नज़रिया: गुजरात में इन बड़े नेताओं के चलते चूक गई कांग्रेस

  • 20 दिसंबर 2017
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इस बार के गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के 10 अहम नेताओं को हार का सामना करना पड़ा. इन नेताओं में शक्ति सिंह गोहिल, सिद्धार्थ पटेल और अर्जुन मोडवाढिया समेत कई अन्य लोग शामिल हैं.

अगर ये नेता जीत जाते तो कांग्रेस साधारण बहुमत के क़रीब पहुंच जाती.

इसी तरह राहुल गांधी को जेडीयू के लोगों, मुसलमानों और अल्पेश ठाकोर के समर्थकों को टिकट देने के लिए कहा गया और इन्हें टिकट मिले भी, लेकिन यह कांग्रेस के लिए मंहगा पड़ा.

इनमें से ज़्यादातर लोगों को हार का मुंह देखना पड़ा है. अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के नए प्रमुख राहुल गांधी के लिए यह सबक है कि जब तक पार्टी संगठन के रूप में जीत की आधी संभावना पक्की करने में कामयाब नहीं रहती है तब तक कांग्रेस के लिए जीत दूर की कौड़ी ही रहेगी.

ब्लॉग: गुजरात चुनाव में मुद्दों पर भारी पड़े मोदी

नज़रियाः राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती वो खुद हैं

राहुल गांधी की टीम के खिलाड़ी कौन कौन?

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गुजरात विधानसभा का चुनावी परिणाम कांग्रेस के नए अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए काफ़ी गंभीर संदेश है. राहुल गांधी एक विश्वसनीय और सक्षम नेता के रूप में उभरे हैं, जो नरेंद्र मोदी की हर चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार दिख रहे हैं.

हालांकि यह काम अब भी काफ़ी मुश्किल दिख रहा है.

अशोक गहलोत के मुक़ाबले अगर राहुल गांधी गुजरात विधानसभा चुनाव की हार ज़िम्मेदारी लेते हुए 24 अकबर रोड़ में प्रेस कॉन्फ़्रेंस करते तो ज़्यादा अच्छा होता.

राहुल अगर निर्भिक होकर गुजरात और हिमाचल प्रदेश में हार की सामूहिक ज़िम्मेदारी लेते तो उनके नेतृत्व की ख़ासियत ही सामने आती.

गुजरात में राहुल गांधी ने प्रभावी जातीय नेताओं से गठबंधन कर और रैलियों में भीड़ जुटाने के मामले में सफलता हासिल की थी. राहुल गांधी के साथ दिक़्क़्त ये रही कि उनकी पार्टी बूथों को मैनेज नहीं कर पाई और वो भाषण भी हिन्दी में दे रहे थे.

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कांग्रेस के पास गुजराती में भाषण देने वाले अच्छे वक्ता नहीं थे.

इस चुनाव में कांग्रेस उत्साह से लबरेज थी, लेकिन अंतिम क्षणों में जीत को छीन लेने वाले एक नेता की कमी साफ़ महसूस की जा रही थी. संसाधनों की कमी से भी कांग्रेस जूझ रही थी और इसका विजेता बनाने और हार का स्वाद चखाने में बड़ी भूमिका होती है.

राहुल को अपनी बात और बेहतर तरीक़े से रखने की ज़रूरत है. गुजरात चुनाव में पाकिस्तान और कश्मीर के मुद्दों को लाना कांग्रेस के हक़ में नहीं गया. राहुल गांधी को चाहिए कि वो इन मुद्दों को उदार, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्षता के दायरे में लाएं.

इन मुद्दों को ड्राइंग रूम या का आभिजात्य टीवी स्टूडियो तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए.

राहुल के लिए अच्छा होगा कि वो गड़े मुर्दों को न उखाड़ें, लेकिन कांग्रेस पार्टी की विशाल मशीनरी का इन ख़तरनाक और बांटने वाले एजेंडों से मुक़ाबला करने में इस्तेमाल करना चाहिए.

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इसके साथ ही राहुल को चाहिए कि वो खेती-किसानी के संकट और बेरोज़गारी की समस्या को प्रतिबद्धता के साथ आगे ले जाएं और इनसे जूझने के लिए समाधान पेश करें.

राहुल गांधी ने गुजरात में काफ़ी जोखिम भरा चुनावी अभियान को अंजाम दिया जबकि उन्हें पता था कि उनका विरोधी साहस तोड़ने वाला है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने राहुल ने किसी तरह अपने दंगल की रणनीति को ख़ुद ही सामने रखा.

राहुल ऐसा करने में कामयाब भी रहे, क्योंकि मोदी ने जवाब में उन मुद्दों को उठाया जिनका संबंध ज़मीनी समस्याओं या हक़ीक़तों से बिल्कुल जुदा था.

दूसरी तरफ़ गुजरात विधानसभा चुनाव में पाटीदार आरक्षण, जीएसटी, खेती का संकट, मूंगफली की फसल से जुड़ी समस्या और कपास उत्पादकों की समस्या मुंह बाये खड़ी थीं.

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राहुल के गुजरात कैंपेन की पटकथा 6 महीने पहले ही तैयार की जा चुकी थी. इस बार राहुल के गुजरात कैंपेन के पटकथा लेखक सैम पित्रोदा थे. कहा जा रहा है कि सैम पित्रोदा ने गुजरात में राहुल के मुद्दों को उठाने की सूची सौंपी थी.

राहुल गांधी गुजरात कांग्रेस के निचले और मध्य पायदान के नेताओं के साथ भी बातचीत करते दिखे.

राहुल से बैठक में प्रदेश के कांग्रेस नेता आलाकमान तक अपनी पहुंच को लेकर शिकायत करते दिखे. राहुल ने प्रदेश के नेताओं को इन दिक़्क़तों को लेकर आश्वस्त भी किया.

कांग्रेस परिवार में राहुल गांधी के लिए तत्काल कोई संकट नहीं है. लगभग कांग्रेसी 2004 और 2009 के आम चुनाव में जीत के लिए सोनिया गांधी को श्रेय देते हैं. लोगों को भरोसा है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में भी कांग्रेस वापसी करेगी.

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आज जब कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के हाथों में है तो 1998 के उस दौर को याद किया जा रहा है जब कांग्रेस की सरकार महज तीन राज्यों में थी और सोनिया गांधी नई अध्यक्ष बनी थीं. उस वक़्त भी कांग्रेस में घोर निराशा का माहौल था.

राहुल गांधी को अपनी पार्टी का सामाजिक आधार बढ़ाने की ज़रूरत है. कांग्रेस पार्टी को अपने थिंक टैंक का दायरा बढ़ाना चाहिए. कांग्रेस को चाहिए कि वो नीति निर्माताओं, विचारकों, लेखकों और रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स के ज़रिए बड़े आइडिया को ज़मीन पर उतारे. इसे हम वैश्विक स्तर पर समझ सकते हैं.

प्रवासी भारतीयों के बीच कांग्रेस की मौजूदगी न के बराबर है. ऐसे में कांग्रेस को जटिल मुद्दों पर राय बनाने में भी समस्या होती है. अमरीका ने जेरुसलम को यहूदी देश इसराइल की राजधानी स्वीकार किया है. ऐसे जटिल मुद्दों पर कांग्रेस कुछ भी साफ़ नहीं बोल पाती है.

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