये बात पुख़्ता तरीक़े से स्थापित हो गई कि बीजेपी कहीं नहीं है, मोदी ही मोदी हैं. नोटबंदी और जीएसटी की मार से नाराज़ लोग मानो बीजेपी से चिढ़े थे, लेकिन उन्होंने महात्मा गांधी और पटेल के बाद उभरे अपने सबसे बड़े नेता से नाता तोड़ने का मन बनाया हो, ऐसा नहीं दिखा. मोदी अपनी हार को गुजरात की हार, गुजरातियों की हार के तौर पर कामयाबी से पेश करते दिखे.

गुजरात चुनाव में भी उन्होंने आदतन अपनी पूरी ताक़त झोंक दी, कुछ लोग मोदी के जुझारू अंदाज़ को घबराहट की निशानी समझने की ग़लती कर बैठते हैं, लेकिन आप अगर ग़ौर से देखें तो पाएँगे कि मोदी रोमन ग्लैडियेटर की तरह लड़ने वाले योद्धा हैं, मोदी कभी इसकी चिंता करते नहीं दिखे कि अगर हार गए तो क्या होगा? वे जीतने के लिए लड़ते हैं और उसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं.

संसद का शीतकालीन सत्र टाल दिया गया और तीसेक मंत्रियों की फुल-टाइम ड्यूटी लगा दी गई. ख़ुद मोदी ने इतनी जगह और इतने ज़ोर-शोर से भाषण दिए कि उनका गला बैठ गया, लेकिन इसमें नया कुछ नहीं है.

इस बार नया है राहुल गांधी का अंदाज़

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इसी साल मार्च में समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव के साथ मिलकर लड़े गए यूपी विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी के सियासी सयानेपन के लक्षण दिखने लगे थे. गुजरात चुनाव में कांग्रेस कामयाब हो या नहीं, पर जैसा कि वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा ने लिखा है, "राहुल गांधी अब ऐसे नेता बन चुके हैं जिसकी बात लोग सुनने लगे हैं".

अब से कुछ ही महीने पहले तक कोई ये मानने को तैयार नहीं था कि राहुल कभी मोदी के मुक़ाबले खड़े हो सकते हैं और वो भी गुजरात में? राहुल अब मुक़ाबले में हैं, ये गुजरात चुनाव की सबसे ख़ास बात है. राहुल गुजरात मॉडल और विकास के दावों को संदेह के घेरे में लाने में कामयाब हो गए हैं.

गुजरात का नतीजा चाहे कुछ भी हो, पीएम के घर में घुसकर उन्हें तगड़ी चुनौती देकर राहुल गांधी ने विपक्षी योद्धा की जगह हासिल कर ली है. वो दिन अब नहीं रहे जब नीतीश कुमार या केजरीवाल से उम्मीद की जाती थी कि वे एकीकृत विपक्ष की कमान संभालेंगे क्योंकि राहुल से न हो पाएगा. राहुल ने इस धारणा को बदल डाला है.

बेरहम मोदी और सौम्य राहुल

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मोदी के उग्र, तानों से भरे, तनकर दिए गए भाषणों के मुक़ाबले राहुल ने शांत, संतुलित और सौम्य छवि पेश की है, वे मोदी से उन्हीं की शैली में मुक़ाबला करने की कोशिश न करके एक कॉन्ट्रास्ट पैदा करने में कामयाब रहे हैं.

बीजेपी के चुनाव प्रचार में इंदिरा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और सोनिया गांधी पर जमकर छींटाकशी की गई, 'क्या सोमनाथ मंदिर इनके नाना ने बनवाया था?' से लेकर मोरबी में इंदिरा गांधी की नाक पर रूमाल रखने तक, मोदी ने हमले करने में पूरी बेरहमी दिखाई, लेकिन जवाबी हमले करने के बदले राहुल किसानों, युवाओं और समस्याओं की बात करते रहे.

सोमनाथ मंदिर में विधर्मियों वाले रजिस्टर में नाम दर्ज करने की बात एकमात्र ऐसा मामला था जब राहुल गांधी की टीम ने रिऐक्ट किया और उनकी जनेऊ वाली तस्वीरें जारी की गईं. ये इकलौता मौक़ा था जब राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी हिंदुत्व के मैदान में घसीटने में कामयाब होते दिखे.

हार्दिक फ़ैक्टर

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इस चुनाव में एक बात और साफ़ दिखी कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा ऐसा माहौल बनाने में कामयाब हो चुकी है कि मुसलमानों का कोई नाम तक लेने को तैयार नहीं है. राहुल गांधी ने गुजरात के मुसलमानों का ज़िक्र किसी भाषण में नहीं किया, न ही उन इलाक़ों में गए जहाँ हाशिये पर धकेल दिए गए मुसलमान बसते हैं.

गुजरात चुनाव में राहुल गांधी भले ही उभरकर सामने आए हों, लेकिन मोदी की नींद उन्होंने नहीं, बल्कि हार्दिक पटेल ने उड़ाई है. हार्दिक पटेल पाटीदार अनामत आंदोलन के नेता के रूप में जेल जाकर, देशद्रोह का मुकदमा झेलकर हीरो तो बन ही चुके थे, लेकिन चुनाव पर वे इतना असर डालेंगे, ये किसी ने नहीं सोचा था.

एक नौजवान जिसकी उम्र इतनी नहीं है कि वो ख़ुद चुनाव लड़ सके, चुनाव के दौरान उसकी जनसभाओं में मोदी के बराबर और कई बार मोदी से अधिक लोगों की भीड़ का जुटना इस चुनाव में दिखी एक और नई बात है.

जातीय पहचान की सियासत

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Image caption गुजरात के लिम्बडी में वोट डालने के बाद महिलाएं

इसी से जुड़ी एक और ज़रूरी बात- ऐसा लगा था कि मोदी की हिंदुत्व की राजनीति ने जातीय पहचान की राजनीति की ज़मीन छीन ली है.

यूपी चुनाव के बाद ये थ्योरी पुख़्ता मानी जाने लगी कि मोदी ने जातियों के ऊपर हिंदुत्व का खोल चढ़ा दिया है, लेकिन गुजरात चुनाव में अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश मेवानी और हार्दिक पटेल की तिकड़ी मुक़ाबले में उतरी और इस तरह उतरी कि भाजपा तिलमिला कर कहने लगी कि 'जातिवाद की राजनीति हो रही है'.

पढ़िए: गुजरात में बनिये का दिमाग़ और मियांभाई की बहादुरी

राजनीति के जानकार आज से नहीं, 1989 से मानते रहे हैं कि कमंडल की काट मंडल ही कर सकता है.

कमंडल के लगातार मज़बूत होते जाने के दौर में गुजरात से एक बदलाव देखने को मिला, वो ये कि सामाजिक न्याय की राजनीति में अभी जान बाक़ी है.

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