नज़रिया: सोनिया कांग्रेस का अतीत हैं, राहुल भविष्य

  • 15 दिसंबर 2017
सोनिया गांधी और राहुल गांधी इमेज कॉपीरइट Getty Images

शुक्रवार को संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने से कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने पत्रकारों से कहा - 'माइ जॉब इज़ टू रिटायर'. इसके बाद कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्वीट किया कि सोनिया गांधी ने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ा है, राजनीति नहीं. इसी पृष्ठभूमि में प्रस्तुत है मधुकर उपाध्याय का ये लेख -

इस सवाल का जवाब शायद सोनिया गांधी ही दे सकती हैं कि 132 साल पुरानी राजनीतिक पार्टी में सोनिया गांधी होना कितना आसान या मुश्किल है.

राजनीति की बाक़ी बातें नज़रअंदाज़ कर दें तो इसलिए भी जवाब जानना ज़रूरी है कि इन वर्षों में उन्हें छोड़कर केवल तीन महिलाएं कांग्रेस अध्यक्ष पद तक पहुंचीं. आज़ादी से पहले एनी बेसेंट और आज़ादी के बाद सरोजिनी नायडू और इंदिरा गांधी.

सोनिया गांधी इसका जवाब देंगी या नहीं, वही जानें. या जवाब देंगी भी तो कब? किस शक्ल में?

राजनीति में तात्कालिकता का अपना महत्व होता है इसलिए विश्लेषक की तरह इस पर एक फ़ौरी टिप्पणी, क्योंकि वरिष्ठ नेता पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन को 'कांग्रेस में एक युग का अंत' मानते हैं.

हाड़-मांस के किसी पुतले की तरह ख़ामियां और खूबियां सोनिया गांधी में यक़ीनन थीं. रिकॉर्ड उन्नीस साल कांग्रेस की अध्यक्षता ने इन दोनों को खोलकर सामने रख दिया.

कुछ दिखा, कुछ नहीं दिखा. पर जितना दिखा, उनके कार्यकाल के प्राथमिक आकलन के लिए पर्याप्त है. पहले एक नज़र ख़ूबियों पर.

इतना तो सोनिया गांधी के धुर आलोचक भी मानते हैं कि केवल प्रधानमंत्री की बहू या प्रधानमंत्री की पत्नी होना उन राजनीतिक उपलब्धियों के लिए ठोस आधार नहीं हो सकता जो उनके खाते में दर्ज हैं.

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Image caption राजीव गांधी और सोनिया गांधी

कांग्रेस को अपने पैरों पर खड़ा किया

नेहरु-गांधी परिवार का सदस्य होने की राजनीतिक बैसाखी इसमें मददगार हो सकती है लेकिन सिर्फ़ इतना इस क़दर मदद नहीं कर सकता कि कोई कामयाबी के साथ उन्नीस साल पार्टी के शिखर पर रहे.

बैसाखियां सुनिश्चित नहीं कर सकतीं कि नब्बे के दशक में बिखराव का संकट झेल रही पार्टी दस साल से कम समय में सत्ता में आ जाए. बल्कि अगला चुनाव भी जीत ले.

संभवतः यह एक वजह रही होगी कि लगातार सालों साल उन्हें विश्व की दस सबसे प्रभावशाली महिलाओं में गिना जाता रहा.

सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले, 1996 में पार्टी लोकसभा चुनाव हारकर सत्ता से बाहर हो चुकी थी. इस पराजय के बाद पार्टी चाहती थी कि सोनिया ज़िम्मेदारी संभालें लेकिन पांच साल पूर्व राजीव गांधी की हत्या ने उन्हें इससे दूर ही रखा.

दो साल बाद 1998 में एक बार उन्होंने यह ज़िम्मेदारी ली तो गंभीर समावेशी राजनीति के साथ तिकड़म, अंदरूनी दांवपेंच, भितरघात और चाटुकारिता की हदें तोड़ देने वाली कांग्रेस एकजुट तो हुई ही, छह साल बाद 2004 में सत्ता में आ गई.

विपक्ष सोनिया गांधी के नौसिखिएपन पर आस लगाए बैठा था. उम्मीद थी कि कांग्रेस बिखर जाएगी, लेकिन हुआ उलटा. सोनिया गांधी ने समान विचारधारा वाले दलों को साथ लाकर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) बनाया.

राहुल

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कांग्रेस का 'फ़ैविकोल'

सोनिया गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती उनका विदेशी मूल का होना था. बाहर जो विरोध था, था ही; कांग्रेस के अंदर भी उथल-पुथल मची हुई थी. कई बड़े नेता पार्टी छोड़कर जा रहे थे. अस्थिरता थी.

