नज़रियाः राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती वो खुद हैं

  • 16 दिसंबर 2017
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राहुल गांधी अब नए कांग्रेस अध्यक्ष हैं. गुजरात विधानसभा चुनाव में दिखा कि राहुल गांधी ने लोगों को संबोधित करने की क्षमता विकसित कर ली है.

केंद्रीय सत्ता पक्ष भी अब उन्हें हल्के में नहीं लेता दिख रहा है.

राहुल को इस नई ज़िम्मेदारी के मायने क्या हैं और आने वाले वर्षों में कांग्रेस को इससे क्या हासिल हो सकता है, इस पर बीबीसी ने वरिष्ठ पत्रकार कल्याणी शंकर से बातचीत की.

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पढ़ें नज़रिया-

गुजरात चुनाव में राहुल गांधी को नये अवतार में देखा गया. पहले जो "पप्पू" बोलते थे, वो ग़ायब हो गया है. उसकी जगह विपक्ष के एक विश्वसनीय नेता के रूप में उनकी पहचान हुई.

गुजरात चुनाव में अधिक सीटें मिलने की उम्मीदें थी लेकिन एग्जिट पोल के नतीजों के बाद कांग्रेस में थोड़ा उत्साह कम हुआ है क्योंकि सभी एग्जिट पोल में उन्हें पहले की तरह ही सीटें मिलने की बात की गई है.

कांग्रेस का अध्यक्ष पद राहुल गांधी के लिए "कांटों भरा ताज" है. उनकी पार्टी सत्ता में नहीं है. लोकसभा में सीटें कम हैं. कांग्रेस एक के बाद एक विधानसभा चुनाव हारती जा रही है.

हालांकि गुजरात चुनाव में उनकी शख्सियत पहले से बेहतर हुई है. लेकिन उनके लिए मुश्किलें बहुत हैं.

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Image caption अल्पेश ठाकोर के साथ राहुल गांधी

राहुल के सामने यक्ष प्रश्न

राहुल गांधी कह रहे हैं कि मोदी ने युवाओं को नौकरी नहीं दी. सिर्फ नरेंद्र मोदी को कोसने से काम नहीं चलेगा.

युवाओं को नौकरी और उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए राहुल गांधी योजना क्या है? इस पर उनका नज़रिया क्या है? कैसे करेंगे?

राजीव गांधी 21वीं सदी की बात करते थे. उनके पास एक विज़न था. नेहरू, इंदिरा, संजय सभी के पास एक विज़न था. राहुल गांधी की आर्थिक नीति, विदेश नीति क्या है? उन्हें अपना विज़न बताना होगा? यह आसान काम नहीं है और यह राहुल गांधी के सामने एक बड़ी चुनौती भी है.

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Image caption लालू यादव, रघुवंश प्रसाद, शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल

पुरानी पीढ़ी बड़ी चुनौती

इसके अलावा, पुरानी पीढ़ी के सोनिया गांधी के निकट सहयोगी भी राहुल के लिए बड़ी चुनौती साबित होंगे. जैसा कि कांग्रेस के कई लोग और राहुल के समर्थक बोलते थे कि ये वे ही लोग हैं जो अब तक राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने की राह में रोड़े अटकाते थे.

अब राहुल अध्यक्ष बन गए हैं तो उन्हें अनुभवी लोग भी चाहिए और युवा भी. दोनों को मिला कर आगे बढ़ना मुश्किल काम है.

वो किसको रखेंगे किसको नहीं रखेंगे ये आने वाला वक्त बताएगा. ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, दीपेंद्र हुड्डा, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, सुष्मिता देव जैसे वंश-परम्परा के लोग हैं. इनके आगे पीछे के सभी लोग इसी तरह वंश परंपरावाद वाले लोग ही हैं.

हालांकि राहुल गांधी ने गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान अशोक गहलोत जैसे लो-प्रोफाइल नेता को अपने साथ रखा. उन्होंने तीनों जाति के नेताओं, हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश, को कांग्रेस के साथ जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई. उन्हें पता है कि अनुभवी लोगों को भी साथ रखना है.

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Image caption अहमद पटेल

क्या राहुल की लिस्ट में नहीं हैं अहमद पटेल?

सुनने में तो यहां तक आ रहा है कि अहमद पटेल और मोती लाल वोहरा जैसे नेता राहुल की लिस्ट में नहीं है. 65-70 से अधिक उम्र के नेताओं को पार्टी में पद नहीं दिया जाएगा.

हालांकि राहुल अपनी टीम में पी चिदंबरम, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल जैसे लोगों को रख सकते हैं. लेकिन राहुल गांधी को नई और पुरानी पीढ़ी को साथ लेकर चलना बहुत मुश्किल होगा.

पार्टी को खड़ा करना राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. गुजरात जीतना ज़रूरी है. कांग्रेस पंजाब और कर्नाटक के अलावा बाकी दो राज्य की सत्ता में ही सिमट कर रह गई है. हिमाचल में हारने की संभावना है और कर्नाटक में अगले साल ही चुनाव होने हैं.

पार्टी में ज़मीनी नेता नहीं हैं. पार्टी में लोग उत्साहित होकर काम नहीं कर रहे हैं. प्रदेश कांग्रेस कमिटी (पीसीसी), जिला कांग्रेस कमिटी (डीसीसी) काम नहीं कर रही.

राहुल गांधी की योजना क्या है इसका उन्होंने खुलासा भी नहीं किया है. 2019 लोकसभा चुनाव तक इतने सारे काम अकेले राहुल गांधी के लिए करना बहुत मुश्किल होगा.

