नज़रिया: बीजेपी के मुक़ाबले कहां टिकेगा कांग्रेस का 'सॉफ़्ट हिंदुत्व'?

  • 20 दिसंबर 2017
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गुजरात में चुनाव-प्रचार के दौरान कांग्रेस के अंदर और उसके समर्थकों के एक हिस्से में यह बात बहुत तेज़ी से प्रचारित-प्रसारित हुई कि राहुल गांधी ने 'सॉफ़्ट हिन्दुत्वा' का बिल्कुल सही रास्ता चुना.

अपने नेता की पीठ थपथपाने के अंदाज़ में बहुतों को यह कहते सुना गया कि बस, इसी राजनीति की ज़रूरत थी! दिलचस्प है कि राहुल ने स्वयं कभी ऐसे किसी जुमले का इस्तेमाल नहीं किया.

लेकिन गुजरात के दर्जन भर से अधिक मंदिरों में उनके जाने को 'सॉफ़्ट-हिन्दुत्वा' से जोड़ दिया गया. कांग्रेस के अंदर और बाहर के उनके स्वघोषित सलाहकारों ने इस बात को बिल्कुल ही नज़रंदाज़ किया कि राहुल ने अपने अभियान में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बीते साढ़े तीन साल के दौरान प्रचारित विकास के कथित 'गुजरात मॉडल' पर दर्जन भर सवाल किए.

'गुजरात में बीजेपी आगे लेकिन कांग्रेस भी पीछे नहीं'

वो नेता जिसने गुजरात में कांग्रेस को संजीवनी दी

और वे सवाल आज की परिस्थितियों से जोड़कर किए. कपास और मूंगफली किसानों से लेकर नौजवानों के बीच बढ़ती बेरोज़गारी और आदिवासियों के ज्वलंत सवाल थे.

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इन सवालों ने प्रधानमंत्री मोदी को विकास के अपने पुराने जुमले से हटने और 'नीच' शब्द पर खेलने, डॉ. मनमोहन सिंह, चुनाव के पाकिस्तान-कनेक्शन, कसूरी-डिनर और अहमद पटेल के कथित सीएम बनाए जाने जैसे बनावटी मसलों को उछालने के लिए मजबूर किया.

कांग्रेस की मुश्किल क्या है?

पर कांग्रेस तो संगठन के तौर पर बेहद रोचक जमावड़ा है. आज के दौर में इसमें जितने समझदार बचे हैं, उससे कहीं ज़्यादा चाटुकार हैं. चाटुकार पहले भी थे पर समझदारों की संख्या ठीक-ठाक थी.

ज़्यादा पहले की बात नहीं करूंगा. अगर श्रीमती इंदिरा गांधी के ज़माने को ही देखें तो उनकी बहुत सारी खामियां और ख़ूबियां थीं. यहां हम न तो उन्हें गिनाने जा रहे हैं और न ही इस लेख का वह मक़सद है.

हम सिर्फ़ एक ख़ास तथ्य को रेखांकित करना चाहते हैं कि इंदिरा युग के बाद कांग्रेस में न केवल बौद्धिकता की भारी कमी आई अपितु रणनीतिकारों के स्तर पर भी वह बहुत कमज़ोर हो गई.

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हालत ये है कि आज कांग्रेस के बौद्धिक और रणनीतिक तंत्र को संचालित करने वाले कुछ बेहद अमीर वक़ील हैं या फिर पुराने कांग्रेसियों के नातेदार-रिश्तेदार या फिर जनाधार-विहीन चाटुकार किस्म के नेता.

कुछ ही दशक पहले पार्टी में ऐसे हालात नहीं थे. आज पार्टी के ज़्यादातर प्रवक्ताओं-सलाहकारों को देखकर हंसी आती है. प्रमुख नेताओं में अशोक गहलोत, ग़ुलाम नबी आज़ाद, बी के हरिप्रसाद, मधुसूदन मिस्त्री, अहमद पटेल, हरीश रावत और ऑस्कर फर्नांडिस जैसे कुछेक ही लोग हैं, जिनके पास फ़ील्ड में सांगठनिक काम का बेहतर अनुभव है.