उस समय राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह कांग्रेस के ख़िलाफ़ था. हालांकि पार्टी की इस हालत का ज़िम्मेदार उसका नेतृत्व ही रहा, इसे सोनिया गांधी की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है कि उन्होंने कांग्रेस को बांधे रखा.

इस प्रक्रिया में तमाम टीकाकार उन्हें और दस जनपथ को "फ़ैविकोल" कहने लगे, जिसके हटने पर कांग्रेस का शीराज़ा बिखर जाने का खौफ़ अनिवार्य होता गया. इसी अनिवार्यता का चोला पहनकर सोनिया गांधी की ख़ामियां मंच पर दाख़िल हुईं.

सोनिया के राजनीतिक जीवन की पांच प्रमुख विफलताएं देखी जाएं तो उनमें से एक स्वास्थ्यजनित थी पर शेष चार की ज़िम्मेदार वह ख़ुद हैं.

संप्रग के दूसरे कार्यकाल से सोनिया गांधी ने स्वास्थ्य कारणों से अपनी सार्वजनिक उपस्थिति समेटना शुरू कर दिया था. सत्तर साल की उम्र में वह सक्रिय राजनीति से पूरी तरह हट जाना चाहती थीं. यहां तक कि 2019 का चुनाव भी नहीं लड़ने के पक्ष में नहीं थीं.

कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी की स्वीकार्यता में विलंब ने उन्हें ऐसा करने से रोका. सोनिया नहीं चाहती थीं कि पार्टी के कार्यकर्ता और नेता फिर उनके पास पहुंच जाएं, जैसा पिछले आम चुनाव के बाद हुआ था. प्रियंका गांधी को लाने के नारे उठने लगें.

'सोनिया गांधी कांग्रेस के लिए फ़ेविकोल हैं'

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सोनिया की बात 'पत्थर की लकीर'

दस जनपथ पर इस बार जमावड़ा न होने से लगता है कांग्रेस ने मान लिया है कि "सोनिया कांग्रेस का अतीत हैं, राहुल भविष्य."

अपने पसंदीदा नेताओं की चौकड़ी बनाना और उन्हीं से घिर जाना सोनिया गांधी के नेतृत्व की एक बड़ी ख़ामी रही और इसका ख़ामियाज़ा उन्हें भुगतना पड़ा. इसने चाटुकारिता को पार्टी में नए मुकाम तक पहुंचाया.

पार्टी चलाने में एक प्रकार की निरंकुशता भी सोनिया गांधी की ख़ामियों में शामिल की जाएगी, जहां सही-ग़लत का कोई अर्थ नहीं रह गया. उनके शब्द को अंतिम माना जाने लगा.

इसी का नतीजा रहा कि पार्टी के भीतर दस जनपथ सवाल-जवाब से परे मान लिया गया. उस पर प्रश्न उठाना विद्रोह समझा गया. एक वरिष्ठ नेता ने कहा, सोनिया की बात "पत्थर की लकीर" है. उसे न बदला जा सकता है, न मिटाया जा सकता है.

सीधे तौर पर सत्ता में न होते हुए शक्तियों का केंद्रीकरण और प्रधानमंत्री के अलावा "दूसरा सत्ता केंद्र" बनाने का आरोप भी सोनिया गांधी पर अकारण नहीं लगा. मनमोहन सिंह के संप्रग के दस साल के शासनकाल में इसके नमूने निरंतर देखने को मिले.

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सोनिया गांधी में एक ख़ामी राजनीतिक साहस की कमी रही. टीकाकारों का कहना है कि राहुल गांधी के राजनीतिक प्रक्षेपण को लेकर वह उस तरह निर्णायक नहीं रहीं, जैसी राजीव को लेकर इंदिरा गांधी थीं.

इसमें "पुत्र-मोह" शामिल है और यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि 132 साल के अनुभव वाली कांग्रेस पार्टी को 132 करोड़ लोगों के देश में परिवार से इतर किसी अन्य में नेतृत्व की क्षमता क्यों नहीं दिखाई पड़ती?

सोनिया गांधी के राजनीतिक किरदार का बेहतर आकलन संभवतः 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद ही हो सकेगा. तभी पता चलेगा कि सोनिया के संदर्भ में ख़ूबियों और ख़ामियों वाले तराज़ू का कौन सा पलड़ा भारी है.

क्या सोनिया कांग्रेस को टूटने से बचा पाएंगी?

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