नज़रिया: रुक पाएगी मोदी, शाह की विजयी जोड़ी?

  • 19 दिसंबर 2017
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भारत में होने वाला हर चुनाव लोकतंत्र के बारे में कुछ सबक देता है. इससे मिलने वाले संदेश उलझे हुए होते हैं और गुजरात चुनाव से तो ऐसे उलझे संदेशों की भरमार आई है.

बीजेपी गुजरात में 22 साल से जीत रही है. 18 दिसंबर को भी राज्य और केंद्र में सत्ता विरोधी लहर के बावजूद बीजेपी ने गुजरात में लगातार छठी बार जीत दर्ज की. ये एक उल्लेखनीय और लगभग अद्वितीय घटना है, इससे पहले ऐसा सिर्फ बंगाल में हुआ था.

इस उपलब्धि के लिए बीजेपी के धुर आलोचकों को भी उसे सलाम करना होगा. लेकिन अपने सबसे बेहतरीन नेता को प्रधानमंत्री के तौर पर दिल्ली भेजने के करीब तीन साल बाद ही गुजरात ने खतरे की घंटी बजाई है.

182 सीटों वाली गुजरात विधानसभा में सरकार बनाने के लिए बीजेपी को 92 सीटों की जरूरत थी. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भावनात्मक आह्वान और ताबड़तोड़ रैलियों के बावजूद पार्टी को सिर्फ 99 सीटें ही मिल पाईं. ये आंकड़ा 2012 में मिली जीत के मुकाबले 16 सीटें कम है, जबकि इस बार बीजेपी ने दावा 150 सीटें जीतने का किया था, उस लिहाज़ से तो 51 सीटें कम हैं. बीजेपी मनोवैज्ञानिक तौर से अहम, सौ के आंकड़े तक पहुंचने से चूक गई.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अपने गढ़ का फैसला शक्तिशाली संदेश देता है.

दूसरे शब्दों में इस फैसले से कई दिलचस्प बातें निकलती हैं. आने वाले कुछ दिनों में वोट शेयर, जीत के अंतर, हारी हुई सीटों का बारीकी से निरीक्षण किया जाएगा. लेकिन मोटे तौर पर पहले से कई साफ और कड़े संदेश दिखाई देते हैं.

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धराशायी हुआ गुजरात मॉडल

'विकास के गुजरात मॉडल' पर बीजेपी ने चाहे कितना भी घूमाने की कोशिश की हो, ये धराशायी होता नज़र आया है. सौराष्ट्र के 73 फीसदी ग्रामीण, पाटीदारों का एक तबका और बीजेपी का पारम्परिक गढ़ - इन सभी जगह से कड़े संदेश आए हैं.

गुजरात मॉडल से किसानों को कुछ नहीं मिला. गुजरात सालों से किसानों के लिए दो अंक में कृषि वृद्धि का दावा करता आया है लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं दिखा. इसका कारण उच्च लागत, कम कीमत, कर्ज का बोझ, कम आय और कुदरत की मार पर बीमा ना मिल पाना है. ऐसा में किसानों के लिए सबका साथ, सबका विकास का नारा झूठा ही नज़र आता है.

दिलचस्प ये है कि मोदी के नेतृत्व वाला गुजरात बुनियादी ढांचा, उद्योग और शहरी विकास के लिए सराहा जाता था. लेकिन किसी का ध्यान गुजरात के गंभीर मानवीय और सामाजिक सूचकांक में चिंताजनक गिरावट पर नहीं जाता था.

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इसलिए ये संयोग नहीं हो सकता कि बीजेपी के छह सिटिंग मंत्री चुनाव हार गए हैं. इन मंत्रियों के पास कृषि, सामाजिक न्याय, जल, जनजातीय मामलों और महिलाओं और बाल विकास जैसे अहम मंत्रालय थे. ये एक छोटी बात हो सकती है, लेकिन सुनने वालों के लिए ये बहुत कुछ कहती है.

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जीएसटी में संशोधन से व्यापारी हुए शांत

गुजरात से आए सभी संदेश उलझे हुए हैं. सौराष्ट्र से आए संकेत बताते हैं कि हार्दिक पटेल की राजनीति को व्यापक समर्थन मिला है. पाटीदार आंदोलन का केंद्र रहे सूरत के पाटीदार मतदाताओं ने दिखा दिया कि ये समुदाय पहचान के आधार पर वोट नहीं देने वाला.

उनकी नाराज़गी जीएसटी को लेकर थी. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने आखिरी समय में जीएसटी में संशोधन कर उनके गुस्से को शांत कर दिया. इसलिए व्यापारी किसानों के साथ संयुक्त रूप से मुख़ालफ़त नहीं कर पाए. यही वजह थी कि शहरी-ग्रामीण फॉल्टलाइन, जाति पर भारी पड़ी.

गुजरात के मतदाताओं ने आकांक्षाओं और असंतोष के कई संकेत दिए. लेकिन ये चुनाव कई और कारणों से भी अहम था.

