ब्लॉग: गुजरात चुनाव में मुद्दों पर भारी पड़े मोदी

  • 18 दिसंबर 2017
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गुजरात के परिणाम साफ़ दिखा रहे हैं 'नरेंद्र बाहुबली' चुनाव जीतना जानते हैं. ये चुनाव बीजेपी नहीं लड़ी, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लड़े, देश की संसद का सत्र रोक कर जी-जान से लड़े.

कोई कसर न छोड़ने की मोदी की सियासी शैली गुजरात में काम कर गई, मुद्दों की बात फिर कभी होगी, अभी तो 'जो जीता वही सिकंदर'.

2012 में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते जो चुनाव हुए थे उसमें बीजेपी ने 115 सीटें जीती थीं, अब जबकि गुजरात में बीजेपी के पास मुख्यमंत्री पद के लिए एक भी कद्दावर नेता नहीं है, उसका करीब 100 सीटें जीतना ख़राब प्रदर्शन नहीं कहा जाएगा, ख़ास तौर पर तब जबकि ये पार्टी की छठी जीत है.

लगातार सरकार में रहने का नुक़सान यानी एंटी इंकम्बेंसी अपने-आप एक बड़ा फ़ैक्टर हुआ करता है, लेकिन गुजरात में मोदी उसकी काट करने में सफल रहे, वे ऐसे लड़े जैसे कोई मुख्यमंत्री चुनाव लड़ता है, उन्होंने एहसास दिलाया कि राज्य में उनका इन्वॉल्वमेंट ज़रा भी कम नहीं हुआ है.

बड़े मुद्दे जो हवा हो गए

उनकी ये कहानी लोगों ने सुनी और मानी कि उनकी हार गुजरात की, गुजरातियों की और हिंदुओं की हार है जबकि कांग्रेस की जीत पाकिस्तानियों की और गुजरात से नफ़रत करने वालों की जीत होगी.

गुजरात के नतीजों पर क्या बोले पाकिस्तानी?

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ये ऐसा नैरेटिव था जो चार-पाँच बड़े मुद्दों पर भारी पड़ गया, ख़ास तौर पर चंद आख़िरी दिनों में जब 'नीच आदमी', 'पाकिस्तानी साज़िश' और 'मुख्यमंत्री अहमद मियाँ पटेल' जैसे जुमले गूंजने लगे.

दो सामाजिक आंदोलन ऐसे थे जिनमें 'हिंदुत्व की काट' करने की क्षमता विश्लेषकों को दिख रही थी, पहला पाटीदार आंदोलन और दूसरा अल्पेश ठाकोर के नेतृत्व वाली ओबीसी गोलबंदी. इन दोनों आंदोलनों में उमड़ने वाली भीड़ और अल्पेश ठाकोर के कांग्रेस में शामिल होने के बावजूद मोदी बीजेपी की नैया पार ले गए.

इन दोनों का मुख्य चुनावी सुर यही था कि पटेल और पिछड़े बीजेपी से नाराज़ हैं, लेकिन उनकी नाराज़गी पर आख़िरकार मोदी का इमोशनल चुनाव प्रचार हावी हो गया, पटेलों को आरक्षण देने का राहुल गांधी का वादा भी काम नहीं आया.

गुजरात की 57 साल की राजनीति का इतिहास

नोटबंदी और जीएसटी दो ऐसे मुद्दे थे जिनसे कांग्रेस को बहुत उम्मीद थी, उन्हें लगा था 'गब्बर सिंह टैक्स' का नारा काम कर जाएगा, गुजरात के सूरत जैसे बड़े शहर में जहाँ विधानसभा की 16 सीटें हैं, वहाँ बहुत बड़े पैमाने पर जीएसटी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी हुए थे, लेकिन ऐसा लग रहा है कि सूरत जैसे कारोबारी शहर में भी लोगों की नाराज़गी को मोदी ने कांग्रेस के वोट में बदलने से रोक लिया है.

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चुनाव प्रचार से विकास ग़ायब

2014 का लोकसभा चुनाव 'गुजरात मॉडल' यानी विकास के नाम पर लड़ने वाले मोदी के चुनाव प्रचार से विकास पूरी तरह ग़ायब हो गया, उसकी जगह पाकिस्तान सुनाई देने लगा, कांग्रेस विकास के सवाल को उठाती तो रही लेकिन उसका असर हुआ हो ऐसा नहीं लगता.

एक और बड़ा मुद्दा था जिस पर राहुल गांधी ने ख़ासा ध्यान दिया, वह था किसानों को कपास और मूंगफली की सही कीमत दिलाने का. राहुल गांधी ग्रामीण सभाओं में किसानों के हितों का मुद्दा उठाते रहे और ज़ोर-शोर से उठाते रहे. शायद ये उसी का असर था कि ग्रामीण इलाक़ों में कांग्रेस का प्रदर्शन बीजेपी से बेहतर रहा है लेकिन गुजरात जैसे शहरीकृत राज्य के लिए वह नाकाफ़ी रहा.

मोदी के 'गुजरात मॉडल' का सच क्या है?

गुजरात में मोदी ग़लत बोले या ग़लती से बोले

मंदिरों में दर्शन के मामले में राहुल गांधी ने मोदी को कड़ी टक्कर दी, लेकिन यह भी साबित हो गया कि हिंदुत्व पर असली दावा तो मोदी का ही है.

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गुजरात चुनाव और मंदिर में राहुल गांधी!

कुल मिलाकर, कांग्रेस ने 2012 के मुक़ाबले 20 अधिक सीटें हासिल की हैं जिससे उसका हौसला तो बढ़ेगा, लेकिन पार्टी के तौर पर उसका अपना जनाधार शायद ही बढ़ा है, ये तीन नए युवा नेताओं--हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी--की कमाई है.

कांग्रेस के लिए एक ही सांत्वना की बात है कि उसके नए अध्यक्ष राहुल गांधी मोदी के घर में तगड़ी लड़ाई लड़के विपक्ष का नेता होने का हक़ हासिल कर चुके हैं, अब शायद ऐसा सुनने को न मिले कि 2019 के चुनाव में विपक्ष का नेतृत्व अरविंद केजरीवाल या ममता बैनर्जी करेंगी.

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इस चुनाव से ज़ाहिर हो गया है कि अगले साल होने वाले राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में गुजरात जैसा ही प्रचार देखने को मिलेगा, मुद्दे हवा होंगे और मोदी हावी होंगे क्योंकि कर्नाटक छोड़कर बाक़ी राज्यों में भाजपा को सत्ता बचानी है.

राहुल गांधी को सोचना होगा कि ध्रुवीकरण की राजनीति की काट वे कैसे कर पाएँगे?

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