लेकिन पार्टी में अति-उत्साही बड़बोले कांग्रेसियों, अमीर वक़ीलों और पार्टी के दिवंगत या रिटायर हो चुके बड़े नेताओं के बेहद एरोगेंट बेटों की हैसियत काफ़ी बढ़ी हुई है. इनका एक प्रभावशाली हिस्सा 'सॉफ्ट हिन्दुत्वा' लाइन का जबर्दस्त पैरोकार बना हुआ है.

वजह यही है कि कांग्रेस-विरासत की समझ रखने वाले युवा नेता संगठन में बहुत कम आ रहे हैं.

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'सॉफ्ट हिन्दुत्वा' लाइन के पैरोकारों ने हाल में अपनी आवाज़ तेज़ कर दी है. वे गुजरात प्रचार अभियान में काग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के डेढ़ दर्जन से अधिक बार मंदिरों में जाने को इसका आधार बना रहे हैं.

यह महज संयोग नहीं कि जब सोमनाथ मंदिर में राहुल को ग़ैर-हिन्दू श्रेणी के दर्शनार्थी के तौर पर दर्ज़ किया गया तो दिल्ली स्थित 24, अकबर रोड पर कुंडली मारकर बैठे कांग्रेसी मठाधीशों ने फौरन राहुल बाबा की एक ऐसी तस्वीर निकालकर मीडिया में प्रसारित की, जिसमें वह कोट के ऊपर जनेऊ पहने दिख रहे थे!

छवि का नुकसान या फिर...

कुछ नेताओं ने फरमाया कि कुछ साल पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता एके एंटनी की अगुवाई में गठित कमिटी ने भी कहा था कि समाज में कांग्रेस की छवि अल्पसंख्यक-परस्त पार्टी (प्रमुखतः मुस्लिम-पक्षी) पार्टी की बनती गई, इससे भी काफ़ी नुक़सान हुआ.

केरल के अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले नेता के मुंह से ऐसी बात निकलने को पार्टी में 'अंतिम सत्य' के रूप में सर्वस्वीकार्यता दिलाने की कोशिश की गई.

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उस वक़्त पार्टी कार्यसमिति या आलाकमान या उसके सलाहकारों ने इस बात की कतई कोशिश नहीं की कि चुनावी हार के पीछे पार्टी की अगुवाई में कई साल तक चली सरकार की आर्थिक और सामाजिक नीतियों में वो बड़ी खामियां थीं, जिन्हें लेकर समाज में गहरी नाराज़गी पैदा हुई और भाजपा जैसे विपक्षी दलों ने जिसका जमकर इस्तेमाल किया.

आर्थिक सुधारों के दौर में पार्टी और उसकी सरकारों की तरफ़ से कई बार कहा गया कि सुधारों को मानवीय चेहरा देने की कोशिश की जाएगी.

पर कितना मानवीय चेहरा मिला? यह नहीं भूला जाना चाहिए कि सार्वजनिक क्षेत्र की कई लाभकारी कंपनियों के निजीकरण, रोजगार-विहीन निवेश और विनिवेश, जीएसटी से लेकर 'आधार' तक बहुत सारे क़दमों की शुरुआत कांग्रेस-नीत सरकारों के दौर में ही हो गई थी.

बीजेपी क्यों है आगे

सामाजिक स्तर पर भाजपा के अयोध्या-अभियान और फिर बाबरी-विध्वंस जैसे घटनाक्रम भी कांग्रेस शासन में हुए. लोग क्यों भूल रहे हैं कि 'प्रगतिशील' मणिशंकर अय्यर जैसों की सलाह पर ही तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संसद की बहस के दौरान पानी पी-पीकर मंडल-आंदोलन को कोसा था.

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हिन्दुत्ववादी धुर-दक्षिणपंथी कही जाने वाली और महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मणों की वैचारिकी (आरएसएस) से संचालित भाजपा ने सन् 1990 से अब तक दलित-आदिवासी-ओबीसी समुदाय से कम से कम से दो दर्जन बड़े नेता पैदा किए.

कइयों को मुख्यमंत्री, कई प्रदेश अध्यक्ष, कई कैबिनेट मंत्री, राष्ट्रीय महासचिव और अन्य बड़े पदों पर बिठाया. प्रधानमंत्री मोदी स्वयं ही कहते हैं कि वह पिछड़े वर्ग से आते हैं.

