ब्लॉग: नरोदा पाटिया की शरीफ़ा बीबी को दूसरा ख़त

  • 17 दिसंबर 2017
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Image caption सांकेतिक तस्वीर

प्रिय शरीफ़ा बीबी,

पता नहीं तुम अब कहाँ और किस हाल में हो. हो भी या नहीं?

ठीक पाँच साल पहले 20 दिसंबर 2012 को मैंने तुम्हें पहला ख़त लिखा था और समझाया था कि होश की दवा खाओ और भूल जाओ कि तुम्हारे साथ मार्च 2002 में क्या हुआ.

मुझे याद है अहमदाबाद की नरोदा पाटिया बस्ती में तुम न जाने कैसे बौखलाई हुई सी फिर रही थीं कि तुमसे मेरी मुलाक़ात हो गई.

उन पतली-पतली गलियों में तुम जैसे ही बौखलाए, हैरान, क्रोधित, हताश, सन्न, लाचार और पस्तहिम्मत लोग मिलते हैं. इन सबके पास अपनी-अपनी डरावनी कहानियाँ हैं.

इन्होंने अपने परिवार के लोगों को, पड़ोसियों को सिर पर भगवा पटके पहने छुरेबाज़ों के हाथों मारे काटे जाते और ज़िंदा जलाए जाते देखा है. सड़कों पर सूरज की रोशनी में सरेआम बलात्कार होते देखे हैं.

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लोकतंत्र का उत्सव

तुम भी तो 28 फ़रवरी 2002 की गवाह रही थीं जब दूसरे लोगों के साथ साथ तुम्हारे सबसे बड़े बेटे को भी तुम्हारी आँखों के सामने ज़िंदा जला दिया गया था. तुमसे मुलाक़ात के बाद मैं तुम्हारे बारे में ही सोचता रहा था जबकि पूरे राज्य में लोकतंत्र का उत्सव मनाया जा रहा था.

नरेंद्र भाई मोदी तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बनने जा रहे थे और दो साल बाद ही अपने भीतरी-बाहरी विरोधियों को परास्त कर वो देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने वाले थे.

पर उन्हें तुम्हारे वोट की ज़रूरत न तब थी और न अब है. उनके लिए तुम भारतवर्ष की विकास-गाथा में एक ग़ैरज़रूरी फ़ुटनोट हो — ख़ुशियों के नशे में डूबी विकास और लोकतंत्र की बारात के पीछे पीछे मैले-कुचैले चीथड़े पहने, हाथ फैलाकर चलने वाला कोई फटेहाल कंगला, कोई भिखारी, कोई अपाहिज, लगातार खाँसता हुआ कोई टुकड़खोर बीमार. इस बारात में शामिल लोगों के लिए तुम लोकतंत्र का अभिशाप हो.

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'गोधरा का बदला तुम्हारे बेटे से लिया गया'

इस बारात के पीछे चलना तुम्हारी मजबूरी है, शरीफ़ा बीबी. लोकतंत्र के दूल्हे को तो पता भी नहीं है कि उसकी बारात में शामिल बाराती विकास के पकवान खाकर जिन पत्तलों को चलते-चलते फेंकते हैं उन्हें उठाकर तुम चाटती हो.

ख़ुश रहो कि तुम जैसे लोगों को मनरेगा मिल रहा है. पर तुम भी उनसे कहाँ कुछ उम्मीद रखती थीं? उनसे तुम्हारी उम्मीदें तो तभी ख़ुश्क हो गई थीं जब गोधरा का बदला तुम्हारे जवान बेटे से लिया गया.

मगर तुमने उम्मीद रखी थी काँग्रेस के चश्म-ए-चिराग़ राहुल गाँधी से. उनकी सौम्य और ममतामयी माँ सोनिया गाँधी से. पंडित नेहरू का अलम उठाने वाली काँग्रेस पार्टी के धर्मनिरपेक्ष नेताओं से. तुम्हें तो लगता था कि राहुल गाँधी तुम्हारे ख़ैर ख़्वाह होंगे. तुम्हारे दुख-सुख पूछने आएँगे. तुम्हारे साथ तुम्हारे मातम में शामिल होंगे. तुम्हारे आँसू पोछेंगे. तुम्हें भरोसा दिलाएँगे कि लोकतंत्र की फ़तह के जलसे में तुम्हें भी पकवानों से भरी थाली मिलेगी.

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पर क्या हुआ शरीफ़ा बीबी?

नरेंद्र भाई मोदी और अमित शाह की भगवा मशीनरी से टक्कर दिलाने के लिए राहुल गाँधी की पार्टी ने उनका मेकअप बदल डाला. सेक्युलर नेहरू के पड़पोते को काँग्रेसियों ने 'शिवभक्त' और 'जनेऊधारी हिन्दू' बना दिया. और अब इस दुधमुँहे 'बाबालोग' को रातों रात भारत की सबसे पुरानी पार्टी का अध्यक्ष भी बना दिया गया है.

अब देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों के सरदारों में लोकतंत्र के बेहतरीन नायक बनने की होड़ नहीं बल्कि ख़ुद को दूसरे से बेहतर हिंदू दिखाने की दौड़ शुरू हो गई है. इस दौड़ में तुम सबसे पीछे खड़ी होकर बक-अप, बक-अप करो तो अपनी ख़ुशी से करो, तुमसे समर्थन माँगने कोई नहीं आएगा. क्योंकि जो तुम्हारे पास आएगा उसे डर है कि तुम उससे भी सवाल करोगी क्योंकि तुम सवाल बहुत करती हो.

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पीट-पीट कर मारने वालों को सज़ा क्यों नहीं?

इस दौड़ की शर्त ही ये है कि इसमें शामिल खिलाड़ी कभी नहीं पूछेंगे कि बंगाल से राजस्थान के राजसमंद मज़दूरी करके पेट भरने आए अफ़राजुल की पीठ पर शंभुलाल रैगर ने धोखे से गैंती क्यों उतार दी? वो नहीं पूछेंगे कि पहलू ख़ान को पीट-पीट कर मार डालने वालों को सज़ा क्यों नहीं मिलेगी? वो ये सवाल नहीं करेंगे कि अख़लाक़ की हत्या के अभियुक्त के शव को तिरंगे में क्यों लपेटा जाता है और क्यों उसे इस देश का संस्कृति मंत्री शहीदों की तरह सम्मान देकर नमन करता है.

पर तुम दिल छोटा मत करो, शरीफ़ा बीबी. ऐसा करना पड़ता है. ये लोकतंत्र का जश्न है. बहुमत को साथ लेने के लिए बहुमत की बात करनी पड़ती है. उनके जैसा दिखना पड़ता है. मंदिर मंदिर जाना पड़ता है. जनेऊ का प्रदर्शन करना पड़ता है.

तुम क्या सोच रही थी कि गुजरात में ऐन चुनाव प्रचार के बीच राहुल गाँधी क्रोशिए की टोपी पहने मुसलमानों का हालचाल लेने नरोदा पाटिया और बेस्ट बेकरी जैसी बस्तियों में घूमते?

बावली हुई हो क्या, शरीफ़ा बीबी?

(नोट: शरीफ़ा बीबी एक काल्पनिक चरित्र नहीं है.)

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