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गुजरात में विकास पहले 'पगलाया' फिर 'धार्मिक' बन गया

गुजरात-हिमाचल प्रदेश में दोहरी जीत से साफ है कि मोदी और अमित शाह की जोड़ी को रोकना काफी मुश्किल है. ये भी है कि मोदी के विकास के विज़न भर भरोसा करने वाले कई लोग अब भी है.

परेशान करने वाली बात ये है कि शासन की लफ्फाजी के पीछे विभाजनकारी हिंदुत्व का एजेंडा छिपा हुआ है. पहले इसका इस्तेमाल उत्तर प्रदेश में हुआ, उसके बाद गुजरात में ये फिर नज़र आया.

चुनाव के आखिरी चरण में प्रधानमंत्री ने 'खिलजी की औलाद' जैसे जुमलों का इस्तेमाल किया. इसके अलावा पाकिस्तान पर गुजरात की राजनीति में हस्तक्षेप का आरोप, समान्य राजनयिक रात्रिभोज को गंभीर राष्ट्रीय खतरे का मुद्दा बताना.

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राहुल गांधी का 'पुर्नजन्म'

गुजरात के चुनाव में राहुल गांधी का पुर्नजन्म हुआ, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर एक मज़बूत विपक्ष की संभावना नज़र आने लगी है. इसमें भी कई उलझे संकेत नज़र आते हैं.

एक तरफ राहुल ने राजनीतिक ऊर्जा, आत्मविश्वास दिखाया, जो पहले कभी नहीं देखा गया. वो मज़ाकिया ट्वीट करने लगे हैं. बीजेपी को विनम्रता पूर्वक जवाब देते हैं. मणिशंकर अय्यर के प्रधानमंत्री को नीच कहने पर उन्होंने तत्काल कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित कर दिया था.

कुछ महीने पहले तक पप्पू कहलाने वाले राहुल गांधी मोदी के असली विरोधी के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए हैं.

गांधी का गुजरात कैसे बना हिन्दुत्व की प्रयोगशाला?

युवा नेताओं - हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर के साथ मिलकर राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी.

गुजरात चुनाव में बीजेपी जीती पर कांग्रेस भी हारी नहीं. हालांकि, कांग्रेस और राहुल को ये भी सोचना चाहिए कि अगर वो पहले काम करना शुरू करते तो गुजरात में जीतने की स्थिति में होते.

उन्हें ये भी समझना होगा कि तीनों नेताओं के साथ उनका ये गठबंधन ज्यादा समय तक चलने वाला नहीं है. क्योंकि ये साझेदारी एक जैसे विज़न के बजाए कॉमन विपक्ष की वजह से बनी है. अगर कांग्रेस राज्य में सरकार बना भी लेती तो पाटीदारों को आरक्षण देने के अपने वादे को पूरा कैसे करती. इस वादे को पूरा करते हुए ओबीसी नेता अल्पेश को साथ बनाए रखना मुश्किल होता.

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अगर राहुल को अपनी राजनीतिक पूंजी को बचाए रखना है तो उन्हें और कांग्रेस को वैकल्पिक राजनीतिक नैरेटिव की जरूरत होगी. उन्हें बताना होगा कि उनके पास भारत के लिए कौनसा विज़न है?

कांग्रेस के लिए ये भी जरूरी है कि वो हिंदुओं के बीच फिर से अपनी जगह बनाए. उन्हें बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे को दूर करना होगा और अपना उदारवादी, मानवतावादी रूप ज्यादा दिखाना होगा. साथ ही मुस्लिमों के बीच भी छवि बेहतर रखनी होगी. मंदिरों का दौरा और अपनी हिंदू पहचान को आगे करना छवी को नुकसान पहुंचा सकता है.

ऐसे में कांग्रेस हिंदुत्व की बी-टीम दिखने से खुदको कैसे बचा पाएगी? क्या राहुल एक नए तरह की राजनीति भाषा ला सकते हैं, जो बांटती ना हो?

आखिर में अर्थव्यवस्था है. लोकतंत्र में बुद्धिमान आलोचना की जरूरत है. लेकिन आलोचना करना काफी नहीं है. अगर नागरिकों से वोट चाहते हैं तो उन्हें बताना होगा कि ए क्यों और बी क्यों नहीं.

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कांग्रेस ऐसा क्या करेगी जो बीजेपी ने नहीं किया? वो अमीर और गरीब दोनों से कैसे बात करेगी? युवा और बुढ़े से, व्यापारी, किसान और उद्यमी से कैसे बात करेगी? वो कैसे अर्थव्यवस्था में बदलाव करेगी?

2017 का गुजरात चुनाव खासतौर पर दिलचस्प है क्योंकि इसने ऐसी दो राष्ट्रीय पार्टियां पेश की, जिसमें से एक के पास आधा भरा ग्लास और एक के पास आधा खाली ग्लास है.

आम भारतीय जानना चाहेगा कि कौन इसे पहले भरेगा.

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