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Image caption सोनिया गांधी के साथ राहुल गांधी

सोनिया का साथ अभी अहम

सोनिया गांधी अभी पार्टी में बनी रहेंगी. वो यूपीए की चेयरपर्सन भी बनी रहेंगी. पार्टी मेंटर के रूप में भी काम करेंगी. यूपीए की सहयोगी पार्टियां भी हैं.

ममता बनर्जी, लालू प्रसाद यादव, शरद पवार सभी वरिष्ठ नेता हैं. सोनिया गांधी की बात वो मानते हैं लेकिन राहुल गांधी की बात वो मानेंगे इसमें संदेह है. सीताराम येचुरी ने बोल भी दिया कि सोनिया गांधी के पार्टी अध्यक्ष नहीं रहने से यूपीए टूट जाएगी.

कांग्रेस को और भी सहयोगियों की ज़रूरत है. आज की तारीख़ में कांग्रेस कहां कहां गठबंधन बना सकती है ये देखने की ज़रूरत है. मजबूत गठबंधन के बिना 2019 में कांग्रेस का केंद्र की सत्ता में आना असंभव है. कांग्रेस मजबूत होगी तभी उससे पार्टियां जुड़ेंगी.

2019 से पहले राज्यों में जीतने का फॉर्मूला ढूंढना होगा. भाजपा का वोट तो केवल 30 फीसदी ही है. कांग्रेस को मोदी विरोधी, भाजपा विरोधी, एनडीए विरोधी गठबंधन को साथ रखने का तरीक़ा ढूंढना होगा.

एनडीए के वोट को बांटना होगा तभी 2019 में अच्छे चुनाव नतीजे मिलेंगे.

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Image caption ज्योतिरादित्य सिंधिया और राहुल गांधी

जातिवाद, भ्रष्टाचार और परिवारवाद

5000 साल से जातिवाद इस देश में बना हुआ है. मोदी हों या राहुल या अन्य क्षेत्रीय दल, जातिवाद के बिना भारत में राजनीति नहीं चलेगी. आप जब टिकट देते हैं तो सबसे पहले जाति ही तो देखी जाती है.

सभी बोलते हैं कि जातिवाद को बढ़ाएंगे नहीं लेकिन ऐसा करते नहीं. पार्टी में भ्रष्ट नेताओं से वो कैसे डील करेंगे यह भी एक सवाल है? बोलना एक बात है करके दिखाना दूसरी बात.

राहुल गांधी से जब अमरीका में यही सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मुझसे ही क्यों ये सवाल पूछा जाता है. अमिताभ बच्चन भी तो हैं. जम्मू-कश्मीर में मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी भी हैं. और इसी तरह अन्य पार्टियों में भी यह चल रहा है.

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24x7 नेता बनना होगा

राहुल के सामने सोनिया गांधी से अधिक मुश्किलें हैं. गुजरात में वो दो-तीन महीने लगातार काम करते रहे लेकिन बीच बीच में वो अचानक गायब हो जाते हैं. विदेश चले जाते हैं. मध्य प्रदेश में किसानों का विरोध चल रहा था वो बाहर चले गए. उन्हें 24x7 नेता बनना होगा.

राहुल गांधी से मिलना लोगों के लिए बहुत मुश्किल है. उन्हें लोगों से और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से मिलना होगा. इंदिरा गांधी के सामने, कार्यकर्ता पूरे देश की समस्याओं को लेकर आते हैं. नेताओं का काम सबसे पहले तो आम जनता से मिलने का होना चाहिए.

उनके पास राज्य स्तर पर नेता नहीं हैं. दूसरी पंक्ति का नेता तैयार करना होगा. नेहरू जी के समय राज्य स्तर के बड़े नेता हुआ करते थे.

उनके दौर में बंगाल में बिधान चंद्र रॉय, तमिलनाडु में के कामराज, आंध्र प्रदेश में नीलम संजीव रेड्डी और महाराष्ट्र में यशवंतराव बलवंतराव चाव्हाण जैसे बड़े नेता थे.

लेकिन इंदिरा गांधी के आने के बाद से पार्टी में दूसरे स्तर के नेता नहीं बने और सोनिया गांधी ने भी इसे ही आगे बढ़ाया.

राहुल गांधी को राज्य स्तर पर पार्टी को मजबूत करना होगा. उसके बाद राज्य स्तर के नेता को दायित्व दें. युवाओं, नई पीढ़ी को कैसे अपनी ओर खींचेंगे इस पर भी योजना बनानी होगी.

ये साफ़ करना होगा कि क्या पहले जैसा ही भ्रष्टाचार का युग लौटेगा? भारत के भविष्य के लिए नई योजनाएं बनानी होंगी.

20 सूत्रीय कार्यक्रम जैसी ही कोई नई और युवाओं, नई पीढ़ी को लुभाने वाली योजना लेकर आना होगा.

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कांग्रेस का भविष्य?

कांग्रेस के पास न केवल सत्तारूढ़ राज्यों की संख्या कम हो गई है बल्कि चुनाव लड़ने के लिए पैसों की भी काफी कमी हो गई है. संगठनात्मक स्तर पर भी आज पार्टी कमजोर हो गई है.

इसे फिर से एकजुट करना होगा. लोगों के पास जाना होगा.

सोनिया गांधी को पार्टी के नेताओं ने समझा रखा था कि मोदी अपने चुनावी वादे पूरे नहीं कर पाएंगे तो जनता वापस कांग्रेस की ओर रुख़ करेगी. पार्टी हाथ पर हाथ रखे बैठी रही, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

ग्रास रूट लेवल की राजनीति करनी होगी. इसके बगैर कांग्रेस का भविष्य नहीं है.

'सोनिया कांग्रेस का अतीत हैं, राहुल भविष्य'

(बीबीसी संवाददाता अभिजीत श्रीवास्तव के साथ बातचीत पर आधारित)

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