नज़रिया: संघर्ष कर रही कांग्रेस को कैसे उबार सकते हैं राहुल गांधी?

  • 17 दिसंबर 2017
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राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए हैं और अब उनके सामने आनेवाले समय में कर्नाटक, मिज़ोरम और मेघालय में कांग्रेस को बचाने की ज़िम्मेदारी है. ऐसे में उनके सामने कई चुनौतियां हैं. उन्हें लगातार चुनाव में ख़राब प्रदर्शन कर रही पार्टी को जीतने वाली पार्टी में बदलना है साथ ही संगठन में अपनी छवि को भी एक नया रूप देना है. राहुल गांधी की चुनौतियों के बारे में बीबीसी ने वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा से बातचीत की.

पढ़ें उनका नज़रिया उन्हीं के शब्दों में :

कठिनाइयां जब बहुत बढ़ जाती हैं तो जो इसे झेलने में जो सक्षम होता है वही अच्छा काम कर पाता है. मुश्किलों में कभी-कभी लीडरशिप उभरकर निकलती है. राहुल को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया. अब उन्हें जनता की अदालत में जाकर अपना केस जीतना है.

यह किसी भी लीडर के लिए टेस्ट होता है. उनकी अध्यक्षता पर जनता की वही मुहर मानी जाएगी. राहुल गांधी को अपनी पार्टी को चुनाव में जीतने का हुनर अब सिखाना पड़ेगा और पार्टी में वो शक्ति लानी पड़ेगी कि वो चुनाव जीत सके.

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'राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती वो खुद हैं'

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'आज कांग्रेस कमज़ोर ज़रूर है'

बीजेपी की तुलना में कांग्रेस पार्टी संस्था के तौर पर बहुत कमजोर नज़र आती है. यह गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान भी प्रत्यक्ष रूप से दिखा. जहां कांग्रेस और राहुल अच्छे से चुनाव लड़े. लेकिन आख़िरी मील की रेस में कांग्रेस पार्टी कितनी तेज़ भाग पायेगी, उसमें वो पिछड़ती दिखी, अगर एग्ज़िट पोल की मानें तो. हालांकि अभी नतीजे आना बाकी है. 18 तारीख़ को ही पता चल सकेगा कि राहुल के लिए आने वाले दिनों में चुनौतियां आखिरकार कितनी बड़ी हैं.

ऐसा लगता था कि कांग्रेस संस्था के तौर पर तैयार नहीं है. अगर गुजरात में कांग्रेस की हार भी हाती है, लेकिन वो हारने के बावजूद अच्छे आंकड़ों से अपनी इज़्ज़त बचा लेती है तो यह राहुल की अच्छी शुरुआत होगी.

राहुल के लिए पार्टी को नया स्वरूप देना, नई शक्ति देना और ज़मीन पर ऐसे कार्यकर्ता बनाना जो भाजपा के कार्यकर्ताओं को मुकाबला दे सकें सबसे बड़ी चुनौती है. अपने 132 सालों के कांग्रेस के इतिहास में और खासकर आज़ादी के बाद कांग्रेस इतनी कमज़ोर कभी नहीं थी.

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'इतनी चुनौती सोनिया के सामने भी नहीं थी'

सोनिया गांधी जब 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष बन कर आई थीं तब भी कांग्रेस बिखर रही थी, लेकिन उस समय भी संसद में ऐसी स्थिति नहीं थी. लिहाज़ा सोनिया के सामने इतनी बड़ी चुनौती नहीं थी.

उन्होंने खुद ही कहा कि जब वो अध्यक्ष बनी थीं तब केवल तीन प्रांतों में कांग्रेस की सरकार थी और केंद्र की सत्ता से भी वो बाहर थी. लेकिन 1998 से लेकर 2004 तक कांग्रेस पार्टी केंद्र की सत्ता में आ गई.

दूसरी बार भी यूपीए ने सरकार बनाई और साथ ही 21 प्रांतों में भी अपनी सरकार बना ली. क्या ये जादू राहुल गांधी दिखा सकेंगे? ये बड़ा प्रश्न है.

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क्या राहुल के व्यक्तित्व में बदलाव हुआ?

विज्ञान की भाषा में व्यक्तित्व परिवर्तन तो संभव नहीं है, लेकिन राजनीतिक तौर पर किसी राजनेता का नज़रिया तब बदलता है जब जनता को देखने का उसका अंदाज़ बदल जाता है. गुजरात में वो इसमें सफल हुए हैं.

लोग उन्हें तन्मयता से सुनते थे. वो ऐसे मुद्दे पर बोलते थे जो लोगों के दिलों से जुड़े हुए थे. अपने प्रचार में वो जनता से जुड़े मुद्दे लगातार उठाते रहे. इसकी वजह से लोगों ने उन्हें एक नए नज़रिये से देखना शुरू कर दिया जो उनकी लीडरशिप की स्वीकृति जैसा है.

अगर यह वोट में तब्दील हो जाए तो कांग्रेस के लिए अच्छा रहेगा. लेकिन अगर ये वोट में नहीं बदलता, लेकिन सीटें बढ़ती हैं तो भी आगामी चुनावों में पार्टी के मनोबल को बढ़ाएगा.

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'राजनीति में किसी को ख़ारिज नहीं किया जाना चाहिए'

राजनीति का सिद्धांत है कि किसी भी पार्टी या राजनेता को ख़ारिज नहीं करना चाहिए. अटल बिहारी वाजपेयी 1984 में माधव राव सिंधिया से चुनाव हार गए. वो बाद में देश के प्रधानमंत्री बने.

2004 में चंद्रबाबू हारे, लेकिन 2014 में वो दोबारा जीत कर आ गए. क्या कोई ये सोचता था कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे. वो आज की तारीख़ में कई तबकों में सक्षम प्रधानमंत्री माने जाते हैं. किसी भी नेता को यह मान लेना कि वो ख़त्म हो गया है, ग़लत होता है.

(बीबीसी संवाददाता मानसी दाश से बातचीत पर आधारित. ये लेखक के निजी विचार हैं)

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