आधिकारिक तौर पर उनकी बिरादरी विगत दो दशकों से ओबीसी श्रेणी में दर्ज़ है. इन दिनों देश के राष्ट्रपति भी एक दलित हैं. इससे पहले दलित समाज से आने वाले केआर नारायणन कांग्रेस दौर में राष्ट्रपति रह चुके हैं.

गांधी का गुजरात कैसे बना हिन्दुत्व की प्रयोगशाला?

अहमद पटेल के साथ कितने अहमद, कितने पटेल?

लेकिन संख्या और सोशल इंजीनियरिंग के हिसाब से देखें तो कांग्रेस के मुक़ाबले भाजपा बहुत आगे है. भाजपा संगठन में भी बौद्धिकता का लगभग अकाल सा है. पर उसके पास तीन ऐसी चीज़ें हैं, जिनका आज की कांग्रेस मुक़ाबला नहीं कर सकती.

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एक तो आरएसएस और दूसरा उसके पास कुशल रणनीतिकार, ख़ासकर चुनावी अखाड़ेबाज बहुत ज़्यादा हैं और तीसरे, उसके समर्थन में मीडिया का एक असरदार 'अनुकूलित हिस्सा' है. भारत का मीडिया आमतौर पर सामाजिक-राजनीतिक सत्ता के साथ रहता है.

ऐसे परिदृश्य में ये कहना कि कांग्रेस को गुजरात की सीमित लेकिन संभावनाभरी कामयाबी से सबक लेकर 'सॉफ्ट हिन्दुत्वा' की तरफ मुखातिब होना चाहिए, ने केवल एक मूर्खतापूर्ण विचार है, अपितु कांग्रेस की विरासत और हमारे राष्ट्र-राज्य के महान संवैधानिक मूल्यों का निषेध होगा!

गुजरात का क्या है संदेश?

इससे कांग्रेस सिर्फ़ भाजपा की घटिया बी-टीम बन सकती है, गांधी-नेहरू की विरासत से जुड़ी एक जीवंत पार्टी कभी नहीं! गुजरात के जनादेश के संदेश को सही ढंग से पढ़ा जाना चाहिए. अनेक शोधों और सर्वेक्षणों से यह बात पहले से साफ़ है कि पूरे देश की तरह गुजरात में भी 'हिन्दुत्वा' का ज़्यादा प्रभाव शहरों और अर्द्धशहरी इलाक़ों में है.

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गुजरात में भाजपा को मिले प्रचंड समर्थन से भी यह बात साबित होती है. शहरी क्षेत्र की 58 सीटों में भाजपा के खाते में 48 सीटें आई हैं. सूरत, अहमदाबाद, राजकोट और वड़ोदरा ने न संभाला होता तो गुजरात में इस बार भाजपा हार गई होती.

राज्य में शहरी आबादी तकरीबन 43 फ़ीसदी है. ग्रामीण क्षेत्र में भाजपा को 41 और कांग्रेस व उसके समर्थित प्रत्याशियों को कुल 67 सीटें मिली हैं.

सामुदायिक स्तर पर मतदाताओं का विश्लेषण सामने नहीं आया है पर सीटों की प्रकृति और जीत-हार के आंकड़ों की रोशनी में देखें तो यह बात साफ़ होती है कि कांग्रेस को सबाल्टर्न समाजों के वोट सर्वाधिक मिले हैं.

कांग्रेस ने अगर ओबीसी समुदाय से अल्पेश जैसे नेताओं को पहले से तैयार किया होता और हर संभाग में दलित-ओबीसी-आदिवासी के उसके नेताओं की मौजूदगी होती तो चुनाव का परिदृश्य कुछ और होता.

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मंदिर-मस्जिद या किसी भी उपासना स्थल जाने या न जाने का हर नागरिक को उसका सार्वभौम अधिकार है. लेकिन इससे सियासत से जोड़ना हमारे संविधान और राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत के बिल्कुल उलट होगा.

कांग्रेस की ये सीटें राहुल के मंदिर-मंदिर जाने या जनेऊ दिखाने से नहीं मिली हैं. ये ठोस मुद्दों को उठाने और उभरते नए सामाजिक-समीकरणों के चलते मिली हैं.

इसमें राहुल को सबसे बड़ी मदद हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश से मिली है. कांग्रेस को इस समीकरण को समझना होगा.

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